जानें, क्या है नागपंचमी का महत्व और गुड़िया पीटने के पीछे की कहानी
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सावन का महीना हिन्दू धर्म में भक्ति और प्रेम का महीना कहा जाता है। सावन में भगवन शिव को पूजा जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। यूपी में नाग पंचमी बड़े ही अलग ढंग से मनाई जाती है। नागपंचमी हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार भी होता है।
इसे मनाने का ढंग कुछ अनूठा है, यहां नागपंचमी के दिन गुड़िया पीटने की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। नागपंचमी के दिन महिलाएं घर के पुराने कपड़ों से गुड़िया बनाती हैं और उसे चौराहे पर डाल देती हैं। बच्चे इन गुड़िया को कोड़ों और डंडों से पीटकर खुश होते हैं। इस परंपरा की शुरूआत के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं।
गुड़िया पीटने की कहानी
कहते हैं कि गरुण नागों के दुश्मन होते है। प्राचीन कहानी है एक बार गरुण से बचते हुये एक नाग ने महिला से याचना की, कि वह उसे कहीं छिपा ले। जिससे वह गुरु के प्रकोप से बच जाये। महिला ने गरुण को छिपा लिया लेकिन यह बात उसके पेट में नहीं रुकी। उसने अन्य लोगों को भी बता दी। इस बात को सुन क्रोधित हुये नागदेव ने महिला को श्राप दिया कि साल में एक दिन तुम सब पीटी जाओगी। सदियों पुरानी यह प्रथा आज भी एक पर्व के रूप में निभाई जा रही है। औरत के प्रतीक कपड़े से बनी गुड़िया को युवतियां पानी के पास या चौराहे पर फेंकती है और लड़के उनकी पिटाई करते है।
एक और कहानी
राजा की बेटी थी जिसका नाम गुडिया था। वह दूसरे राज्य के राजा के बेटे से प्रेम करने लगती है। दुश्मन राज्य के युवराज से प्रेम की बात गुडिय़ा के भाइयों को स्वीकार नहीं होती जिसके चलते वह गुडिय़ा की बीच चौराहे पर पिटाई कर देते हैं। उसे चौराहे पर इतना पीटा जाता है कि उसकी मौत हो जाती है। गुडिय़ा की मौत के बाद उसके सातों भाई समाज में यह घोषणा करते हैं कि ऐसा अनैतिक कार्य कोई करेगा तो उसका हश्र भी ऐसा ही होगा। उस दिन के बाद से प्रतिवर्ष यह परम्परा चलती रही और चौराहों पर कपड़े की गुडिय़ा बनाकर पीटी जाने लगी।
चौरसिया समाज के लिये खास पर्व
नागपंचमी के दिन चौरसिया समाज के लोग नागदेव की विशेष पूजा करते है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले अमृत का नारी स्वरूप में भगवान विष्णु ने वितरण किया था। देवताओं की लाइन में असुर भी थे। इस बीच एक नाग कन्या की मृत्यु हो गई। भगवान विष्णु ने उसकी समाधि बनाई और उस पर बेल लगा दी। इसके बाद से भीट पर पान की खेती होने का प्रचलन शुरू हो गया। जो आज भी अनवरत जारी है। कहा जाता है कि ऋषि कश्यप के पुत्रों को चौऋषि कहा जाता था, जिसे चौरसिया कहा जाने लगा। पान की खेती करने वाले किसान बारिश में सांप से जानमाल की रक्षा के लिये पूजा करते है। इस समाज के लोग पान के भीट और घरों मे सांप का पूजन करेंगे।
भगवान शिव और नागपंचमी
नागों का हिन्दू धर्म में अहम स्थान है और भगवान शंकर नाग को गले मे मालाओ की तरह धारण करते है नागपंचमी के दिन शिवजी के साथ ही नागों की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। नागपंचमी श्रावण मास में शुक्लपक्ष की पंचमी को मनाई जाती है। हिंदू धर्मग्रंथों में नाग को प्रत्येक पंचमी तिथि का देवता माना गया हैए परंतु नागपंचमी पर नाग की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है। नागपंचमी का पर्व धार्मिक आस्था व विश्वास के सहारे हमारी बेहतरी की कामना का प्रतीक है। यह जीव-जंतुओं के प्रति समभावए हिंसक प्राणियों के प्रति भी दयाभाव व अहिंसा के अभयदान की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमें पर्यावरण से भी जोड़ता है।
इस दिन अपने दरवाजे के दोनों ओर गोबर से सर्पों की आकृति बनानी चाहिए और धूपए पुष्प आदि से इसकी पूजा करनी चाहिए। इसके बाद इन्द्राणी देवी की पूजा करनी चाहिए। दहीए दूधए अक्षतए जलम पुष्पए नेवैद्य आदि से उनकी आराधना करनी चाहिए। तत्पश्चात भक्तिभाव से ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। इस दिन पहले मीठा भोजन फिर अपनी रुचि अनुसार भोजन करना चाहिए। इस दिन द्रव्य दान करने वाले पुरुष पर कुबेरजी की दयादृष्टि बनती है। मान्यता है कि अगर किसी जातक के घर में किसी सदस्य की मृत्यु सांप के काटने से हुई हो तो उसे बारह महीने तक पंचमी का व्रत करना चाहिए। इस व्रत के फल से जातक के कुल में कभी भी सांप का भय नहीं होगा।