शरई अदालतों में तलाक के मसले शून्य, कानून बनने से पहले ही दिखने लगा बदलाव
तीन तलाक का मसला अभी कानून बनने की प्रक्रिया में है, लेकिन इसके खौफ ने तलाक के मसले लगभग शून्य कर दिए हैं। महिला शरई अदालतों और मुफ्तियों की कमेटियों में अब तीन तलाक के मसले नहीं आ रहे हैं। ऐसा पहली बार है कि तलाक के मसले अचानक शरई अदालतों से गायब हो गए हैं।
अभी तक हालत यह रही है कि दारुल कजाओं, शरई अदालतों और मुफ्तियों की दारुल इफ्ता कमेटियों में तलाक के मसले सबसे अधिक आते रहे हैं। शरई अदालतों में आने वाले कुल मसलों में 60 से 70 फीसदी तलाक से संबंधित होते रहे हैं।
ऑल इंडिया सुन्नी उलेमा काउंसिल और ऑल इंडिया ख्वातीन बोर्ड के बैनर तले महिला शरई अदालत में अधिकांश मसले तीन तलाक से संबंधित रहे हैं। इनमें कुछ मसले तो शादी होने के साल भर के अंदर के रहे हैं। पति ने पत्नी को धमकी देकर छोड़ दिया। कुछ मसलों में बच्चों को छीनकर बहू को ससुराल पक्ष ने घर से भगा दिया। इस तरह के मसले तेजी से बढ़ भी रहे थे, लेकिन तीन तलाक के कानून की प्रक्रिया शुरू होने के बाद महिला शरई अदालत में इस तरह की शिकायतें आनी लगभग बंद हो गई हैं।
कानपुर में महिला शहर काजी डॉ. हिना जहीर नकवी का कहना है कि जबसे तीन तलाक के संबंध में कानून बनने की प्रक्रिया शुरू हुई है, तलाक के मसले आने बंद हो गए हैं। अब लोग खुद आपस में बैठकर मामला सुलझा लेते हैं।
वहीं, आल इंडिया सुन्नी उलेमा काउंसिल के जनरल सेक्रे टरी हाजी मो. सलीस का कहना है कि, मुस्लिम अब जागरूक हो गए हैं। शरई अदालतों में जाने के बजाय वे आपस में बैठकर अपने मसले खुद सुलझा रहे हैं। दारुल कजाओं से जुड़े उलेमा का कहना है कि तीन तलाक के मसले आना लगभग बंद हो गए हैं।
- कानपुर में महिला शरई अदालत का गठन वर्ष 2017 में हुआ। मेरठ, लखनऊ, इलाहाबाद समेत विभिन्न जिलों में भी महिला शरई अदालत खोलने की प्रक्रिया शुरू की गई। इसमें कुल 161 मसले आए। इनमें 60 फीसदी पारिवारिक कलह और तीन तलाक से संबंधित रहे हैं।
- दारुल कजाओं और मुफ्तियों की दारुल इफ्ताओं में हर साल औसत सवा सौ मसले तलाक से संबंधित आते रहे हैं। इनमें अधिकांश में तलाक हो जाता था। 10 फीसदी में ही समझौते होते थे। 80 फीसदी नोटिसों का वर पक्ष जवाब नहीं देता था।