नवरात्र विशेष: डॉ. संजीवनी ने उठाया घाटों की सफाई का जिम्मा, पप्पी ने पर्यावरण सुरक्षा संग खड़ा किया कारोबार
Kanpur News: नवरात्र का पहला दिन प्रकृति की देवी को समर्पित है। इनके गुणों से प्रेरित महिलाएं समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निर्वाहन कर रहीं हैं। यहां पढ़िए ऐसी ही महिलाओं की विशेष कहानी…ये क्रम लगातार जारी रहेगा।
विस्तार
कानपुर में रविवार सुबह जब लोग पूरे सप्ताह की नींदें पूरी कर रहे होते उस वक्त डॉ. संजीवनी शर्मा और उनकी टीमें हाथों में दस्तानें पहनकर घाटों-घाटों पर प्लास्टिक का कचरा इकट्ठा करते हैं, धूप, सर्दी या बारिश इस अभियान को कोई रोक नहीं पाता और इसी का नतीजा है कि, 2021 में डॉ. संजीवनी की जगाई अलख से अब तक घाटों पर पड़े 120 मीट्रिक टन कचरा साफ कराया गया और रिवर प्लास्टिक रीसाइकिल कराई गई।
घाटों पर लोगों को प्लास्टिक का कचरा फैलाते देख डॉ. संजीवनी के मन में ये ख्याल आया कि क्यों न इसे रोका जाए। पर्यावरण की दिशा में ये जरूरी है, इसलिए उन्होंने मार्च 2021 में अपने 60 साथियों की मदद लेकर गंगा बैराज पर एक घंटे सुबह छह बजे से सात बजे तक प्लास्टिक कचरा बटोरा और इतनी देर में 500 किलो कचरा उठाया। डॉ.संजीवनी ने बताया कि उनके लिए यही प्रेरणा थी कि, एक घंटे में 60 लोगों ने इतना सारा कचरा हटा दिया और अगर हमेशा ऐसे ही कार्य करें तो सफलता बड़ी मिलेगी।
सोशल मीडिया का सहारा लिया और लोगों को व्हाट्सअप ग्रुप के माध्यम से जोड़ा वो लोग जो पर्यावरण प्रेमी हैं और उसके लिए कुछ करना चाहते हैं वो इस अभियान से जुड़ जाएं, और हुआ भी कुछ ऐसा ही लोग जुड़ते चले गए आज एक हजार लोग हमारे साथ जुड़े हैं जो हर रविवार सुबह 7 बजे घाटों पर जाकर सफाई करते हैं। इसमें विद्यार्थी भी सहयोग करते हैं, कभी आईआईटी, मेडिकल कॉलेज, यूनिवर्सिटी आदि जगहों के छात्र-छात्राएं इस अभियान से जुड़कर कचरा साफ करने में मदद कर रहे हैं। इसे आगे और बढ़ाना है।
लोगों को समझाना बड़ी चुनौती
डॉ. संजीवनी ने बताया कि घाटों पर जाकर सफाई करने से भी ज्यादा बड़ी चुनौती लोगों को समझाना है। अभी पितृ पक्ष में ही लोग प्लास्टिक सहित फूल गंगा में फेंकते दिखे, जिन्हें समझाया तो नाराज हुए। थोड़ा अधिक धैर्य रखना पड़ता है, उन्हें हमने इसके लिए करीब एक घंटे तक समझाया और उसका असर ये हुआ कि अगले एक घंटे में घाटों की सफाई वे लोग ही करते दिखे जो कुछ देर पहले प्लास्टिक गंगा में फेंक रहे थे।
पर्यावरण संरक्षण के लिए और भी उठाए कदम
डॉ. संजीवनी ने बताया कि प्लास्टिक से सबसे ज्यादा कचरा फैलता है, इसके लिए प्लास्टिक भी घरों से इकट्ठा करते हैं, शादी-बारात, भंडारों में प्लास्टिक का प्रयोग न हो इसके लिए बर्तन बैंक भी चला रहे हैं, जिसे जरूरत हो वो निशुल्क ले सकता है। लखनपुर स्थित घर पर ही एक सेंटर की शुरूआत की है, जहां पर लोग आकर प्लास्टिक रीसाइकिल के लिए देकर जाते हैं।
पर्यावरण की सुरक्षा के साथ खड़ा किया बड़ा कारोबार
दस साल पहले खेतों में बटाई पर काम करने वाली पप्पी सचान खेती-किसानी के जरिए गांव के पर्यावरण के साथ गांव की बड़ी संख्या में महिलाओं को आत्म निर्भर बनाने में जुटी है। 2015 में सरकारी सहायता से ऋण लेकर किराए वर खेत लिए और मोटे अनाज के साथ कई तरह की फसलों की खेती शुरू कर दी। जिसका अब बड़े स्तर पर विस्तार हो चुका है। उनकी इस मुहिम को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी सराहना कर चुके हैं।
किराये पर लिया खेत, महिलाओं को जोड़ा
घाटमपुर ब्लॉक के गोपालपुर की रहने वाली पप्पी वर्ष 2015 में मिलन के नाम से स्वयं सहायता समूह बनाया था। इसके जरिए सरकार की मदद से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएल) की ओर से समूह के तीन माह बीतने के बाद 15 हजार रुपये का ऋण मिला। जिससे उन्होंने दो बीघे खेत बलकट यानि किराये पर लेकर मूंग की खेती से शुरू की। जिससे पहली बार फसल में 50 हजार का मुनाफा हुआ।
25 से 30 हजार रुपये की इनकम
इसके बाद उन्होनें साथ में मां कुष्मांडा स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को भी अपने साथ जोड़ लिया। कुछ दिन बाद उन्होंने किराए पर 10 बीघे खेत ले लिया। जिससे अच्छा मुनाफा हुआ। इसके बाद सभी महिलाओं ने मिलकर 2017 में घर में मिनिरल वाटर का प्लांट लगाया। पहले घाटमपुर की बाजार में जाकर पानी की सप्लाई शुरू की। इसके बाद उन्होंने प्रेरणा नाम का अपना ब्रांड बनाया। इसके बाद पानी कैंपर के साथ पॉलिथीन में पैक कर बाजार में सप्लाई करना शुरू कर दिया। इससे आज महीनें में 25 से 30 हजार रुपये की इनकम कर ही हैं।
जुड़ते गए समूह बढ़ते गए रोजगार
पप्पी सचान बतातीं हैं कि वर्तमान में समय में पांच समूह साथ में जुड़कर काम कर रहे हैं। जिसमें मिलन स्वयं सहायता समूह, पहेली स्वयं सहायता समूह, उपवन स्वयं सहायता समूह, मॉ कुष्मांडा स्वयं सहायता समूह, मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह शामिल हैं। समूह की करीब 80 महिलाएं अलग-अलग काम की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। जिसमें खेती, नमकीन फैक्ट्री, अचार-मुरब्बा, बुकनू, पानी का प्लांट, दूध डेयरी, कैंटीन, पोल्ट्री फार्म का रोजगार कर रहीं। हर महिला को साल में डेढ़ से दो लाख रुपये की बचत हो रही है। जिससे खुद ही नहीं बल्कि उनके बच्चों का पालन पोषण और अच्छी शिक्षा भी दिलाने में सक्षम हैं।