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तानों और तरस ने सरिता को बनाया मजबूत

Tue, 13 Oct 2015 01:44 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, कानपुर
अमर उजाला ब्यूरो, कानपुर Updated Tue, 13 Oct 2015 01:44 AM IST
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Sarita was created strong by taunts and craving
रदीय नवरात्र में सिंहवाहिनी मां भवानी के नौ रूप शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चंद्र घंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धधात्री की पूजा होती है। शहर में भी कई ऐसी महिलाएं हैं, जो बुराई रूपी विरोधी ताकतों को परास्त कर समाज के उद्धार में लगी हैं। नवरात्र के अवसर पर ‘अमर उजाला’ अपने पाठकों को शहर की कुछ ऐसी हीं महिलाओं से परिचित कराएगा। पहली कड़ी में पेश है सरिता द्विवेदी की कहानी...
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दूसरों की दया पर नहीं जीना, यह मूलमंत्र है सरिता का। आज वह निशक्तजनों की प्रेरणास्रोत बनी हुई हैं। दरअसल मात्र चार साल की उम्र में ही उन्हें 11 हजार वोल्ट की मेन हाईटेंशन लाइन से करेंट लग गया था। डॉक्टरों को उन्हें बचाने के लिए दोनों हाथ व पैर काटने पड़े थे। छह-सात साल की हुईं तो लोग बेचारी-लाचार और अपाहिज कहकर उन पर तरस खाने लगे। ताने मारने लगे कि एक तो लड़की जात, ऊपर से ये दुख। तभी सरिता ने तय कर लिया कि कुछ भी हो जाए वह आम इंसान से भी कुछ बेहतर करेंगी। फिर मंजिल की ओर कदम बढ़ाया तो पलटकर नहीं देखा।
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आखिर सरिता ने अपने दम पर परिवार और समाज को बताया कि बेटियां कभी बोझ नहीं होतीं। सरिता ने अपनी स्नातक की पढ़ाई की। बेहतरीन पेंटिंग के जरिए बालश्री अवार्ड तक जा पहुंचीं। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम से ‘बालश्री अवार्ड’ के साथ कई नेशनल व इंटरनेशनल एवार्ड पा चुकी सरिता आज एलिम्को में टेलीफोन ऑपरेट हैं। वह हर रोज एलिम्को आने वाले निशक्तजनों को प्रेरित भी करती हैं।
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सरिता व्हील चेयर पर बैठकर टेलीफोन ऑपरेटिंग, कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल पर फटाफट काम करती हैं। पेंटिंग बनाती हैं और लिखने पढ़ने के साथ अपने सारे काम खुद ही करती हैं। सरिता की मां बिमला को अपनी तीनों बेटियों में सबसे ज्यादा गर्व सरिता पर है। वह बताती हैं मेरी सरिता फोटोग्राफी और डिबेट की बेहद शौकीन है। आईआईटी अतंराग्नि में भी इनाम पा चुकी है।  सरिता का कहना है कि जो लोग बेटियों को बोझ समझकर उसे रास्ते में फेंककर चले जाते हैं उन्हें यह जरूर सोचना चाहिए कि बेटे की तरह इस दुनिया में जन्म लेने वाली हर बेटी अपना भाग्य खुद लेकर आती है।
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