देश में आज चर्चा का विषय बना नाम 'पद्मावत' या 'पद्मावती' दरअसल 15वीं शताब्दी में सबसे पहले लोगों के सामने आया था। रानी पद्मावती की खूबसूरती और जौहर की तारीफें सबसे पहले कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने की थी।
इतिहास के झरोखों में मलिक मोहम्मद जायसी का जन्म सन् 1500 के आसपास माना जाता है। वह उत्तर प्रदेश के जायस नामक स्थान के रहनेवाले थे। उनके नाम में जायसी शब्द का प्रयोग, उनके उपनाम की तरह किया जाता है। यह भी इस बात को सूचित करता है कि वह जायस नगर के निवासी थे। इस संबंध में उनका स्वयं भी कहना है-
जायस नगर मोर अस्थानू।
नगरक नांव आदि उदयानू।
तहां देवस दस पहुने आएऊं।
भा वैराग बहुत सुख पाएऊं॥
रायबरेली जिले में है जायस और अमेठी में बना है शोध संस्थान
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जानें मलिक मोहम्मद जायसी के बारे में
जायस नाम का एक नगर उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में आज भी है, जिसका एक पुराना नाम उद्याननगर 'उद्यानगर या उज्जालिक नगर' बतलाया जाता है। उसके कंचाना खुर्द नामक मोहल्ले में मलिक मुहम्मद जायसी का जन्म-स्थान भी बना है। कुछ लोगों की धारणा कि जायसी की किसी उपलब्ध रचना के अंतर्गत उसकी निश्चित जन्म-तिथि अथवा जन्म-संवत का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं पाया जाता।
एक स्थल पर जायसी कहते हैं-
भा अवतार मोर नौ सदी।
तीस बरिख ऊपर कवि बदी॥
मामूली जमींदार थे जायसी के पिता
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जायसी के पिता का नाम मलिक राजे अशरफ़ बताया जाता है और कहा जाता है कि वह मामूली जमींदार थे और खेती करते थे। स्वयं जायसी का भी खेती करके जीविका-निर्वाह करने की बात सामने आई है। जायसी ने अपनी कुछ रचनाओं में अपनी गुरु-परंपरा का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है, सैयद अशरफ़, जो एक प्रिय संत थे मेरे लिए उज्ज्वल पंथ के प्रदर्शक बने और उन्होंने प्रेम का दीपक जलाकर मेरा हृदय निर्मल कर दिया।। जायसी कुरुप व काने थे। एक मान्यता अनुसार वह जन्म से ऐसे ही थे लेकिन अधिकतर लोगों का मत है कि शीतला रोग के कारण उनका शरीर विकृत हो गया था। अपने काने होने का उल्लेख जायसी ने स्वयं ही इस प्रकार किया है -
एक नयन कवि मुहम्मद गुनी। अब उनकी दाहिनी या बाईं कौन सी आंख फूटी थी, इस बारे में उन्हीं के इस दोहे को सन्दर्भ लिया जा सकता है:
जायसी को बाएं कान से कम सुनाई पड़ता था
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मुहमद बाईं दिसि तजा, एक सरवन एक ऑंखि।
इसके अनुसार यह भी प्रतीति होती है कि उन्हें बाएं कान से भी उन्हें कम सुनाई पड़ता था। जायस में एक कथा सुनने को मिलती है कि जायसी एक बार जब शेरशाह के दरबार में गए तो वह इन्हें देखकर हंस पड़ा। तब इन्होंने शांत भाव से पूछा - मोहिका हससि, कि कोहरहि? यानि तू मुझ पर हंसा या उस कुम्हार (ईश्वर) पर? तब शेरशाह ने लज्जित हो कर क्षमा माँगी। एक अन्य मान्यता अनुसार वे शेरशाह के दरबार में नहीं गए थे, बल्कि शेरशाह ही उनका नाम सुन कर उनके पास आया था।
मलिक वंश के थे जायसी
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मलिक मुहम्मद जायसी (1477-1542) हिन्दी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण प्रेमाश्रयी धारा के कवि हैं। वह अत्यंत उच्चकोटि के सरल और उदार सूफ़ी महात्मा थे। जायसी मलिक वंश के थे। मिस्रमें सेनापति या प्रधानमंत्री को मलिक कहते थे। दिल्ली सल्तनत में खिलजी वंश राज्यकाल में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा को मरवाने के लिए बहुत से मलिकों को नियुक्त किया था जिसके कारण यह नाम उस काल से काफी प्रचलित हो गया था। इरान में मलिक जमींदार को कहा जाता था व इनके पूर्वज वहां के निगलाम प्रान्त से आये थे और वहीं से उनके पूर्वजों की पदवी मलिक थी। मलिक मुहम्मद जायसी के वंशज अशरफी खानदान के चेले थे और मलिक कहलाते थे। फिरोज शाह तुगलक के अनुसार बारह हजार सेना के रिसालदार को मलिक कहा जाता था। जायसी ने शेख बुरहान और सैयद अशरफ का अपने गुरुओं के रूप में उल्लेख किया है।