UP: कानपुर में वर्गीय चेतना के साथ अस्त हुआ वामपंथ, मिलों की हालत जैसे-जैसे बिगड़ी...बिखरता गया जनाधार
Kanpur News: वामपंथ रणनीतिकार बताते हैं कि एक खास बात और रही। वामपंथी प्रत्याशी कभी अकेले अपने बल पर चुनाव नहीं जीते। एसएम बनर्जी को कांग्रेस और अन्य दलों का समर्थन रहता रहा है और सुभाषिनी अली को जनता दल का समर्थन रहा था। वामपंथ के आपसी झगड़े ने इसे और गर्त में ला दिया।
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वामपंथ की गढ़ रही कानपुर नगर सीट में जैसे-जैसे वर्गीय चेतना के नारे धूमिल हुए, यह गढ़ भरभराता गया। मिलों की बिगड़ती हालत ने इसमें और तेजी ला दी और देखते-देखते वामपंथ का सितारा अस्त होता गया। पहले चुनाव में कांग्रेस से शुरुआत होने के बाद इस सीट पर वामपंथ का दबदबा रहा। वामपंथियों के अभियानों को राष्ट्र स्तर के दिग्गज गणेश शंकर विद्यार्थी, हसरत मोहानी, भगत सिंह के मित्र डॉ. गया प्रसाद कटियार, मौलाना संत सिंह यूसुफ आदि का समर्थन मिलता रहा। नगर सीट से वामपंथी प्रत्याशियों ने चुनाव भी जीते। इनमें श्रमिक नेता एसएम बनर्जी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चार बार और सीपीआईएम के टिकट पर सुभाषिनी अली एक बार चुनाव जीतीं।
इसके बाद वामपंथ का जनाधार सिमट गया। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया का गठन वर्ष 1925 में परेड पर हुआ था। मौलाना हसरत मोहानी इस आयोजन के मुख्य घटक थे। श्रमिकों के बीच वामपंथियों के लगातार अभियान चलाने से इस विचारधारा के पास वर्गीय सोच का बड़ा जनाधार था। आजादी के बाद जब चुनाव का दौर शुरू हुआ तो शुरुआत कांग्रेस से हुई। वर्ष 1952 में कांग्रेस के हरिहरनाथ शास्त्री सांसद चुने गए। इसके बाद दो बार मध्यावधि चुनाव हुए तो कांग्रेस के ही शिव नारायण टंडन सांसद हुए। इसी कार्यकाल में तीसरे सांसद प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के राजाराम शास्त्री हुए। पांच साल के कार्यकाल में तीन व्यक्ति सांसद बने।
नगर सीट वामपंथ का गढ़ जरूर थी, लेकिन पहला सांसद कांग्रेस का बना। जब 1957 का चुनाव आया, तो हालात बदल गए। यहां निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में वामपंथी श्रमिक नेता एसएम बनर्जी चुनाव मैदान में उतरे और लगातार चार बार चुनाव जीते। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के अलावा कांग्रेस समेत दूसरे छोटे-छोटे दल उनके समर्थन में रहे। उस समय लोकसभा चुनाव में मिल कर्मचारी जिसकी तरफ हो जाते विजयश्री भी उस ओर आ जाती। जब इमरजेंसी खत्म हुई और कांग्रेस के विरोध में एकतरफा जनता पार्टी को वोट पड़ा तो मनोहरलाल ने उन्हें वर्ष 1977 का लोकसभा चुनाव हरा दिया। इस चुनाव में एसएम बनर्जी की जमानत जब्त हो गई।
1980 से दरकने लगा था वामपंथ का आधार
इसके बाद जब अगला वर्ष 1980 का चुनाव हुआ तो सीट फिर कांग्रेस के हाथ में आ गई। आरिफ मोहम्मद खान चुनाव जीते और वर्ष 1984 में कांग्रेस के ही नरेशचंद्र चतुर्वेदी सांसद रहे। इस दौरान वामपंथ ने नगर सीट पर जड़ छोड़ना शुरू कर दी। मिलों की हालत खराब होने से वर्गीय चेतना भी विलुप्त होने लगी। राजनीति के क्षेत्र में मंदिर का नया मुद्दा आ गया और जातिवाद की गणित को बल मिला। वामपंथ का आधार दरक गया। इस बीच कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के अलावा कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी का भी गठन हो गया। वामपंथ का चिराग आखिरी बार पूरी ताकत से भभका और वर्ष 1989 में सुभाषिनी अली सीपीआईएम के टिकट पर चुनाव जीतीं। सीपीआईएम के टिकट पर चुनाव जीतने वाली वह पहली प्रत्याशी रहीं।
कभी अकेले दम पर चुनाव नहीं जीते वामपंथी प्रत्याशी
वामपंथ रणनीतिकार बताते हैं कि एक खास बात और रही। वामपंथी प्रत्याशी कभी अकेले अपने बल पर चुनाव नहीं जीते। एसएम बनर्जी को कांग्रेस और अन्य दलों का समर्थन रहता रहा है और सुभाषिनी अली को जनता दल का समर्थन रहा था। वामपंथ के आपसी झगड़े ने इसे और गर्त में ला दिया। वर्ष 1964 में वामपंथ के दो धड़ों सीपीआई और सीपीआईएम में बंट जाने से रही सही कसर भी पूरी हो गई। दोनों दलों के बीच इतनी खींचतान हुई कि वर्ष 1967 में सीपीआईएम से रामआसरे चुनाव लड़ गए। इस चुनाव में एसएम बनर्जी 77882 वोट पाकर जीते थे और सीपीआईएम के राम आसरे को सिर्फ 13389 वोट मिले और पांचवें स्थान पर रहे।
सीपीआईएम ने छह बार चुनाव लड़ा
सीपीआईएम ने छह बार लड़ा चुनाव जीत एक बार सीपीआईएम ने नगर लोकसभा सीट पर छह बार चुनाव लड़ा, लेकिन विजय एक बार ही मिली। शुरुआत रामआसरे ने की थी। वह वर्ष 1967 में पहली बार सीपीआईएम के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े लेकिन उन्हें 5.56 प्रतिशत (13389) वोट मिले। वह पांचवें स्थान पर रहे थे। इसके बाद वर्ष 1971 में सीपीआईएमए के टिकट पर शियो वर्मा चुनाव लड़े, उन्हें 1.28 प्रतिशत (3123) वोट मिले। इसके बाद वर्ष 1989 में सुभाषिनी अली को 41.06 प्रतिशत वोट मिले और वह चुनाव जीतीं। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1991 में सीपीआईएम के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन 70912 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहीं। उन्हें 17.60 प्रतिशत वोट मिला। वह वर्ष 1996 में लोकसभा चुनाव फिर लड़ीं। इस बार वह 146460 (25.69 प्रतिशत) वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहीं। आखिरी चुनाव सुभाषिनी अली ने वर्ष 2004 में लड़ा। इस बार 4558 वोट (0.74 प्रतिशत) पाकर वह पांचवें स्थान पर आ गईं।
मिलें बंद हुईं, राजनीतिक मुद्दे बदले
सीपीआईएम की नेता सुभाषिनी अली का कहना है कि मिलें बंद हो गईं। इससे वर्गीय चेतना का मामला धूमिल हो गया। साथ ही सांप्रदायिकता बढ़ गई। चुनाव हिंदू-मुस्लिम के मुद्दे पर होने शुरू हो गए। इसके साथ ही जातिवाद की राजनीति लोग करने लगे। इससे वामपंथ से लोग हटने लगे। सांप्रदायिकता और जातिवाद की राजनीति तो हम लोग कर नहीं सकते।
एक से एक दिग्गज जुड़े रहे वामपंथ से
सीपीआई के प्रांतीय सचिव अरविंदराज स्वरूप का कहना है कि वामपंथी दलों से सिर्फ श्रमिक नहीं जुड़े थे। आर्थिक नीतियों से प्रभावित होकर संपन्न वर्ग के लोग भी जुड़े थे। जब परेड में सीपीआई का गठन हुआ तो मौलाना हसरत मोहानी ने समारोह की कमान संभाली थी। शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी ने तैयारी में सहयोग दिया था। आजाद भगत सिंह के साथी और कालापानी की सजा पाने वाले डॉ. गया प्रसाद कटियार, शिव वर्मा और बाद में राम आसरे, सुल्तान नियाजी, मौलाना संत सिंह यूसुफ, हरवंश सिंह और दौलत राम तक यह शृंखला खिंच आई। यह किसान आंदोलन, श्रमिक आंदोलन और छात्र आंदोलनों का दौर रहा।
लोकसभा चुनाव वर्ष 1952
कुल प्रत्याशी- आठ, पांच निर्दलीय
चुनाव जीते- हरिहरनाथ शास्त्री (कांग्रेस)-88812 वोट, 64.91 प्रतिशत
रनर- रामशंकर अवस्थी (सोशलिस्ट) 17635 वोट, 12.89 प्रतिशत
मध्यावधि चुनाव (वर्ष 1952)
कुल प्रत्याशी- चार
चुनाव जीते- शिव नारायण टंडन (कांग्रेस)-60087 वोट, 42.93 प्रतिशत
रनर- प्रोफेसर राजाराम शास्त्री (पीएसपी)-45300 वोट, 32.36 प्रतिशत
मध्यावधि चुनाव (वर्ष 1952)
प्रत्याशी- तीन
चुनाव जीते- प्रोफेसर राजाराम शास्त्री (पीएसपी)-65739 वोट, 55.25 प्रतिशत
रनर- छैल बिहारी दीक्षित कंटक (कांग्रेस)-51951 वोट, 43.67 प्रतिशत
लोकसभा चुनाव वर्ष 1957
कुल प्रत्याशी- दो
चुनाव जीते- एसएम बनर्जी (निर्दलीय)-87612 वोट, 49.49 प्रतिशत
रनर- सूर्य प्रसाद अवस्थी (कांग्रेस)-70988 वोट, 40.10 प्रतिशत
लोकसभा चुनाव वर्ष 1962
कुल प्रत्याशी- चार
चुनाव जीते- एसएम बनर्जी (निर्दलीय-139039 वोट, 53.21 प्रतिशत
रनर- बिजोय कुमार सिन्हा (कांग्रेस)-80934 वोट, 30.97 प्रतिशत, एबीजेएस प्रत्याशी बाबूराम शुक्ला-20751 वोट, 7.87 प्रतिशत पीएसपी प्रत्याशी विमल मल्होत्रा-6526 वोट, 2.50 प्रतिशत निर्दल प्रत्याशी मोतीलाल-4039 वोट, 1.55 प्रतिशत
लोकसभा चुनाव वर्ष 1967
कुल प्रत्याशी- पांचचुनाव जीते- एसएम बनर्जी-77882 वोट, 32.34 प्रतिशत
रनर- जी दत्ता (कांग्रेस)-71365 वोट, 29.63 प्रतिशत एबीजेएस प्रत्याशी बाबूराम शुक्ला-46899 वोट, 19.47 प्रतिशत
निर्दलीय प्रत्याशी- एम. अली-14299 वोट, 5.94 प्रतिशत सीपीआईएम प्रत्याशी राम आसरे-13389 वोट, 5.56 प्रतिशत
लोकसभा चुनाव वर्ष 1971
कुल प्रत्याशी- पांच
चुनाव जीते- एसएम बनर्जी (कांग्रेस)-148845 वोट, 60.93 प्रतिशत
रनर- एबीजेएस प्रत्याशी बाबूराम शुक्ला-59646 वोट, 24.42 प्रत्याशी
निर्दलीय प्रत्याशी- मो. वसीम-24776 वोट, 10.14 प्रतिशत सीपीआईएम शियो वर्मा-3123 वोट, 1.28 प्रतिशत
निर्दलीय प्रत्याशी- लखनलाल-1334 वोट, 0.55 प्रतिशत
लोकसभा चुनाव वर्ष 1977
चुनाव जीते- मनोहरलाल (जनता पार्टी) 269629 वोट, 70.96 प्रतिशतरनर- नरेशचंद्र चतुर्वेदी (कांग्रेस)-95340 वोट, 25.09 प्रतिशत
निर्दलीय- भगवती प्रसाद दीक्षित-6799 वोट, 1.79 प्रतिशत
निर्दलीय- एसएम बनर्जी-5035 वोट, 1.33 प्रतिशत
निर्दलीय- रामचंद्र साथी-1677 वोट, 0.44 प्रतिशत
लोकसभा चुनाव वर्ष 1980
चुनाव जीते- आरिफ मोहम्मद खान (कांग्रेस)-163230 वोट, 45.49 प्रतिशतरनर- मकबूल हुसैन कुरैशी (जनता पार्टी)-88049 वोट, 24.54 प्रतिशत
निर्दलीय- भगवती प्रसाद दीक्षित-51717 वोट, 14.41 प्रतिशत
जनता पार्टी (एस) प्रत्याशी- मनोहरलाल-42795 वोट,11.93 प्रतिशत
निर्दलीय प्रत्याशी- ओम प्रकाश-2385 वोट, 0.66 प्रतिशत
लोकसभा चुनाव वर्ष 1984
कुल प्रत्याशी- पांचचुनाव जीते- नरेशचंद्र चतुर्वेदी (कांग्रेस) 214160 वोट, 56.92 प्रतिशत
रनर- सैयद शहाबुद्दीन (जनता पार्टी) 76791 वोट, 20.41 प्रतिशत
भाजपा प्रत्याशी- सोमनाथ शुक्ला-37451 वोट,9.95 प्रतिशत
एलकेडी प्रत्याशी- श्याम मिश्रा-23439 वोट, 6.23 प्रतिशत
निर्दलीय प्रत्याशी- अंबिका प्रसाद सुल्तानिया-7947 वोट, 2.11 प्रतिशत
लोकसभा चुनाव वर्ष 1989
कुल प्रत्याशी- पांच
चुनाव जीतीं- सुभाषिनी अली (सीपीआईएम)-174438 वोट, 41.06 प्रतिशत
रनर- जगतवीर सिंह द्रोण (भाजपा)-117851 वोट, 27.74 प्रतिशत
कांग्रेस प्रत्याशी- नरेशचंद्र चतुर्वेदी-98112 वोट, 23.10 प्रतिशत बीएसपी प्रत्याशी शरीफ-11219 वोट, 2.64 प्रतिशत
निर्दलीय प्रत्याशी- गुरु राजकुमार सिंह अंबेडकर-4159 वोट, 0.98 प्रतिशत