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Coronavirus: इस गांव में मांओं के लिए कोरोना कैसे बना खुशी का कारण, रोने के लिए मजबूर कर देगी ये कहानी

Thu, 04 Jun 2020 08:07 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Thu, 04 Jun 2020 08:07 PM IST
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How Corona became a boon for mothers in this village
मां माया के साथ बैठा धीरू - फोटो : amar ujala
कोरोना वायरस दुनियाभर में अपना कहर बरपा रहा है। लाखों लोग इस वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। लाखों लोगों की मौत हो चुकी है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के कानपुर में ओरियारा गांव की मांओं के लिए कोरोना खुशी का कारण बन गया है।
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ओरियारा गांव की 50 वर्षीय सुमन की उजाड़ हुई बगिया वर्षों बाद फिर से हरी-भरी हो गई है। वह बीते पांच वर्षों से घर में अकेले जिंदगी काट रही थीं। ऐसे में इनके लिए कोरोना खुशी का कारण बनकर आया। रोजी-रोटी की तलाश में महाराष्ट्र के पुणे में बढ़ईगिरी का काम करने वाले इनके दोनों बेटे घर वापस आ गए हैं।
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कानपुर-सागर हाईवे पर बिठूर विधानसभा के इस गांव में कई घर अभी तक बुजुर्गों का डेरा बने हुए थे। कहीं मां-बाप तो कहीं सिर्फ मां या बाप अकेले बचे थे। गांव में 27 लोग बाहरी राज्यों से वापस अपने घर आ गए हैं। इन कमाऊ बेटों के अपने दर्द जरूर हैं, लेकिन इनके चलते वर्षों बाद घर में रौनक देखने वाले बुजुर्गों की खुशी का ठिकाना नहीं है। 
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How Corona became a boon for mothers in this village
मां भूरी के साथ राजनाथ - फोटो : amar ujala
सुमन के दोनों बेटे बालेंद्र और रामू करीब 10 वर्ष पहले पुणे चले गए थे। तब परिवार में पति और दो बेटियां भी थीं। दोनों साल में एक-दो बार आते थे। करीब छह वर्ष पहले सुमन के पति की मौत हो गई। दोनों बेटियों का भी विवाह हो गया। तब से वह घर में अकेले रह रही हैं। बताती हैं कि बीते छह वर्षों में बीमारी होने पर कोई पानी देने वाला भी नहीं था।

अकेले रहते-करते जिंदगी से ऊब चली थीं। ऐसे में जब बेटे परदेस से लौटे तो लंबे अरसे बाद घर में पूरा खाना बना। घर की देहरी गुलजार हो गई। फिलहाल, बेटों की शादी नहीं हुई है। ऐसे में इसी साल इनका ब्याह रचाकर दोनों को जिले में ही रोकने की कोशिश है। बेटों ने कहा कि 10 वर्ष पहले जब घर छूट रहा था, तब आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। यहां उनके लायक काम होता तो अपना घर छोड़कर जाते ही क्यों? हालात अभी भी वैसे ही हैं। महामारी के चलते वापस आए हैं, लेकिन काम न मिला तो घर पर कब तक बेकार बैठे रह सकते हैं। इतना कहकर वे किसी सोच में डूब गए।

 

How Corona became a boon for mothers in this village
मां सुमन के साथ बैठे रामू और बालेंद्र - फोटो : amar ujala
भूरी का घर-आंगन आबाद
गांव की भूरी की कहानी भी कुछ सुमन जैसी ही है। इनके भी दोनों बेटे राजनाथ और सोहनलाल कई वर्षों से हैदराबाद में थे। अकेले होने की वजह से घर की मरम्मत नहीं हो पाती थी। घर अब रहने लायक भी नहीं बचा है। बेटे वापस आए तो रौनक लौट आई। कोरोना से दुनिया भले ही परेशान हो, लेकिन इस बीमारी ने उनका घर-आंगन आबाद कर दिया।

वरना ऐसी कोई वजह नहीं थी कि बेटे दोबारा घर लौटते। वह अपनी भाषा में कहती हैं कि कोरोना तुम्हार पांए परन, उजाड़ देहरी आबाद भए। दोनों बेटे बताते हैं कि 20 दिन में 700 किलोमीटर की दूरीतय कर वे घर पहुंचे थे। पैर की खाल उधड़ने लगी तो कपड़ा बांध लिया था। यह देख मां कई दिन तक रोईं। अब वह वापस न जाने की कसम दे रही हैं।

तीन बेटे फिर भी अकेली थीं माया
इसी गांव की माया देवी के तीन बेटे हैं। दो गांव में रहते हैं। एक बेटा धीरू दिल्ली में रहकर पेंटिंग करता था। गांव में रहने वाले दोनों बेटे अपना बोरिया-बिस्तर उठाकर अलग रहने लगे तो उनकी जिंदगी में अकेलापन घर कर गया। बीमारी के चलते जब तीसरा बेटा वापस आया तो उनकी जिंदगी में खुशी लौट आई। वह बताती हैं कि बुजुर्गों के लिए अकेलापन किसी बीमारी से कम नहीं। लोग तो बीमारी की वजह से एकांतवास में जा रहे हैं। लेकिन वे बिना बीमारी के ही कई सालों में एकांतवास में थीं।
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