इटावा: मां कालिका देवी मंदिर है सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल, होती है देवी के साथ मजार की पूजा
देश में सांप्रदायिक तनावों की खबरों के बीच कुछ ऐसे भी स्थान और कहानियां हैं, जो देश में धार्मिक सद्भाव और प्रेम का संदेश दे रही हैं। ऐसा ही एक स्थान है, इटावा जिले का मां कालिका देवी का मंदिर। 150 से 200 साल पुराने इस मंदिर में देवी मां के साथ सैय्यद बाबा की मजार मौजूद है। इसकी सबसे खास बात यह है कि यह देवी मां का एक ऐसा मंदिर है, जहां आज भी मूर्ति स्थापित नहीं है और दशकों से दलित पुजारी ही पूजा करा रहे हैं।
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उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के बकेवर में कस्बा लखना स्थित मां कालिका देवी का मंदिर सांप्रदायिक सौहार्द की सबसे बड़ी मिसाल है। मंदिर परिसर में ही देवी के बगल में ही सैय्यद बाबा की मजार है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु देवी मां के साथ-साथ मजार की भी पूजा करते हैं।
राजा को देवी मां ने सपने में दिए दर्शन
क्षेत्र के पुराने लोग बताते हैं कि राजा जसवंत राव यमुना नदी पार कर कंधेसी गांव में स्थित देवी मंदिर में पूजा करने जाते थे। एक बार नदी में बाढ़ आ जाने से राजा पूजा करने नहीं जा सके थे। उसी रात देवी मां ने राजा को सपने में आकर दर्शन दिए थे और मंदिर बनवाने की बात कही। राजा ने मंदिर निर्माण शुरू किया और जयपुर से मां काली की मूर्ति स्थापित कराने को मंगाई गई। लेकिन मूर्ति स्थापना के पहले ही राजा की अकाल मृत्यु हो गई थी।
रानी लक्ष्मीबाई ने मंदिर का निर्माण पूरा कराया था, लेकिन मूर्ति आज भी स्थापित नहीं है। यह मंदिर लगभग डेढ़ सौ से दो सौ वर्ष पुराना बताया जाता है।
नवरात्र में लगता है भक्तों का जमावड़ा
देवी मां के इस विख्यात मंदिर पर हर वर्ष नवरात्रि के समय दूर-दराज से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पूजा अर्चना करने आते हैं। मां कालिका के दरबार में पूजा अर्चना करने वाले देवी भक्त देवी के साथ-साथ उसी मंदिर परिसर में देवी के बगल में ही स्थित सैय्यद बाबा की मजार पर भी पूजा अर्चना करते हैं। यह मंदिर सांप्रदायिक सौहार्द की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है, जहां लोग हिंदू धर्म के लोग देवी मां की पूजा अर्चना करने आते हैं। वहीं सैय्यद बाबा की मजार पर कौड़ियां, चादर और प्रसाद भी चढ़ाते हैं। मजार की देखभाल करने वाले अरमान अली कहते हैं कि वो कई पीढ़ियों से मजार पर पूजा कराते आ रहे हैं।
कस्बा लखना स्थित मां कालिका देवी का मंदिर एक सांप्रदायिक सौहार्द की सबसे बड़ी मिसाल है। वहीं, देवी मां के मंदिर पर दशकों से दलित पुजारी ही पूजा अर्चना कराते आ रहे हैं। यह अपने आप में भी एक अनूठी मिसाल है। दलित पुजारी कपिल कुमार कहते हैं की उनकी कई पीढियां मंदिर में पूजा कराती आ रही हैं।