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अगर बच्चे के स्वभाव में अचानक आ रहे हैं ये बदलाव तो हो जाएं सतर्क, अभिभावक जरूर पढ़ें ये खबर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Updated Tue, 11 Sep 2018 05:02 PM IST
सार
-बढ़ती आत्महत्याओं पर पीपीएन कॉलेज में संगोष्ठी
-आत्महत्या बढ़ने का मुख्य कारण लोगों का अंर्तमुखी होना
-तनाव से बचने के लिए सबसे जरूरी है वार्तालाप करना
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पीपीएन कॉलेज में आयोजित हुई संगोष्ठी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अक्सर चुप रहने वाला बच्चा अगर ज्यादा बोलने लगे या ज्यादा बोलने वाला चुप हो जाए तो अभिभावक अलर्ट हो जाएं। बच्चे से बात कर उसके मन की बात जानने की कोशिश करें। अगर बच्चा एक बार में नहीं बताता तो उस पर प्रेशर न डालें। उसकी गतिविधियों पर नजर जरूर रखें।
यह जानकारी आईआईटी कानपुर के मनोविज्ञान विभाग के प्रो. बृजभूषण ने दी। वे पीपीएन डिग्री कॉलेज में मनोविज्ञान विभाग की ओर से आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे।
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यह जानकारी आईआईटी कानपुर के मनोविज्ञान विभाग के प्रो. बृजभूषण ने दी। वे पीपीएन डिग्री कॉलेज में मनोविज्ञान विभाग की ओर से आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे।
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डेमो पिक
विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर आयोजित गोष्ठी में प्रो. बृजभूषण ने कहा कि आत्महत्या बढ़ने का मुख्य कारण लोगों का अंतरमुखी होना है। जब वह अपनी बात किसी से कह नहीं पाते और खुद ही दुख को सहते रहते हैं तो यह स्थिति उनको अवसाद की ओर ले जाती है। तनाव से बचने के लिए सबसे जरूरी है वार्तालाप करना। अपने दोस्त, रिश्तेदार, अभिभावक या शिक्षक किसी से भी बात करें। समस्या को खुद से सुलझाने से बेहतर है किसी की मदद लें।
उर्सला अस्पताल के डॉ. एसके निगम ने कहा कि सत्य घटनाओं पर आधारित टीवी सीरियल भी कहीं न कहीं तनाव, अवसाद बढ़ाने के दोषी हैं। सोशल मीडिया पर लगातार समय देना भी तनाव का एक कारण हो सकता है, लेकिन इसको पूरी तरह से दोष नहीं दिया जा सकता। आत्महत्याएं की कुछ घटनाएं क्षणिक होती हैं, आवेश में आकर लोग ऐसा कदम उठाते हैं। उन्होंने बताया कि यूपी और बिहार के मुकाबले चेन्नई और वेस्ट बंगाल में आत्महत्या करने वालों की संख्या अधिक है। संगोष्ठी में मनोविज्ञान की विभागाध्यक्ष डॉ. आभा सिंह, प्राचार्य डॉ. मेजर आईजे सिंह, उप प्राचार्य डॉ. एसपी सिंह, डॉ. बीडी पांडे, चीफ प्रॉक्टर डॉ टीबी सिंह, डॉ. श्वेता त्रिपाठी, डॉ. रश्मि मिश्रा, डॉ. रिजवाना मौजूद रहीं।
उर्सला अस्पताल के डॉ. एसके निगम ने कहा कि सत्य घटनाओं पर आधारित टीवी सीरियल भी कहीं न कहीं तनाव, अवसाद बढ़ाने के दोषी हैं। सोशल मीडिया पर लगातार समय देना भी तनाव का एक कारण हो सकता है, लेकिन इसको पूरी तरह से दोष नहीं दिया जा सकता। आत्महत्याएं की कुछ घटनाएं क्षणिक होती हैं, आवेश में आकर लोग ऐसा कदम उठाते हैं। उन्होंने बताया कि यूपी और बिहार के मुकाबले चेन्नई और वेस्ट बंगाल में आत्महत्या करने वालों की संख्या अधिक है। संगोष्ठी में मनोविज्ञान की विभागाध्यक्ष डॉ. आभा सिंह, प्राचार्य डॉ. मेजर आईजे सिंह, उप प्राचार्य डॉ. एसपी सिंह, डॉ. बीडी पांडे, चीफ प्रॉक्टर डॉ टीबी सिंह, डॉ. श्वेता त्रिपाठी, डॉ. रश्मि मिश्रा, डॉ. रिजवाना मौजूद रहीं।
डेमो पिक
इन बातों का रखें ध्यान
-धैर्य के साथ समस्याओं से संघर्ष करें।
-आशावादी बनें, सकारात्मक सोच रखें।
-आध्यात्मिक शक्ति को विकसित करें।
- सामाजिक सहयोग प्रदान करें और जरूरत पड़े तो सहयोग लेने से न हिचकिचाएं।
अभिभावकोें के लिए
-अभिभावक बच्चों के ऊपर दबाव न बनाएं। खुलकर जीने की आजादी दें, नजर बनाएं रखें।
-बच्चा अकेला रहना चाहता है, रात भर सोता नहीं तो उससे खुलकर बात करें।
-घर का माहौल तनाव मुक्त और दोस्ताना रखें, ताकि बच्चा खुद आकर अपने मन की बात कह सके।
-सोशल स्किल डेवलेप करें, यह बच्चों को समस्या से उबरने में मदद करती है।
-धैर्य के साथ समस्याओं से संघर्ष करें।
-आशावादी बनें, सकारात्मक सोच रखें।
-आध्यात्मिक शक्ति को विकसित करें।
- सामाजिक सहयोग प्रदान करें और जरूरत पड़े तो सहयोग लेने से न हिचकिचाएं।
अभिभावकोें के लिए
-अभिभावक बच्चों के ऊपर दबाव न बनाएं। खुलकर जीने की आजादी दें, नजर बनाएं रखें।
-बच्चा अकेला रहना चाहता है, रात भर सोता नहीं तो उससे खुलकर बात करें।
-घर का माहौल तनाव मुक्त और दोस्ताना रखें, ताकि बच्चा खुद आकर अपने मन की बात कह सके।
-सोशल स्किल डेवलेप करें, यह बच्चों को समस्या से उबरने में मदद करती है।