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धार्मिक मामलों की मनमानी व्याख्या न करे न्यायपालिका और सरकार- ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

Mon, 22 Nov 2021 02:32 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Mon, 22 Nov 2021 02:32 AM IST
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Judiciary and government should not interpret religious matters arbitrarily - All India Muslim Personal Law Board
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का अधिवेशन - फोटो : अमर उजाला
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि धार्मिक मसलों में न्यायपालिका और सरकार को मनमानी व्याख्या नहीं करनी चाहिए। जाजमऊ के डीटीएस मदरसा में आयोजित दो दिवसीय अधिवेशन के आखिरी दिन रविवार को इस मसले पर बोर्ड ने प्रस्ताव भी पारित किया। पदाधिकारियों ने कहा कि इस समय ऐसी व्याख्याएं हो रही हैं, जिसे बोर्ड सही नहीं समझता। ऐसे मामलों में सरकार हो या न्यायपालिका, उसे संबंधित धर्म के विशेषज्ञों और विद्वानों से मशविरा करना चाहिए।
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इसके अलावा बोर्ड ने किसी भी धर्म और उसके महापुरुषों पर अशोभनीय टिप्पणी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कानून बनाने की मांग सरकार से की। अधिवेशन में बोर्ड के पदाधिकारियों ने 11 प्रस्तावों पर चर्चा कर उन्हें अपने एजेंडे में शामिल किया। समापन के बाद पत्रकारों से बातचीत में बोर्ड के कार्यकारिणी सदस्य डॉ. कासिम रसूल इलियास ने बताया कि अधिवेशन में मौजूदा हालात पर चिंतन किया गया।
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सांप्रदायिक और नफरत का माहौल बनाने वालों पर खामोशी अख्तियार करने के बजाय कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि काशी में ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा में धर्मस्थलों के बारे में चर्चा कर सांप्रदायिक माहौल बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए किया जा रहा है, जबकि 1991 में धर्मस्थलों की सुरक्षा पर बने कानून में यह साफ है कि 15 अगस्त 1947 के बाद देश में धर्मस्थलों का जो भी स्टेटस था, वह वैसा ही रहेगा। भीड़ हिंसा (मॉब लिंचिंग) में किसी बेगुनाह की हत्या कर वीडियो को वायरल कर भय का माहौल बनाया जाता है, लेकिन ऐसे लोगों पर कोई कार्रवाई न होना निंदनीय है। 
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इस्लाम में दबाव, लालच देकर धर्मांतरण की इजाजत नहीं
अधिवेशन में इस बात की भी चर्चा हुई कि किसी को लालच देकर या दबाव बनाकर धर्मांतरण कराने की इजाजत इस्लाम कतई नहीं देता। यही वजह है कि भारत में एक हजार साल हुकूमत करने के बाद भी मुसलमान आज अल्पसंख्यक हैं। आज तक किसी मुसलमान ने पुलिस से यह नहीं कहा कि दबाव बनाकर उसे मुस्लिम बनाया गया। उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण के नाम पर मुसलमानों की गिरफ्तारियां करना अफसोसनाक है। यह संविधान में दिए गए धर्म के प्रचार की आजादी के अधिकार के खिलाफ है। सरकार को किसी के साथ अन्याय नहीं करना चाहिए। 

कॉमन सिविल कोड भारतीय संविधान के खिलाफ
बोर्ड के पदाधिकारियों ने बताया कि भारत में सिर्फ मुसलमान नहीं, बल्कि हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध और तमाम जातियों-जनजातियों के अलग-अलग रिवाज हैं। ऐसे में कॉमन सिविल कोड भारतीयों को संविधान में मिले फैमिली लॉ के खिलाफ है। पैगंबर-ए-इस्लाम की शान में गुस्ताखी करने पर भारत की बदनामी दुनिया भर में होती है, क्योंकि पैगंबर-ए-इस्लाम भारतीय ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के मुसलमानों के आखिरी नबी हैं। उनकी शान में कोई गुस्ताखी नहीं देख-सुन नहीं सकता।

इन बिंदुओं पर भी हुई चर्चा
बोर्ड ने सादगी से निकाह करने, मुसलमानों पर हुए झूठे मुकदमों को सरकार से वापस लेने, इस्लाम धर्म के बारे में अन्य धर्म के लोगों से पढ़ने और जानने की अपील करने, घरेलू झगड़ों को कोर्ट में ले जाने के बजाय मध्यस्थता और शरई अदालतों में सुलझाने की अपील की, जिससे कि अदालतों पर मुकदमों पर भार न बढ़े।
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