Kanpur Violence: प्रदेश में पांच वर्षों में पहली ऐसी वारदात, पुलिस कमिश्नरी की हुई फजीहत, आखिर क्या करते रहे अफसर
शुक्रवार को कानपुर में हुई हिंसा से पुलिस कमिश्नरी की काफी फजीहत हुई है। बता दें कि विगत पांच वर्षों में प्रदेश में पहली ऐसी वारदात हुई है, जिसमें दो समुदाय आमने-सामने आ गए हों।
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कानपुर में सवा साल पहले पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू होने के बाद अफसरों की संख्या में हुआ खासा इजाफा नई सड़क के बलवे में बेमानी साबित हुआ। कमिश्नरी में 10 आईपीएस, 6 एएसपी और 9 डीएसपी की फौज के बावजूद बवाल की पहले से भनक न लग सकी। सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इतने अफसर कर क्या रहे हैं।
पैदल गश्त से खानापूरी
शहर के संवेदनशील इलाके जाने-पहचाने हैं। पता भी था कि जुमे की नमाज के बाद विरोध-प्रदर्शन होने वाला है। इसके बावजूद कोई चौकसी नहीं दिखाई गई। बस आठ-दस पुलिसकर्मियों को तैनात कर खानापूरी कर दी गई। संवेदनशील इलाकों में क्या चल रहा है? कौन-कौन अराजक तत्व सक्रिय हो रहे हैं? आदि चीजों का कोई इनपुट पुलिस के पास नहीं है, जबकि थाना और चौकी पुलिस हर वक्त इन इलाकों में रहती है। पुलिस खुद जानकारी जुटाने के लिए मशक्कत करना नहीं चाहती। उच्चाधिकारी भी बेखबर रहते हैं। केवल पैदल गश्त से खानापूरी कर अफसर माहौल बनाते हैं।
एक दिन में खुल गई पोल
शहर में शुक्रवार से राष्ट्रपति दौरे पर हैं। पीएम और सीएम कानपुर देहात में थे। पहली बार ऐसा हुआ कि वीवीआईपी मूवमेंट के दौरान जुमे का दिन पड़ा और बंद का आह्वान किया गया। मगर कमिश्नरी पुलिस सुरक्षा व्यवस्था का संतुलन नहीं बना सकी। यही वजह रही कि बवाल शुरू होने के दौरान वहां पर पुलिस के नाम पर आठ-दस पुलिसकर्मी थे। इसलिए उपद्रवी काबू में नहीं आए।
पहली पुलिस कमिश्नरी, जहां बवाल हुआ
प्रदेश के चार शहरों नोएडा, लखनऊ, कानपुर और वाराणसी में कमिश्नरी व्यवस्था लागू है। बीते विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी दल के नेताओं ने इस बात को मुद्दा बनाया था कि बीते पांच वर्षों में प्रदेश में कहीं भी सांप्रदायिक झड़प नहीं हुई। मगर अब इस छवि पर कानपुर कमिश्नरी ने दाग लगा दिया है।