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कोरोना की मार: शादियां निरस्त, काम-धंधे का बज गया बैंड, रोजी-रोटी पर संकट
Wed, 19 May 2021 12:00 PM IST
शिखा पांडेय
अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Wed, 19 May 2021 12:00 PM IST
सार
कोरोना के चलते न सिर्फ शादियां निरस्त हुई हैं बल्कि काम-धंधा भी चौपट हो गया है। लोगों के सामने रोजी-रोटी पर संकट आ गया है।
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घोड़ी संचालक जमील, रमेश चंद्र कुंडे, राम प्रकाश शर्मा
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अधिकतर शादी समारोह कैंसिल होने या बिना धूमधाम के होने से होटल, गेस्टहाउस संचालकों को अरबों का नुकसान हुआ है। वहीं, इनसे जुड़े बैंड संचालक, घोड़ी, बग्घी, हलवाई, बैलून और डेकोरेशन का काम करने वालों के सामने रोजी-रोटी का संकट हो गया है। घोड़ी संचालकों के पास इतने रुपये नहीं हैं कि वो अपने जानवरों को पूरी खुराक दे सकें। जानवरों के खरीदार भी नहीं मिल रहे हैं। अब कर्जा देने वाले भी इनकार कर रहे हैं। बैंक में लोन का आवेदन भी किया है, लेकिन मिल नहीं सका है।
केस एक: लाल बंगला में रहने वाले घोड़ी संचालक जमील शादी समारोह में घोड़ी लेकर जाते थे। इनके पास चार घोड़ियां हैं। परिवार में बूढ़ी मां, पत्नी, बेटा-बहू और नातिन हैं। बैंड न बजने से काम धंधा महीनों से बंद है। सभी बुकिंग कैंसिल हैं। घर में रखी जमा-पूंजी और जेवर बेचकर जीविका चला रहे हैं। अब न खाने को है और न खिलाने को। घोड़ियों पर हर दिन पांच सौ रुपये से ज्यादा का खर्चा है। इस समय जानवरों को कोई खरीद भी नहीं रहा है।
केस दो: गड़हरिया मोहाल में रहने वाले गुड्डू हलवाई के बनाए खाने की मारवाड़ी समाज में मांग रही है। शहर के बड़े-बड़े होटलों में होने वाले आयोजनों में इनको बुलाया जाता था। अब शादी समारोह कैंसिल हो गए हैं। होटल भी बंद चल रहे हैं। ऐसे में कोई काम नहीं मिल रहा है। अब वो अपने परिवार के साथ हरदोई स्थित मंडोली गांव लौट गए हैं।
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केस तीन: गुमटी नंबर पांच में रहने वाले राजकुमार शादी, समारोहों में बैलून सजाते थे। शादी, समारोह न होने से काम नहीं मिल रहा है। जिन्होंने एडवांस दे दिया था, वो भी वापस ले लिया है। बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं। दो महीने से फीस भी नहीं जमा कर पाए हैं। घर चलाने के लिए खरबूजे का ठेला लगा रहे हैं।
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केस एक: लाल बंगला में रहने वाले घोड़ी संचालक जमील शादी समारोह में घोड़ी लेकर जाते थे। इनके पास चार घोड़ियां हैं। परिवार में बूढ़ी मां, पत्नी, बेटा-बहू और नातिन हैं। बैंड न बजने से काम धंधा महीनों से बंद है। सभी बुकिंग कैंसिल हैं। घर में रखी जमा-पूंजी और जेवर बेचकर जीविका चला रहे हैं। अब न खाने को है और न खिलाने को। घोड़ियों पर हर दिन पांच सौ रुपये से ज्यादा का खर्चा है। इस समय जानवरों को कोई खरीद भी नहीं रहा है।
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केस दो: गड़हरिया मोहाल में रहने वाले गुड्डू हलवाई के बनाए खाने की मारवाड़ी समाज में मांग रही है। शहर के बड़े-बड़े होटलों में होने वाले आयोजनों में इनको बुलाया जाता था। अब शादी समारोह कैंसिल हो गए हैं। होटल भी बंद चल रहे हैं। ऐसे में कोई काम नहीं मिल रहा है। अब वो अपने परिवार के साथ हरदोई स्थित मंडोली गांव लौट गए हैं।
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केस तीन: गुमटी नंबर पांच में रहने वाले राजकुमार शादी, समारोहों में बैलून सजाते थे। शादी, समारोह न होने से काम नहीं मिल रहा है। जिन्होंने एडवांस दे दिया था, वो भी वापस ले लिया है। बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं। दो महीने से फीस भी नहीं जमा कर पाए हैं। घर चलाने के लिए खरबूजे का ठेला लगा रहे हैं।
कोरोना के चलते बैंड संचालकों पर बड़ी आर्थिक चोट लगी है। शादी समारोह कैंसिल होने से 15 महीने से सही से काम नहीं मिला है। सरकार को इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की मदद करनी चाहिए। शहर के 20 फीसदी बैंड बंद हो गए हैं। लोगों से कर्जा लेकर किसी तरह गुजर बसर कर रहे हैं। कई लोग अपने गांव लौट गए हैं। - रमेश चंद्र कुंडे, अध्यक्ष, कानपुर बैंड संचालक वेलफेयर एसोसिएशन
यह मौसमी काम होता है। बैंड संचालकों को किराया, सैलरी भी देनी पड़ रही है। सरकार जैसे उद्योग या अन्य व्यापार के लिए पैकेज देती है, उसी तरह इस क्षेत्र के लोगों की भी मदद करे। शहर में दो सौ से ज्यादा बैंड संचालक हैं। जिनसे पांच हजार से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं। - राम प्रकाश शर्मा, संचालक न्यू स्वदेशी बैंड, जनरलगंज