kanpur: सुहाग बचाने के लिए पत्नी ने दिया था पति को अपना लिवर, काल के गाल से खींच लाईं पति को
पूनम मिश्रा उन महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने सुहाग बचाने के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा दी। आखिर में अपने पति सुजान मिश्रा को काल के गाल से खींच लाईं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अपने सुहाग की सलामती के लिए रखने वाला करवा चौथ का व्रत हर महिला के लिए खास है। समाज में कई ऐसी महिलाएं हैं जिन्होंने सुहाग के लिए हर मुश्किलों का सामना किया। पति की ढाल बनीं और मौत को भी मात दे दी। पति की प्रेरणा बनीं और जिंदगी संभाली। ऐसी ही दो महिलाओं की कहानी आप भी पढ़िए...
अपना अंग देकर काल के गाल से खींच लाईं पति को
जरीब चौकी निवासी पूनम मिश्रा उन महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने सुहाग बचाने के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा दी। आखिर में अपने पति सुजान मिश्रा को काल के गाल से खींच लाईं। एक राष्ट्रीय बैंक के अफसर सुजान मिश्रा को लिवर की बीमारी हो गई थी। उनकी जान बचाने के लिए सिर्फ लिवर ट्रांसप्लांट ही आखिरी विकल्प बचा था। दंपती पर दो छोटे बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी थी। 10 अप्रैल 2021 को सुजान की अचानक तबीयत खराब हो गई। पूनम पति को दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल ले गईं। 13 अप्रैल को लगातार चले 14 घंटे के ऑपरेशन के दौरान पूनम का आधा लिवर निकालकर सुजान के लगाया गया। कई घंटों के बाद होश आने पर पूनम ने डॉक्टरों से अपने पति की ही सलामती पूछी। इस दौरान कोरोना काल चल रहा था। उन्होंने कई महीने दिल्ली के एक फ्लैट में गुजारे फिर कानपुर लौटीं। अपने साथ पति की भी देखभाल की इसमें उनके परिवार ने भी साथ दिया। अब दोनों स्वस्थ हैं। वह इस साल भी करवा चौथ पर पति के लिए निर्जला व्रत रख रहीं हैं।
जब पति पड़ा अकेला पत्नी ने संभाला व्यापार
13 सितंबर 2017 को अपने परिवार से विवाद के बाद अलग हुए पति राज कुमार अग्रवाल को टूटता और अवसाद में जाता देख विजय नगर निवासी प्रीति अग्रवाल ने व्यापार संभालने की ठानी। कौशलपुरी की एक खाली दुकान से शुरुआत करना एक बड़ी चुनौती थी। राज कुमार अपना पुश्तैनी कार्य फूलों का काम करने से कतरा रहे थे तो प्रीति ने एक स्टेशनरी की दुकान खोली। दो माह बाद हुई तेज बारिश से दुकान में पानी भर गया और माल खराब होने के साथ पूरी जमा पूंजी एकत्र कर लगाई गई लागत के एक लाख रुपये डूब गए। इस ‘चोट’ ने राजकुमार को और तोड़ दिया लेकिन प्रीति ने हार नहीं मानी। उन्हें पति को देखना था और बच्चों की परवरिश भी। प्रीति ने राजकुमार के पुश्तैनी काम को चुना। पहले फूल बेचने शुरू किए फिर गुलदस्ते बनाने का काम सीखा। वक्त के साथ हुनर भी आ गया जिससे जीवन की गाड़ी चल पड़ी। आज साढ़े चार साल से दुकान कौशलपुरी में चल रही है। अब दंपती मिलकर दुकान को संभाले हैं।