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मर रहा अस्पताल, मरीज कौन बचाए!
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर
Updated Sun, 28 Dec 2014 02:36 AM IST
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‘मैंने मां को तिल-तिल कर क्षण-क्षण मरते देखा है, कहते हैं कैंसर सब कुछ लेकर सिर्फ मौत देता है’। किसी की मां, किसी के बाप, किसी का भाई-बहन, भाभी, चाचा, ताऊ.....कोई न कोई अपना कैंसर से जरूर तड़पा होगा।
कुछ ही बच पाते हैं वर्ना तो आंसू सूख जाते हैं। अफसोस, 50 लाख से ज्यादा की आबादी वाले अपने शहर में इसके इलाज के मुकम्मल इंतजाम नहीं हैं।
स्मार्ट सिटी, हाईटेक सिटी, मेट्रो, सुपर स्पेशियालिटी हॉस्पिटल...न जाने क्या-क्या ख्वाब सरकारी कागजों में सज रहे हैं और हकीकत यह है कि शहर के एकमात्र जे के कैंसर हास्पिटल के लिए सुयोग्य डॉयरेक्टर, कैंसर सर्जन और आईसीयू तक नहीं है।
सीनियारिटी के चक्कर में प्रदेश सरकार ने विशेषज्ञता को नजरअंदाज करके पैथोलॉजिस्ट को कैंसर अस्पताल का डॉयरेक्टर बना दिया है।
सात करोड़ की मशीन हो रही कबाड़
संस्थान में लगी लिनियर एसीलरेटर मशीन कबाड़ होने की ओर है। मशीन की कीमत तकरीबन सात करोड़ रुपये है। इस मशीन से रेडियोथेरेपी होती है। मशीन ठीक न होने के पीछे का कारण बजट की कमी बताई जा रही है।
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यदि मशीन जल्द न ठीक हुई तो भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर मुंबई का एटामिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड रेडिएशन का लाइसेंस रद कर देगा।
हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर
जेके कैंसर संस्थान में सुविधाओं के संबंध में जन उत्थान विधिक सेवा समिति की सचिव सारिका द्विवेदी और अध्यक्ष आशुतोष द्विवेदी एडवोकेट ने 28 अक्तूबर 14 को हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की है।
12 दिसंबर को चीफ जस्टिस डॉ. धनंजय यशवंत चंद्रचूड और प्रदीप कुमार सिंह बघेल ने डॉयरेक्टर समेत अन्य पक्षों से जवाब दाखिल करने को कहा था।
किसी के उपस्थित न होने पर कोर्ट ने 30 जनवरी 15 तक सभी तथ्य इकट्ठा कर कोर्ट में दाखिल करने को कहा है। कोर्ट छह फरवरी 15 को इस मामले की नए तरीके से सुनवाई करेगा।
बोले जिम्मेदार
कैंसर में सबसे बड़ा काम पैथोलॉजिस्ट का ही होता है। खून की जांच कर पैथोलॉजिस्ट ही बीमारी के बारे में बताता है। यूं कह लें कि पैथोलॉजिस्ट बैक बोन होता है। अस्पताल में आने वाले हर मरीज को संपूर्ण इलाज देने की कोशिश होती है।
मुझे चार्ज लिए कुछ ही समय हुआ है। जो कमियां हैं, उन्हें दूर करने के लिए शासन से बातचीत की जाएगी।
डॉ. एमपी मिश्रा, डॉयरेक्टर
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कुछ ही बच पाते हैं वर्ना तो आंसू सूख जाते हैं। अफसोस, 50 लाख से ज्यादा की आबादी वाले अपने शहर में इसके इलाज के मुकम्मल इंतजाम नहीं हैं।
स्मार्ट सिटी, हाईटेक सिटी, मेट्रो, सुपर स्पेशियालिटी हॉस्पिटल...न जाने क्या-क्या ख्वाब सरकारी कागजों में सज रहे हैं और हकीकत यह है कि शहर के एकमात्र जे के कैंसर हास्पिटल के लिए सुयोग्य डॉयरेक्टर, कैंसर सर्जन और आईसीयू तक नहीं है।
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सीनियारिटी के चक्कर में प्रदेश सरकार ने विशेषज्ञता को नजरअंदाज करके पैथोलॉजिस्ट को कैंसर अस्पताल का डॉयरेक्टर बना दिया है।
सात करोड़ की मशीन हो रही कबाड़
संस्थान में लगी लिनियर एसीलरेटर मशीन कबाड़ होने की ओर है। मशीन की कीमत तकरीबन सात करोड़ रुपये है। इस मशीन से रेडियोथेरेपी होती है। मशीन ठीक न होने के पीछे का कारण बजट की कमी बताई जा रही है।
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यदि मशीन जल्द न ठीक हुई तो भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर मुंबई का एटामिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड रेडिएशन का लाइसेंस रद कर देगा।
हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर
जेके कैंसर संस्थान में सुविधाओं के संबंध में जन उत्थान विधिक सेवा समिति की सचिव सारिका द्विवेदी और अध्यक्ष आशुतोष द्विवेदी एडवोकेट ने 28 अक्तूबर 14 को हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की है।
12 दिसंबर को चीफ जस्टिस डॉ. धनंजय यशवंत चंद्रचूड और प्रदीप कुमार सिंह बघेल ने डॉयरेक्टर समेत अन्य पक्षों से जवाब दाखिल करने को कहा था।
किसी के उपस्थित न होने पर कोर्ट ने 30 जनवरी 15 तक सभी तथ्य इकट्ठा कर कोर्ट में दाखिल करने को कहा है। कोर्ट छह फरवरी 15 को इस मामले की नए तरीके से सुनवाई करेगा।
बोले जिम्मेदार
कैंसर में सबसे बड़ा काम पैथोलॉजिस्ट का ही होता है। खून की जांच कर पैथोलॉजिस्ट ही बीमारी के बारे में बताता है। यूं कह लें कि पैथोलॉजिस्ट बैक बोन होता है। अस्पताल में आने वाले हर मरीज को संपूर्ण इलाज देने की कोशिश होती है।
मुझे चार्ज लिए कुछ ही समय हुआ है। जो कमियां हैं, उन्हें दूर करने के लिए शासन से बातचीत की जाएगी।
डॉ. एमपी मिश्रा, डॉयरेक्टर