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बिकरू कांड: कोर्ट ने चार बिंदुओं को परखा, फिर सुनाया फैसला; एक अपराध के लिए दो बार सजा नहीं...चल न सकी ये दलील

Thu, 07 Sep 2023 09:06 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, कानपुर
अमर उजाला नेटवर्क, कानपुर Published by: शाहरुख खान Updated Thu, 07 Sep 2023 09:06 AM IST
सार

कोर्ट ने चार बिंदुओं पर परखने के बाद दोषियों को अधिकतम सजा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की विधि व्यवस्थाओं का भी लाभ नहीं मिल सका। कोर्ट ने इन चार बिंदुओं पर दोषियों को खरा न पाने के कारण सजा सुनाई।

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Kanpur Bikru Case Court sentenced the culprits to maximum punishment After examining four points
विकास दुबे फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गैंगस्टर मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में दोषी अभियुक्तों की ओर से अधिवक्ताओं ने बचाव में कई तर्क पेश किए थे, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट की कई विधि व्यवस्थाओं का भी हवाला दिया गया लेकिन कोर्ट ने उन सभी तर्कों को कसौटी पर खरा नहीं पाया। विधि व्यवस्थाएं भी मामले से अलग होने के कारण अभियुक्तों को बचाने में मददगार साबित नहीं हो सकीं। कोर्ट ने इन चार बिंदुओं पर दोषियों को खरा न पाने के कारण सजा सुनाई।
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बिंदु 1-घटनास्थल पर मौजूदगी जरूरी नहीं
कुछ अभियुक्तों के अधिवक्ताओं का कहना था कि घटना के समय अभियुक्त मौके पर नहीं थे इसलिए उन्हें गैंग का सदस्य नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने माना कि अपराध करते समय गैंग के हर सदस्य का घटनास्थल पर मौजूद रहना जरूरी नहीं है। अपराध में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भी सहायता की जा सकती है। गैंग के सदस्य के मौके पर न होने के आधार पर अपराध में उसकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
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बिंदु 2-दर्ज मुकदमों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं
कुछ अभियुक्तों के अधिवक्ताओं का कहना था कि अभियुक्तों के खिलाफ बिकरू की घटना से संबंधित केवल एक ही मुकदमा चौबेपुर थाने में दर्ज है और उनके नाम भी अन्य अभियुक्तों के बताने के आधार पर सामने आए हैं। न्यायालय ने माना कि गैंगचार्ट में अभियुक्तों के खिलाफ दर्ज मुकदमों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं है। 
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गैंगचार्ट में दर्ज मुकदमे का उद्देश्य केवल यह दिखाना होता है कि गैंग के सदस्यों द्वारा कौन-कौन से अपराध किए गए हैं। कभी-कभी यह भी हो सकता है कि गैंग के सदस्यों द्वारा किए गए अपराध सामने न आए हों क्योंकि सक्रिय गैंग के सदस्यों के खिलाफ आम आदमी मुकदमा दर्ज कराने का साहस नहीं जुटा पाता।
 

बिंदु 3-लघु हस्ताक्षर से गैंगचार्ट विश्वसनीयता नहीं घटती
कुछ अभियुक्तों के अधिवक्ताओं का कहना था कि जिलाधिकारी कानपुर नगर और पुलिस अफसरों की संयुक्त बैठक नहीं हुई और गैंगचार्ट में उनके लघु हस्ताक्षर किए गए हैं। न्यायालय ने माना कि कुल 40 से अधिक व्यक्तियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई किए जाने की संस्तुति की गई थी लेकिन न्यायालय में 30 के खिलाफ ही आरोप पत्र दाखिल किए गए। सिर्फ लघु हस्ताक्षर या पद की मोहर लगे होने से यह नहीं कहा जा सकता कि जिलाधिकारी व पुलिस अधिकारियों ने गैंगचार्ट के अनुमोदन में कोई लापरवाही बरती।

बिंदु 4-एक अपराध के लिए दो बार सजा नहीं
कुछ अभियुक्तों के अधिवक्ताओं का कहना था कि कानूनन किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दंडित नहीं किया जा सकता। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था भी दाखिल की गई। न्यायालय ने माना कि इस मुकदमे में सिर्फ इस बात का विचारण होना था कि क्या अभियुक्तों ने गैंग बनाकर अवैधानिक क्रियाकलाप किए हैं। हत्या और गैंगस्टर मामले के न केवल तथ्य अलग हैं बल्कि गवाह भी अलग हैं। हत्या के मुकदमे की सुनवाई इस कोर्ट ने नहीं की। कुछ गवाहों के एक समान होने से यह नहीं कहा जा सकता कि एक ही मामले में दो बार विचारण किया गया।

अभियुक्त सहानुभूति के पात्र नहीं, अधिकतम सजा से ही न्याय
बिकरू कांड से जुड़े गैंगस्टर मामले में मंगलवार को 23 दोषियों को दस-दस साल कैद की सजा सुनाते हुए अपने 44 पेज के आदेश विशेष न्यायाधीश गैंगस्टर एक्ट दुर्गेश ने कई सख्त टिप्पणी भी कीं। सजा सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि अपराधी को अहसास होना चाहिए कि अपराध करने में मिला सुख, उसके लिए मिली सजा से ज्यादा नहीं था। आपराधिक न्याय का उद्देश्य अपराधी की तरह मानसिकता रखने वाले लोगों के लिए उदाहरण व चेतावनी प्रस्तुत करना है। अभियुक्त किसी भी नरमी या सहानुभूति के पात्र नहीं हैं। उन्हें अधिकतम सजा देने से ही न्याय का उद्देश्य पूरा होगा।

 

कोर्ट ने कहा कि सजा दिए जाने का एक सामाजिक उद्देश्य होता है। दोषसिद्ध व्यक्तियों को अपराध करने और पीडि़त को न्याय मिलने का अहसास होना चाहिए। अक्सर देखा जाता है कि लोग परिस्थितिवश या अज्ञानतावश अपराध की दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं। इस मामले में यह साफ है कि ज्यादातर दोषसिद्ध अभियुक्त सामान्य पृष्ठभूमि के हैं लेकिन वह विकास और हीरू दुबे के गैंग के सक्रिय सदस्य के रूप में सहयोग करते रहे हैं। कोई अपराधी पेशेवर व बड़ा अपराधी तब तक नहीं बनता जब तक सहयोगी उसका साथ नहीं देते। सहयोगी अपराधियों की भूमिका को किसी प्रकार कम नहीं आंका जा सकता। अगर अभियुक्त समझदारी से काम लेते तो आठ पुलिसकर्मियों का जीवन समाप्त नहीं होता।

कोर्ट को जय के खिलाफ आर्थिक स्थिति के मिले पर्याप्त साक्ष्य
कोर्ट ने 44 पेज के अपने आदेश में गैंगस्टर मामले के अभियुक्त जय वाजपेई पर भी विशेष टिप्पणी की। जय के अधिवक्ता शिवाकांत दीक्षित की ओर से रखे गए तर्कों और विधि व्यवस्थाओं का जय को लाभ नहीं मिल सका। कोर्ट ने माना कि जय के खिलाफ गैंग के सक्रिय सदस्य होने और आर्थिक स्थिति के संबंध में भी पर्याप्त साक्ष्य हैं, इसलिए वह सजा से नहीं बच सकता।

 

जय वाजपेई के अधिवक्ता ने कोर्ट में तर्क रखा कि जय के खिलाफ घटना के पहले चौबेपुर थाने में कोई मुकदमा दर्ज नहीं रहा इसलिए उसके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के अंतर्गत कार्रवाई नहीं की जा सकती। जय घटनास्थल पर मौजूद नहीं था और उसके पास से कोई बरामदगी भी नहीं हुई। न्यायालय ने माना कि यह जरूरी नहीं कि गैंग के सक्रिय सदस्यों के खिलाफ किसी विशेष थाने में ही सभी मुकदमे दर्ज हों। अभियुक्त जय के खिलाफ चौबेपुर थाने में एक मुकदमा दर्ज है। गैंग के हर सदस्य का घटनास्थल पर मौजूद होना जरूरी नहीं। जय के पास से क्या बरामदगी हुई यह हत्या के मुकदमे का सवाल है, गैंगस्टर के मुकदमे का नहीं।

 

जय के अधिवक्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट, इलाहाबाद व गुजरात हाईकोर्ट की विधि व्यवस्थाएं भी कोर्ट के सामने रखी गई थीं। इस पर कोर्ट का तर्क है कि यह विधि व्यवस्थाएं इस मामले की पृष्ठभूमि, तथ्य, परिस्थितियों व साक्ष्यों से पूरी तरह अलग हैं। जो इस मामले में अभियुक्त की मदद नहीं कर सकतीं।

रिपोर्ट लिखाने या गवाही देने की नहीं होती हिम्मत
कोर्ट ने माना कि हीरू दुबे उर्फ धर्मेंद्र विकास दुबे का घनिष्ठ साथी था। उसके द्वारा गैंग का निर्माण किया गया, गैंग में उसके अलावा कई सदस्य हैं। गैंग का उद्देश्य न केवल लोक व्यवस्था को अस्त-व्यस्त करना था बल्कि आर्थिक व भौतिक लाभ प्राप्त करना भी था। अभियुक्तों के खिलाफ आम आदमी मुकदमा दर्ज कराने और गवाही देने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
 
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