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Kargil Vijay Diwas: दुश्मन की गोलियां भी न भेद पाईं जीत का जज्बा, फतेह की दुर्गम चोटियां…पढ़ें वीरों की कहानी

Fri, 26 Jul 2024 09:34 AM IST
हिमांशु अवस्थी अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Fri, 26 Jul 2024 09:34 AM IST
सार

Kanpur News: कारगिल युद्ध में हिस्सा लेने वाले शूरवीरों ने बताया कि सामने दुश्मन था। लगातार गोलियां चल रही थीं पर न खून की परवाह की न दर्द की। बस एक ही जज्बा था कि युद्ध जीतना है।

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Kargil Vijay Diwas, enemys bullets could not penetrate spirit of victory, inaccessible peaks were conquered
Kargil Vijay Diwas - फोटो : amar ujala

विस्तार

26 जुलाई यानी की देश की सेनाओं के शौर्य का विजय दिवस। सेना के जवानों के अदम्य साहस के बल पर 60 दिन तक चले इस युद्ध में जवानों ने पाकिस्तानी सेना को करारी शिकस्त दी थी। 1999 में हुए इस युद्ध में शहर के शूरवीरों ने भी अपने साहस के दम पर दुश्मनों को घुटने टेकने को मजबूर किया था। पैर में गोली धंसने के बाद भी वह चोटी पर कब्जा जमाए रहे। युद्ध में हिस्सा लेने वाले शूरवीरों ने बताया कि सामने दुश्मन था। लगातार गोलियां चल रही थीं पर न खून की परवाह की न दर्द की। बस एक ही जज्बा था कि युद्ध जीतना है। 25 साल पहले हुए इस युद्ध में एक जवान ने हैंडग्रेनेड के हमले से अपने साथियों को बचाते हुए गहरे जख्म खाए। 50 से ज्यादा ऑपरेशन के बाद भी देश सेवा के प्रति उनका जज्बा आज भी बरकरार है। उनका एक बेटा सेना में जाने की तैयारी भी कर रहा है। पेश है एक रिपोर्ट...

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हैंडग्रेनेड से हुए घायल, 50 से ज्यादा ऑपरेशन के बाद भी देश सेवा का जज्बा
कल्याणपुर आवास विकास निवासी अजीत सिंह राष्ट्रीय राइफल (आरआर) में सिपाही थे। कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें असम से बुलाकर कुपवाड़ा भेजा गया था। जब ऊंची बर्फीली पहाड़ियों पर छिपा बैठा दुश्मन हैंडग्रेनेड से हमला कर रहा था, तब वे भी मुस्तैदी से जवाब दे रहे थे। वह बताते हैं कि इसी बीच दुश्मन का एक हैंडग्रेनेड उनके पास आकर गिरा। साथियों को बचाने के लिए उन्होंने हैंडग्रेनेड उठाकर फेंका तो वो फट गया, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। 50 से ज्यादा ऑपरेशनों के बाद अजीत की जिंदगी बच पाई थी लेकिन हौसला आज भी उनका आसमान पर है। वे अपने बेटे को सेना में बड़ा अफसर बनाना चाहते हैं। बताया कि बड़े बेटे देवराज स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। इसके साथ सीडीएस और सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। छोटा बेटा शिवराज पीएसआईटी से बीटेक कर रहा है। उनके पिता छठी प्रसाद सिंह भी सेना में थे। बड़े भाई अमर सिंह पहले सेना में और अब रेलवे में चीफ क्रू कंट्रोलर हैं, जबकि छोटा भाई गिरीश सिंह एयरफोर्स में सार्जेंट था। उनका पूरा परिवार देश सेवा में लगा रहा है।

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पैर में गोली धंसी रही पर चोटी पर डटे रहे
शहर के गूबा गार्डन निवासी कैप्टन रविंदर कुमार ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान वो सेना की पैराशूट रेजीमेंट में थे और सियाचिन में तैनात थे। वह ऑपरेशन मेघदूत के तहत वहां पर थे। जब युद्ध छिड़ गया तो इस ऑपरेशन के खत्म होने पर उनकी बटालियन को विकल्प दिया कि वो यहां से वापस जा सकते हैं लेकिन उनके सीओ कर्नल अशोक कुमार श्रीवास्तव ने अपनी यूनिट को कारगिल युद्ध में भेजने का विकल्प चुना। वहां से बटालिक सेक्टर में भेजा गया। इसके बाद पहाड़ी पर बैठे दुश्मन को खत्म करके चोटी फतह करने का आदेश हुआ। उन्होंने बताया कि 20 साथियों के साथ बफीर्ली चोटी पर चढ़े। इस दौरान दुश्मन गोलियां बरसा रहे थे। दुश्मनों को खत्म करने के जुनून में सभी साथी तेजी से चोटी पर चढ़े और दुश्मन का बंकर नष्ट करके पांच पाकिस्तानी सैनिकों को खत्म किया। उन्होंने बताया कि इस दौरान उनके चार साथी शहीद हो गए। उनके बाय जांघ पर गोली लग गई। इस दौरान बर्फ की पट्टी बांधी और बर्फ को पिघलाकर तीन दिन तक पानी पीते रहे और चोटी पर डटे रहे। 26 जुलाई को सीज फायर होने के बाद ही चोटी से नीचे आए। उनकी बहादुरी के लिए 26 जनवरी 2020 को तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायण ने सेना मेडल से सम्मानित किया।

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रेंगते हुए बढ़ते रहे, प्वाइंट 5770 पर कब्जा किया
कल्याणपुर निवासी सूबेदार अवधेश सिंह ने बताया कि सेना में 1987 से 2017 तक राजपूत रेजीमेंट की 27वीं यूनिट में रहे। कारगिल युद्ध के दौरान उनकी कंपनी को दुर्गम पहाड़ी प्वाइंट 5770 फतेह करने का आदेश हुआ। टीम लीडर मेजर नवजोत सिंह चीमा की अगुवाई में जवानों ने रेंग-रेंगकर ऊपर चढ़ना शुरू किया। ऊपर से दुश्मन लगातार गोलियां और बम चला रहे थे। हम लोग भी लगातार फायरिंग करने के साथ आगे बढ़ते गए। 27 जून को चोटी पर कब्जा कर लिया और पोस्ट कमांडर समेत 12 दुश्मनों को खत्म किया। इसके बाद दूसरे पहाड़ों पर छिपे दुश्मनों ने फिर से काउंटर अटैक किया। इसमें 28 जून को उनके साथी राजस्थान निवासी भगवान सिंह शहीद हो गए। कुछ छर्रे उनको भी लगे थे। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में सात लोग सेना में हैं। उनका बेटा रामवीर सिंह सेना में नायक है। भतीजा संदीप सिंह हवलदार है। बड़े भाई रामसजीवन सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

महीनों बंकरों में रहकर संभाले रहे संचार तंत्र
ग्राम जुगराजपुर चकरपुर मंडी के पास रहने वाले सूबेदार मेजर नरेंद्र कुमार मिश्रा ने बताया कि कारगिल युद्ध शुरू होने से पहले पाकिस्तानी रेंजरों ने मई में सांभा, कठुआ, आरएसपुरा सेक्टर में गोलाबारी शुरू कर दी थी। इंफेंट्री रेजीमेंट को वहां का मोर्चा संभालने का आदेश हुआ। इसके बाद महीनों तक बंकरों के नीचे रहकर संचार की व्यवस्था का जिम्मा संभाला। यहां पर रात दिन गोलाबारी हुई, लेकिन कभी संचार व्यवस्था को फेल नहीं होने दिया। उन्होंने बताया कि छोटे भाई स्वतंत्र कुमार मिश्रा नायक सूबेदार पद से सेना से सेवानिवृत्त हुए हैं।

बमबारी करके दुश्मनों को खदेड़ पोस्ट पर किया था कब्जा
अहिरवां चकेरी निवासी सूबेदार अमर सिंह 255 फील्ड रेजीमेंट में 22 नवंबर 1978 से 30 नवंबर 2006 तक सेवारत रहे। 26 जून 1999 से 31 जुलाई 1999 तक कारगिल ऑपरेशन के दौरान उनकी यूनिट बटालिक सेक्टर में तैनात थी। इसमें उनको गन पोजिशन आफिसर की ड्यूटी दी गई थी। उनको 105 एमएम की छह तोपों को संभालने की जिम्मेदारी मिली थी। उन्होंने 17 गढ़वाल रेजीमेंट को फायर स्पोर्ट दिया था और दुश्मन के ऊपर लगातार बमबारी करते हुए उसे भारी नुकसान पहुंचाया। इससे दुश्मन को पोस्ट छोड़कर भागना पड़ा और उस पोस्ट पर उनकी यूनिट ने कब्जा कर लिया।

दुश्मनों को घर में घुसकर मारा पर नहीं लौट सके जीवित
13 कुमाऊं रेजिमेंट में सिपाही रहे चकेरी के दहेली सुजानपुर निवासी सतेंद्र यादव कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मनों से लड़ते-लड़ते बॉर्डर पार चले गए थे। जहां दुश्मनों की गोलाबारी का जवाब देते समय हुए विस्फोट में वे शहीद हो गए थे। सतेंद्र के पिता को बेटे की शहादत पर गर्व है। वहीं, चाचा के शौर्य से प्रेरित होकर उनके भतीजे भी सेना में जाना चाहते हैं। शहीद के पिता अयोध्या प्रसाद (83) कहते हैं कि सतेंद्र का जिक्र होते ही जहां आंखें भर आती हैं वहीं, सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। बेटे ने दुश्मनों को घर में घुसकर मारा। बड़े भाई अर्जुन बताते हैं कि सतेंद्र को फिल्म सैनिक बहुत पसंद थी। यह संयोग ही है कि जिस तरह फिल्म में अभिनेता बॉर्डर पार पहुंच गया था, उसी तरह सतेंद्र भी सीमा पार चले गए थे, लेकिन वापस लौट न सके। इसी कारण भाई के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके। सतेंद्र के भतीजे आर्यन (23) भी उनसे प्रेरित होकर सैन्य अफसर बनना चाहते हैं।

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