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कानपुर: महिला सशक्तीकरण का प्रतीक थीं अजीजन बाई, स्वतंत्रता संग्राम की इस नायिका से कांपते थे ब्रितानी सैनिक

Sun, 23 Jan 2022 02:36 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Sun, 23 Jan 2022 02:36 PM IST
सार

अजीजन बाई ने दबी, शोषित महिलाओं में उन्होंने आजादी की चिंगारी फूंकी और अपनी हर एक साथी को शोला बना दिया। तात्या टोपे से उनसे बात हुई, उसके बाद अजीजन ने अपनी सारी संपत्ति नाना साहब को दान कर दी।

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Kanpur: Ajijan Bai was a symbol of women empowerment
अजीजन बाई - फोटो : amar ujala

विस्तार

आजादी के आंदोलन की रणबांकुरी अजीजन बाई की जयंती पर कानपुर उन्हें नमन करता है। स्वतंत्रता संग्राम की इस नायिका से ब्रितानी सैनिक कांपते थे। देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में अजीजन बाई ने कानपुर की धरती पर बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वह महिला सशक्तीकरण की प्रतीक थीं।
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दबी, शोषित महिलाओं में उन्होंने आजादी की चिंगारी फूंकी और अपनी हर एक साथी को शोला बना दिया। तात्या टोपे से उनसे बात हुई, उसके बाद अजीजन ने अपनी सारी संपत्ति नाना साहब को दान कर दी। फिर महिलाओं के साथ मिलकर मस्तानी टोली बनाई। तात्या टोपे इस टोली को युद्ध कला और हथियार चलाने की शिक्षा देते थे।
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अजीजन बाई का जन्म 22 जनवरी वर्ष 1824 को मध्यप्रदेश के मालवा राज्य के राजगढ़ में हुआ था। जागीरदार शमशेर सिंह के यहां जन्मी इस कन्या का नाम अजंसा रखा गया। इकलौती संतान थीं और घर की बेहद लाडली बेटी। हरादेवी के मंदिर परिसर में लगने वाले मेले में घूमने गईं तो अंग्रेज सिपाही ने उन्हें अगवा कर लिया।
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पिता तो सदमा झेल नहीं पाए और चल बसे। अंग्रेज सिपाही ने उन्हें लाठी मोहाल के एक कोठे की मालकिन अम्मीजान के हाथों बेच दिया। यहां वे अजंसा से अजीजनबाई बन गईं। उनकी कला ने अजीजनबाई की शोहरत पूरे राज्य में फैला दी।

तभी 10 मई को 1857 की क्रांति का बिगुल बजा और अंग्रेजों के खिलाफ अजीजन बाई के दिल में जमी चिंगारी शोला बन धधक उठी। नागरिक मंच के संयोजक सुरेश गुप्ता ने बताया कि वह दिन में भेष बदल कर अंग्रेजों से मोर्चा लेतीं और रात में मुजरा करके गुप्त सूचनाएं नाना साहब को पहुंचातीं।


नवाबगंज और बिठूर के बीच अंग्रेज सिपाहियों को उन्होंने मौत के घाट उतार दिया। वहां अंग्रेजों की एक दूसरी टुकड़ी ने उन्हें पकड़कर जनरल हैवलाक के सामने पेश किया। उन्होंने माफी मांगने से मना कर दिया। कैद में उनके साथ क्रूरता की हद पार कर दी गई। बाद में उन्हें तोप के मुंह पर बांध कर उड़ा दिया गया। शरीर तो चीथड़े हो गया लेकिन उनकी गाथा अमर हो गई और वह आजादी के दीवानों के लिए प्रेरणा बन गईं। 
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