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Kargil Vijay Diwas 2023: दुश्मन की गोलियां भी न भेद पाईं जीत का जज्बा, पढ़ें कारगिल के चार शूरवीरों की कहानी

Wed, 26 Jul 2023 10:52 AM IST
हिमांशु अवस्थी अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Wed, 26 Jul 2023 10:52 AM IST
सार

Kanpur News: 1999 में हुए युद्ध में शहर के शूरवीरों ने भी अपने साहस के दम पर दुश्मनों को घुटने टिकवा दिए थे। युद्ध में हिस्सा लेने वाले शूरवीरों ने बताया कि सामने दुश्मन था...लगातार गोलियां चल रही थीं, लेकिन न खून की परवाह की न दर्द की।

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Kargil, Vijay Diwas 2023, Even the bullets of the enemy could not penetrate the spirit of victory, four heroes
कारगिल युद्ध के शूरवीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

26 जुलाई यानी देश की सेनाओं के शौर्य का विजय दिवस। इसी दिन अदम्य साहस के बल पर 60 दिन तक चले कारगिल युद्ध में सेना के जवानों ने पाकिस्तानी सेना को करारी शिकस्त दी थी। 1999 में हुए इस युद्ध में शहर के शूरवीरों ने भी अपने साहस के दम पर दुश्मनों को घुटने टिकवा दिए थे। युद्ध में हिस्सा लेने वाले शूरवीरों ने बताया कि सामने दुश्मन था। लगातार गोलियां चल रही थीं पर न खून की परवाह की न दर्द की। बस एक ही जज्बा था कि लक्ष्य युद्ध जीतना है।

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पैर में गोली धंसी रही पर चोटी पर डटे रहे
गूबा गार्डेन में रहने वाले कैप्टन रविंदर कुमार ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान वह सेना की पैराशूट रेजीमेंट में थे और सियाचिन में तैनात थे। वह ऑपरेशन मेघदूत के तहत वहां पर थे। जब युद्ध छिड़ गया तो इस ऑपरेशन के खत्म होने पर उनकी बटालियन को विकल्प दिया कि वे यहां से वापस जा सकते हैं लेकिन उनके सीओ कर्नल अशोक कुमार श्रीवास्तव ने अपनी यूनिट को कारगिल युद्ध में भेजने का विकल्प चुना।
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वहां से बटालिक सेक्टर में भेजा गया। इसके बाद पहाड़ी पर बैठे दुश्मन को खत्म करके चोटी फतह करने का आदेश हुआ। उन्होंने बताया कि 20 साथियों के साथ बर्फीली चोटी पर चढ़े। दुश्मन गोलियां बरसा रहे थे। दुश्मनों को खत्म करने के जुनून में सभी साथी तेजी से चोटी पर चढ़े और दुश्मन का बंकर नष्ट करके पांच पाकिस्तानी सैनिकों को खत्म किया। उन्होंने बताया कि इस दौरान उनके चार साथी शहीद हो गए।

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उनके बाएं जांघ पर गोली लगी तो उन्होंने बर्फ की पट्टी बांधी ली। बताया कि स्थितियां ये थीं कि बर्फ को पिघलाकर तीन दिन तक पानी पीते रहे और चोटी पर डटे रहे। 26 जुलाई को सीज फायर होने के बाद ही चोटी से नीचे आए। उनकी बहादुरी के लिए 26 जनवरी 2020 को तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायण ने उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया।

रेंगते हुए बढ़ते रहे, प्वाइंट 5770 पर कब्जा किया
कल्याणपुर में रहने वाले सूबेदार अवधेश सिंह ने बताया कि सेना में 1987 से 2017 तक राजपूत रेजीमेंट की 27वीं में यूनिट में रहे। कारगिल युद्ध के दौरान उनकी कंपनी को दुर्गम पहाड़ी प्वाइंट 5770 फतेह करने का आदेश हुआ। इस प्वाइंट पर पाकिस्तान की सेना ने कब्जा कर लिया था। टीम लीडर मेजर नवजोत सिंह चीमा की अगुवाई में जवानों ने रेंग-रेंगकर ऊपर चढ़ना शुरू किया। ऊपर बैठा दुश्मन लगातार गोलियां और बम फेंक रहा था।
हम लोग भी लगातार फायरिंग करने के साथ आगे बढ़ते गए। 27 जून को चोटी पर कब्जा कर लिया और पोस्ट कमांडर समेत 12 दुश्मनों को खत्म किया। इसके बाद दूसरे पहाड़ों पर छिपे दुश्मनों ने फिर से काउंटर अटैक किया। इसमें 28 जून को उनके साथी राजस्थान निवासी भगवान सिंह शहीद हो गए। कुछ छर्रे उनके को भी लगे थे। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में सात लोग सेना में हैं। बेटा रामवीर सिंह सेना में नायक है। भतीजा संदीप सिंह हवलदार, बड़े भाई रामसजीवन सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

महीनों बंकरों में रहे और संचार तंत्र संभाले रहे
ग्राम जुगराजपुर चकरपुर मंडी के पास रहने वाले सूबेदार मेजर नरेंद्र कुमार मिश्रा ने बताया कि कारगिल युद्ध शुरू होने से पहले पाकिस्तानी रेंजरों ने मई में सांभा, कठुआ, आरएसपुरा सेक्टर में गोलाबारी शुरू कर दी थी। इंफेंट्री रेजीमेंट को वहां का मोर्चा संभालने का आदेश हुआ। इसके बाद महीनों तक बंकरों के नीचे रहकर उन्होंने संचार व्यवस्था का जिम्मा संभाला। रात दिन गोलाबारी हुई पर कभी भी संचार व्यवस्था को फेल नहीं होने दिया। उन्होंने बताया कि छोटे भाई स्वतंत्र कुमार मिश्रा नायक सूबेदार पद से सेना से सेवानिवृत्त हुए हैं।

दुश्मनों ने समझौते के बाद लगा दी थी माइंस
कर्रही, बर्रा बाईपास में रहने वाले वाले सूबेदार सुरेश सिंह ने बताया कि वह पैरा रेजीमेंट में थे। कारगिल युद्ध के दौरान रेजीमेंट के जवानों को बटालिक सेक्टर पहुंचने का आदेश हुआ। वह 11 जुलाई से 22 जुलाई तक वहां रहे और दुश्मनों के कब्जे से 29 ट्रिग हाइट, 509 चोटी पर फतेह की। उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान सात दिन का समझौता भी हुआ था। इस दौरान दुश्मनों ने जगह-जगह माइंस बिछा दी थी। इनकी चपेट में आने से कई जवान शहीद हो गए थे।

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