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सत्ता संग्राम 2019: पंद्रह बरस बाद फिर आमने सामने दो तजुर्बेकार

Sun, 28 Apr 2019 03:53 AM IST
देव कश्यप पंकज प्रसून/आदर्श त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर
पंकज प्रसून/आदर्श त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर Published by: देव कश्यप Updated Sun, 28 Apr 2019 03:53 AM IST
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Lok Sabha elections 2019: After fifteen years, again face to face two experience leader
सत्यदेव पचौरी (भाजपा) और श्रीप्रकाश जायसवाल (कांग्रेस) - फोटो : अमर उजाला

कभी श्रमिक संगठनों के लाल झंडों से पटी रहने वाली कानपुर सीट का चुनावी रंग फिर सुर्ख है। सन 77 से बदले परिदृश्य में झंडों की लाली पर कभी भगवा तो कभी कांग्रेसी तिरंगे का रंग गहराता रहा। लाल इमली सरीखी पुरानी औद्योगिक इकाइयों की लालिमा जाती रही। प्रदूषण की कालिमा बढ़ती गई। इस चुनावी समर में कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल और भाजपा प्रत्याशी सत्यदेव पचौरी 15 साल बाद फिर आमने-सामने हैं।  2004 में बाजी जायसवाल के हक में गई थी। जायसवाल ने करीब पांच हजार वोटों से जीत हासिल की थी। 99 में विजेता रहे जायसवाल 2004 व 2009 का चुनाव भी जीते थे। 2014 में भाजपा के दिग्गज मुरली मनोहर जोशी की जीत ने जायसवाल का चौथी बार का सपना चूर किया था। पूर्व केंद्रीय मंत्री जायसवाल को वैश्य, मुस्लिमों संग गैर भाजपाई सोच वाले वर्ग से ज्यादा उम्मीदें हैं।

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दूसरे सिरे पर वैश्य वोटों को भाजपा का पारंपरिक वोट मानने वाले योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री सत्यदेव पचौरी के समर्थक ब्राह्मण, ठाकुर और पिछड़े वर्ग को अपनी बड़ी ताकत मानकर चल रहे हैं। गठबंधन से यह सीट सपा के खाते में होने के कारण अनुसूचित वर्ग का बड़ा हिस्सा साइकिल की जगह कमल से आकर्षित होने का अनुमान भी भाजपा के रणनीतिकारों को उत्साहित किए है। मोदी है तो मुमकिन है,  के नारे को मुमकिन बनाने में लगी भाजपा की टीम  2004 में मिली हार का हिसाब साफ कर लेना चाहती है।
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गठबंधन का मोर्चा संभाले पूर्व सपा विधायक रामकुमार के समर्थक नहीं मानते कि बसपा का वोट इधर-उधर खिसकेगा। बसपा-सपा के पारंपरिक वोट के साथ मुस्लिमों को भी साथ मान रहे हैं। हालांकि कानपुर संसदीय सीट से सपा या बसपा को कभी कामयाबी नहीं मिली है। भाजपा और कांग्रेस में से कोई भी खुद को कमतर नहीं मान रहा। दोनों दलों के दिग्गज नेता और स्टार प्रचारक चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में पूरी ताकत कानपुर पर लगाए हुए हैं।

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घटते उद्योग व बढ़ती बेरोजगारी बड़ा मुद्दा

छावनी विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले मुकेश यादव हों या सीसामऊ विधानसभा क्षेत्र निवासी विवेक गुप्ता इस चुनाव को मोदी पर केंद्रित मानते हैं। दोनों को ही चुनाव असल मुद्दों पर केंद्रित न होने का मलाल है। कहते हैं कि पुरानी मिलों व बड़े उद्योगों के दम पर पूरब के मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर में उद्योग घटते गए, बेरोजगारी बढ़ती गई। किदवई नगर निवासी गोपाल मिश्रा का कहना है कि हवा हो या गंगाजल अथवा भूगर्भीय पानी, प्रदूषण का ग्रहण हर आम और खास को प्रभावित कर रहा है। हालात में सुधार के वादे चुनाव में खूब होते हैं लेकिन दावे बनकर रह जाते हैं।

निर्दलीय बनर्जी पर शहर ने चार बार किया भरोसा
निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में एसएम बनर्जी ने 57, 62, 67, 71 में लोकसभा का चुनाव जीता। सन 77 में हुए चुनाव पर देश में आपातकाल का असर देखने को मिला था। जनता पार्टी से मनोहर लाल की जीत से पहली दफा कानपुर सीट निर्दलीय अथवा कांग्रेस से बाहर आई थी। पार्टी से राजाराम शास्त्री यहां जीते थे। कांग्रेस को कुल सात दफा जीत मिली। जनता पार्टी के विघटन के बाद भाजपा चार बार विजेता रही। इनमें से लगातार तीन जीत भाजपा के जगतवीर सिंह द्रोण के खाते की हैं। सन 89 के चुनाव में माकपा की सुभाषिनी अली चुनाव जीती थीं।

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