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मॉनीटरिंग में क्यों चूक रहा रिजर्व बैंक
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर
Updated Thu, 20 Oct 2016 04:28 PM IST
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आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल (फाइल फोटो)
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सहकारी बैंकों के 50 हजार खाताधारकों का करीब दो सौ करोड़ रुपया बैंकों में फंसा है। शहर के दो सहकारी बैंक बंद हो चुके हैं और बाकी बंदी की कगार पर हैं। सहकारी बैंकों में पैसा जमा करने वाले बेहद गरीब तबके के हैं। उनकी जीवन भर की कमाई फंसी है। इस सब में रिजर्व बैंक की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उसकी चुस्त मॉनीटरिंग के बावजूद जनता का धन कैसे फंसा। यदि फंसा भी है तो समय पर उसकी निकासी की व्यवस्था क्यों नहीं? सहकारी बैंकों के भ्रष्टाचार पर लगाम क्यों नहीं? आरबीआई गवर्नर डॉ. उर्जित पटेल शहर में हैं और देश की आर्थिक नीतियां तय करेंगे। उनका काम बड़ा है और जनता की आवाज छोटी। बात हमेशा उन तक नहीं पहुंचती। अमर उजाला का प्रयास है कि शहर के 50 हजार से अधिक सहकारी बैंकों के खाताधारकों की बात गवर्नर तक पहुंचे और वे उनका दर्द समझें। कोई व्यवस्था तय करें कि जनता का फंसा धन उनका जीवन रहते मिल सके।
यूसीसी बैंक में खाताधारकों का फंसा 125 करोड़
यूसीसी बैंक के करीब 26 हजार खाताधारक बैंक प्रबंधन के भ्रष्टाचार, सहकारिता विभाग और रिजर्व बैंक की अनदेखी के शिकार हैं। 32 करोड़ से अधिक का घोटाला और 40 फीसदी से अधिक एनपीए होने के कारण वर्ष 2013 में बैंक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। तब से आज तक न तो खाताधारकों को उनका पैसा मिला और न ही प्रबंधन पर कोई कार्रवाई हुई। खाताधारकों का करीब 125 करोड़ रुपया बैंक में फंसा है।
रिजर्व बैंक ने छिपाई एनपीए की सूचना
ब्रह्मावर्त बैंक वर्ष 2014 से बंद है। इसके 20 हजार खाताधारकों का करीब 75 करोड़ रुपये फंसा है। रिजर्व बैंक चार बार बैंक पर पाबंदी की तिथि बढ़ा चुका है। ब्रह्मावर्त बैंक में सालों तक होती रही अनियमितता और लगातार बढ़ते एनपीए के पीछे रिजर्व बैंक की मंशा पर भी सवाल उठे। कहा जा रहा है कि रिजर्व बैंक समय पर सचेत हो जाता और ग्राहकों को सचेत कर देता तो हजारों खाताधारकों के करोड़ों रुपये नहीं फंसते। ब्रह्मावर्त में लगातार बढ़ रही गड़बड़ियों के बावजूद रिजर्व बैंक की अनदेखी पर एजेंटों और कुछ खाताधारकों ने सूचना का अधिकार अधिनियम का सहारा लिया था लेकिन शीर्ष बैंक ने गोपनीयता का हवाला देकर न तो बैंक से संबंधित सूचना दी और न ही कोई कार्रवाई की।
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200 करोड़ के घपले बाद लगा ताला
इंडियन मर्केंटाइल कोआपरेटिव बैंक की शहर में एक ही शाखा थी। करीब दो सौ करोड़ रुपये के घपले के मामले में बैंक पर जांच बैठी और बाद में बंदी का आदेश आया। वर्ष 2013 में बैंक पर प्रतिबंध लगा था। बैंक के करीब पांच हजार खाताधारकों का करीब 100 करोड़ रुपया अभी भी फंसा है। रिजर्व बैंक पांच बार प्रतिबंध की तिथि बढ़ा चुका है लेकिन जनता के धन की निकासी के प्रयास नहीं कर रहा।
फेडरल कोआपरेटिव बैंक
फेडरल बैंक पर वर्ष 2000 के आसपास प्रतिबंध लगा था। बैंक का लाइसेंस घाटमपुर में शाखा खोलने के लिए दिया गया लेकिन रिजर्व बैंक देखरेख के बावजूद उसकी शाखाएं कानपुर में भी खुल गईं। आखिरकार कुछ साल बाद भ्रष्टाचार बाहर आया और बैंक के 66 फीसदी खाते एनपीए हो गए। रिजर्व बैंक ने तय नीति के तहत सिर्फ प्रतिबंध लगाया। जनता के फंसे धन की चिंता नहीं की। यहां के खाताधारक अभी भी फंसे धन की निकासी का इंतजार कर रहे हैं।
खैरात में बांटे लोन, वसूली भी नहीं की
यूनाइटेड मर्केंटाइल कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड में दस्तावेजों की जांच पड़ताल के बगैर खैरात की तरह लोन बांटने के घपले का खुलासा हुआ। लोन देने के बाद बैंक अधिकारियों ने कमीशनखोरी के चलते ऋण वापस लेने के प्रयास भी नहीं किए। नतीजा ये रहा कि बैंक के 40 फीसदी एकाउंट एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट) घोषित हो गए।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
बैंकों में गड़बड़ी की 13 शिकायतों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़ा रुख अपनाया। सुप्रीम कोर्ट के जज वाईएम इकबाल और सी नागप्पन ने रिजर्व बैंक से कहा है कि भ्रष्टाचार, अनियमितता और गड़बड़ी जैसे मामले में सूचना छिपाना औचित्यहीन है। सूचना छिपाने से भ्रष्टाचार और बढ़ेगा। बैंक के लेनदेन गोपनीय हो सकते हैं लेकिन भ्रष्टाचार कतई नहीं। लिहाजा बैंकों को घपले घोटाले की सूचनाएं आरटीआई के जरिये देने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए।
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यूसीसी बैंक में खाताधारकों का फंसा 125 करोड़
यूसीसी बैंक के करीब 26 हजार खाताधारक बैंक प्रबंधन के भ्रष्टाचार, सहकारिता विभाग और रिजर्व बैंक की अनदेखी के शिकार हैं। 32 करोड़ से अधिक का घोटाला और 40 फीसदी से अधिक एनपीए होने के कारण वर्ष 2013 में बैंक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। तब से आज तक न तो खाताधारकों को उनका पैसा मिला और न ही प्रबंधन पर कोई कार्रवाई हुई। खाताधारकों का करीब 125 करोड़ रुपया बैंक में फंसा है।
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रिजर्व बैंक ने छिपाई एनपीए की सूचना
ब्रह्मावर्त बैंक वर्ष 2014 से बंद है। इसके 20 हजार खाताधारकों का करीब 75 करोड़ रुपये फंसा है। रिजर्व बैंक चार बार बैंक पर पाबंदी की तिथि बढ़ा चुका है। ब्रह्मावर्त बैंक में सालों तक होती रही अनियमितता और लगातार बढ़ते एनपीए के पीछे रिजर्व बैंक की मंशा पर भी सवाल उठे। कहा जा रहा है कि रिजर्व बैंक समय पर सचेत हो जाता और ग्राहकों को सचेत कर देता तो हजारों खाताधारकों के करोड़ों रुपये नहीं फंसते। ब्रह्मावर्त में लगातार बढ़ रही गड़बड़ियों के बावजूद रिजर्व बैंक की अनदेखी पर एजेंटों और कुछ खाताधारकों ने सूचना का अधिकार अधिनियम का सहारा लिया था लेकिन शीर्ष बैंक ने गोपनीयता का हवाला देकर न तो बैंक से संबंधित सूचना दी और न ही कोई कार्रवाई की।
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200 करोड़ के घपले बाद लगा ताला
इंडियन मर्केंटाइल कोआपरेटिव बैंक की शहर में एक ही शाखा थी। करीब दो सौ करोड़ रुपये के घपले के मामले में बैंक पर जांच बैठी और बाद में बंदी का आदेश आया। वर्ष 2013 में बैंक पर प्रतिबंध लगा था। बैंक के करीब पांच हजार खाताधारकों का करीब 100 करोड़ रुपया अभी भी फंसा है। रिजर्व बैंक पांच बार प्रतिबंध की तिथि बढ़ा चुका है लेकिन जनता के धन की निकासी के प्रयास नहीं कर रहा।
फेडरल कोआपरेटिव बैंक
फेडरल बैंक पर वर्ष 2000 के आसपास प्रतिबंध लगा था। बैंक का लाइसेंस घाटमपुर में शाखा खोलने के लिए दिया गया लेकिन रिजर्व बैंक देखरेख के बावजूद उसकी शाखाएं कानपुर में भी खुल गईं। आखिरकार कुछ साल बाद भ्रष्टाचार बाहर आया और बैंक के 66 फीसदी खाते एनपीए हो गए। रिजर्व बैंक ने तय नीति के तहत सिर्फ प्रतिबंध लगाया। जनता के फंसे धन की चिंता नहीं की। यहां के खाताधारक अभी भी फंसे धन की निकासी का इंतजार कर रहे हैं।
खैरात में बांटे लोन, वसूली भी नहीं की
यूनाइटेड मर्केंटाइल कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड में दस्तावेजों की जांच पड़ताल के बगैर खैरात की तरह लोन बांटने के घपले का खुलासा हुआ। लोन देने के बाद बैंक अधिकारियों ने कमीशनखोरी के चलते ऋण वापस लेने के प्रयास भी नहीं किए। नतीजा ये रहा कि बैंक के 40 फीसदी एकाउंट एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट) घोषित हो गए।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
बैंकों में गड़बड़ी की 13 शिकायतों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़ा रुख अपनाया। सुप्रीम कोर्ट के जज वाईएम इकबाल और सी नागप्पन ने रिजर्व बैंक से कहा है कि भ्रष्टाचार, अनियमितता और गड़बड़ी जैसे मामले में सूचना छिपाना औचित्यहीन है। सूचना छिपाने से भ्रष्टाचार और बढ़ेगा। बैंक के लेनदेन गोपनीय हो सकते हैं लेकिन भ्रष्टाचार कतई नहीं। लिहाजा बैंकों को घपले घोटाले की सूचनाएं आरटीआई के जरिये देने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए।