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पीएचडी की प्रवेश परीक्षा इस साल नहीं
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर
Updated Sun, 18 Sep 2016 06:55 PM IST
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कानपुर विश्वविद्यालय
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कानपुर यूनिवर्सिटी की पीएचडी की प्रवेश परीक्षा अब 2017 में कराई जा सकेगी। नया अध्यादेश बनाने के बाद एकेडमिक काउंसिल, एक्जीक्यूटिव काउंसिल और राजभवन से मंजूरी ली जाएगी। इस प्रक्रिया में एक साल का समय लग सकता है। पहले प्रवेश परीक्षा दिसंबर 2016 तक कराए जाने की तैयारी थी।
यूनिवर्सिटी का पीएचडी अध्यादेश वर्ष 2014 में अनुमोदित हुआ था। इसी आधार पर प्रवेश परीक्षा कराई गई। सीटें भरकर छह महीने का सेमेस्टर कोर्स चलाया गया। परीक्षा हुई और रिजल्ट भी आ गया। अब नए सत्र की एडमिशन प्रक्रिया शुरू होनी थी लेकिन पहले ही यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) ने अध्यादेश में बदलाव कर दिया। इस पर कुलपति प्रो. जेवी वैशंपायन ने डींस कमेटी गठित करके रिपोर्ट तलब की। अब डींस कमेटी नया अध्यादेश बना रही है। कमेटी से जुड़े सूत्रोें का कहना है कि अध्यादेश का मसौदा तैयार करने और उसे मंजूरी दिलाने में एक साल लग सकता है।
जेआरएफ को प्रवेश परीक्षा से छूट नहीं
पीएचडी की प्रवेश परीक्षा से अब जूनियर रिसर्च फेलो (जेआरएफ) को छूट नहीं दी जाएगी। यूजीसी ने इस निर्णय का अधिकार यूनिवर्सिटियों को दे दिया है। इसी क्रम में छूट खत्म करने का अहम फैसला लिया गया। सत्र 2015-16 की प्रवेश परीक्षा से जेआरएफ को छूट थी। इसी वजह से सीधे एडमिशन मिल गया था। कुलपति प्रो. जेवी वैशंपायन का कहना है कि अब सभी सीटें प्रवेश परीक्षा से भरी जाएंगी।
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महिला और विकलांग अभ्यर्थियों को राहत
टॉपिक, सिनॉप्सिस अनुमोदन के बाद थीसिस बनाने और जमा करने में महिला, विकलांग अभ्यर्थियों को दो साल की मोहलत दी जाएगी। ऐसे अभ्यर्थियों को अधिकतम आठ साल में थीसिस जमा करने की अनुमति होगी। सामान्य अभ्यर्थियों की समयसीमा छह साल होगी। वैसे थीसिस जमा करने की न्यूनतम सीमा तीन साल की जाएगी। अभी यह दो साल थी।
जेआरएफ भी फेल हुए
नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट) पास करके जेआरएफ हासिल करने वाले तमाम रिसर्च स्कॉलर पीएचडी की सत्र 2015-16 की सेमेस्टर परीक्षा में फेल हो गए। इन सबने कॉपी जांचने में लापरवाही का आरोप लगाया था, जो छानबीन में बेबुनियाद साबित हुआ। यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि जेआरएफ का मतलब यह नहीं है कि पीएचडी की गुणवत्ता अच्छी हो जाएगी।
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यूनिवर्सिटी का पीएचडी अध्यादेश वर्ष 2014 में अनुमोदित हुआ था। इसी आधार पर प्रवेश परीक्षा कराई गई। सीटें भरकर छह महीने का सेमेस्टर कोर्स चलाया गया। परीक्षा हुई और रिजल्ट भी आ गया। अब नए सत्र की एडमिशन प्रक्रिया शुरू होनी थी लेकिन पहले ही यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) ने अध्यादेश में बदलाव कर दिया। इस पर कुलपति प्रो. जेवी वैशंपायन ने डींस कमेटी गठित करके रिपोर्ट तलब की। अब डींस कमेटी नया अध्यादेश बना रही है। कमेटी से जुड़े सूत्रोें का कहना है कि अध्यादेश का मसौदा तैयार करने और उसे मंजूरी दिलाने में एक साल लग सकता है।
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पीएचडी की प्रवेश परीक्षा से अब जूनियर रिसर्च फेलो (जेआरएफ) को छूट नहीं दी जाएगी। यूजीसी ने इस निर्णय का अधिकार यूनिवर्सिटियों को दे दिया है। इसी क्रम में छूट खत्म करने का अहम फैसला लिया गया। सत्र 2015-16 की प्रवेश परीक्षा से जेआरएफ को छूट थी। इसी वजह से सीधे एडमिशन मिल गया था। कुलपति प्रो. जेवी वैशंपायन का कहना है कि अब सभी सीटें प्रवेश परीक्षा से भरी जाएंगी।
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महिला और विकलांग अभ्यर्थियों को राहत
टॉपिक, सिनॉप्सिस अनुमोदन के बाद थीसिस बनाने और जमा करने में महिला, विकलांग अभ्यर्थियों को दो साल की मोहलत दी जाएगी। ऐसे अभ्यर्थियों को अधिकतम आठ साल में थीसिस जमा करने की अनुमति होगी। सामान्य अभ्यर्थियों की समयसीमा छह साल होगी। वैसे थीसिस जमा करने की न्यूनतम सीमा तीन साल की जाएगी। अभी यह दो साल थी।
जेआरएफ भी फेल हुए
नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट) पास करके जेआरएफ हासिल करने वाले तमाम रिसर्च स्कॉलर पीएचडी की सत्र 2015-16 की सेमेस्टर परीक्षा में फेल हो गए। इन सबने कॉपी जांचने में लापरवाही का आरोप लगाया था, जो छानबीन में बेबुनियाद साबित हुआ। यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि जेआरएफ का मतलब यह नहीं है कि पीएचडी की गुणवत्ता अच्छी हो जाएगी।