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लॉकडाउन में चली गई थी नौकरी, जूझते-हांफते लौटा गांव, घर की चौखट से चंद कदमों पहले थम गईं सांसें

Fri, 29 May 2020 01:02 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चित्रकूट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चित्रकूट Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Fri, 29 May 2020 01:02 AM IST
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job had gone into lockdown, when he back home, few steps before the house he died
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : amar ujala
लॉकडाउन के दौरान दिल्ली में घिरे 45 वर्षीय पीर अली खराब हालात से जूझते हुए जैसे-तैसे चित्रकूट स्थित अपने गांव पहुंचे लेकिन घर में दाखिल होने के अरमान पूरे नहीं हो पाए। घर से महज 50 मीटर दूरी पर अचानक कदम लड़खड़ाए और देखते ही देखते सांसों ने साथ छोड़ दिया। 
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घर को आर्थिक मजबूती देने के मकसद से पहाड़ी थाना क्षेत्र के बसहर गांव से पीर अली ने चार साल पहले दिल्ली का रुख किया था। दिल्ली सीमा पर आनंद विहार की एक फर्म में सिक्योरिटी गार्ड का काम मिल गया था। काम को कामयाब होता देख बेटे सोनू अली को भी वहीं बुला लिया था। उसने भी पिता की तरह गार्ड की जिम्मेदारी संभाल ली थी।
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ठीक चल रही जिंदगी में पीर अली को टीबी ने घेर लिया। कुछ समय बाद लॉकडाउन ने नौकरी छीन ली। आर्थिक स्थिति खराब हुई तो 25 मई को पीर अली मथुरा में काम कर रहे दूसरे बेटे इलाही के पास निकल पड़े। टीबी के मरीज होने के बावजूद कई किलोमीटर पैदल चले। गुजारिश कर वाहनों से लिफ्ट भी ली।
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मथुरा के सफर तक शारीरिक क्षमताएं जवाब देने लगीं तो गुरुवार सुबह 15 हजार में टैक्सी बुक कराके बेटे के साथ गांव पहुंचे। गुरुवार शाम गांव में टैक्सी चालक ने पीर अली को उतारा। घर की ओर कदम बढ़ाते समय अचानक लड़खड़ाए और गिर पड़े। इलाज की कोशिश से पहले ही दम तोड़ दिया। स्वास्थ्य विभाग ने एहतियात के तौर पर पीर अली के शव से सैंपल लिया है।

बेटे सोनू का भी सैंपल लिया गया है। थाना प्रभारी सुशील चंद्र शर्मा ने बताया कि मृतक का कोरोना वायरस प्रोटोकॉल तरीके से अंतिम संस्कार करा दिया गया है। एहतियात के तौर पर घर के सदस्यों को क्वारंटीन रहने को कहा गया है।

अपनी मिट्टी मिल जाने की ख्वाहिश हुई पूरी
पीर अली के गांव पहुंचकर घर में दाखिले से पहले दम तोड़ देने से ग्रामीण सन्न रह गए। चर्चाओं में कुछ ने बताया कि फोन पर अपने गांव को याद करते थे। नौकरी जाने के बाद लौटने को बेताब थे। अंतिम समय में घर मयस्सर नहीं हुआ लेकिन अपने गांव तक पहुंचने की हसरत पूरी हो गई।
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