{"_id":"60e1fb4e8ebc3ec23655848e","slug":"revealed-in-joint-research-of-iit-and-hemvati-nandan-bahuguna-garhwal-university","type":"story","status":"publish","title_hn":"जंगल जलते रहेंगे तो बादल फटते रहेंगे: आईआईटी और हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विवि के संयुक्त शोध में हुआ खुलासा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जंगल जलते रहेंगे तो बादल फटते रहेंगे: आईआईटी और हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विवि के संयुक्त शोध में हुआ खुलासा
Sun, 04 Jul 2021 11:48 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Sun, 04 Jul 2021 11:48 PM IST
सार
सीसीएन हवा में मौजूद बहुत छोटे आकार के कण (.2 माइक्रोन) होते हैं। इन्हीं कणों पर जलवाष्प ठंडी होकर जमती है और ये ही कण ऊंचाई पर जाकर बादल का निर्माण करते हैं।
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
उत्तराखंड में आए दिन बादल फटने की घटनाएं होती रहती हैं। आईआईटी और हेमवंती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के संयुक्त शोध में यह सामने आया है कि बादल फटने का एक कारण जंगलों में लगने वाली आग भी है। आईआईटी और हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (उत्तराखंड) के वैज्ञानिक वर्ष 2018 से बादल फटने का कारण पता लगाने के लिए शोध कर रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने एक अगस्त 2018 से 30 जून 2019 तक डाटा लिया है। आईआईटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. सच्चिदानंद त्रिपाठी ने बताया कि हम लोगों ने उत्तराखंड के हिमालय के ऊंचाई वाले विभिन्न क्षेत्रों में क्लाउड कंडेनसेशन न्यूक्लियर (सीसीएन) यानी बादल संघनन नाभिक की सक्रियता को मापा है।
सीसीएन हवा में मौजूद बहुत छोटे आकार के कण (.2 माइक्रोन) होते हैं। इन्हीं कणों पर जलवाष्प ठंडी होकर जमती है और ये ही कण ऊंचाई पर जाकर बादल का निर्माण करते हैं। जब जंगल में आग लगती है तो सीसीएन में आग के प्रदूषण के कणों की मात्रा बहुत अधिक हो जाती है और इनका कंसनट्रेशन यानी संक्रेदण बढ़ जाता है।
विज्ञापन
इससे इनका आकार छोटा हो जाता है। नतीजन जलवाष्प से जमी बूंदें तेजी से नीचे आती हैं। यही प्रक्रिया बादल फटने का बड़ा कारण हो सकती है। प्रो. त्रिपाठी ने बताया कि अध्ययन में कई बार देखा गया कि जब-जब जंगल में आग लगी तो सीसीएन काउंट्स भी बढ़ा। इसके कुछ दिनों बाद ही बादल फटने की घटनाएं सामने आईं। उन्होंने कहा कि अभी इस अध्ययन पर और काम किया जा रहा है। पूरा डाटा आने के बाद ही कोई सार्थक परिणाम सामने आ सकेगा।
विज्ञापन
वैज्ञानिकों ने एक अगस्त 2018 से 30 जून 2019 तक डाटा लिया है। आईआईटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. सच्चिदानंद त्रिपाठी ने बताया कि हम लोगों ने उत्तराखंड के हिमालय के ऊंचाई वाले विभिन्न क्षेत्रों में क्लाउड कंडेनसेशन न्यूक्लियर (सीसीएन) यानी बादल संघनन नाभिक की सक्रियता को मापा है।
विज्ञापन
सीसीएन हवा में मौजूद बहुत छोटे आकार के कण (.2 माइक्रोन) होते हैं। इन्हीं कणों पर जलवाष्प ठंडी होकर जमती है और ये ही कण ऊंचाई पर जाकर बादल का निर्माण करते हैं। जब जंगल में आग लगती है तो सीसीएन में आग के प्रदूषण के कणों की मात्रा बहुत अधिक हो जाती है और इनका कंसनट्रेशन यानी संक्रेदण बढ़ जाता है।
विज्ञापन
इससे इनका आकार छोटा हो जाता है। नतीजन जलवाष्प से जमी बूंदें तेजी से नीचे आती हैं। यही प्रक्रिया बादल फटने का बड़ा कारण हो सकती है। प्रो. त्रिपाठी ने बताया कि अध्ययन में कई बार देखा गया कि जब-जब जंगल में आग लगी तो सीसीएन काउंट्स भी बढ़ा। इसके कुछ दिनों बाद ही बादल फटने की घटनाएं सामने आईं। उन्होंने कहा कि अभी इस अध्ययन पर और काम किया जा रहा है। पूरा डाटा आने के बाद ही कोई सार्थक परिणाम सामने आ सकेगा।