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हिंदी हैं हम: अमर उजाला की ओर से आयोजित वेबिनार में बोले प्रोफेसर, भाषा को दें वैश्विक पहचान
Sun, 23 Aug 2020 01:08 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उरई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उरई
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Sun, 23 Aug 2020 01:08 PM IST
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हिंदी हैं हम
- फोटो : Amar Ujala
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हिंदी है हम का संदेश प्रसारित करते हुए अमर उजाला की ओर से आयोजित आनलाइन संगोष्ठी (वेबिनार) में विभिन्न डिग्री कालेज के प्रोफेसरों व हिंदी सेवियों ने हिस्सा लेकर हिंदी के उत्थान पर चर्चा की। हिंदी को वैश्विक भाषा बनाने पर जोर दिया गया। वक्ताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि हिंदी के समान सरल कोई और भाषा नहीं है।
भाव की अभिव्यक्ति हो या वाणी में मधुरता दर्शाना हो तो हिंदी भाषा से बेहतर और कुछ भी नहीं है। आवश्यकता है तो सिर्फ हिंदी भाषा के महत्व को समझने उसे पूरी तरह अपनाने की। वक्ताओं ने कहा कि मातृ भाषा हिंदी को अपने जीवन में उतारने की जरूरत है। अब तो सोशल मीडिया भी हिंदी की राह पर चल पड़ा है। विदेशों तक में हिंदी भाषा को सम्मान मिल रहा है।
फिर अपने ही देश में भाषा की उपेक्षा से अधिक दुखद और क्या हो सकता है। लिहाजा हमें भी हिंदी को पूरा सम्मान देते हुए उसे अधिक अधिक उपयोग में लाने की आवश्यकता है। संगोष्ठी में शामिल सभी वक्ताओं ने भाषा के उत्थान के लिए अमर उजाला के प्रयासों की भी सराहना की। वक्ताओं के मुताबिक हिंदी भाषा आज भी हमें गौरवान्वित करती है। संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ राकेश शुक्ला और संचालन डॉ नीरज द्विवेदी ने किया।
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भाव की अभिव्यक्ति हो या वाणी में मधुरता दर्शाना हो तो हिंदी भाषा से बेहतर और कुछ भी नहीं है। आवश्यकता है तो सिर्फ हिंदी भाषा के महत्व को समझने उसे पूरी तरह अपनाने की। वक्ताओं ने कहा कि मातृ भाषा हिंदी को अपने जीवन में उतारने की जरूरत है। अब तो सोशल मीडिया भी हिंदी की राह पर चल पड़ा है। विदेशों तक में हिंदी भाषा को सम्मान मिल रहा है।
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फिर अपने ही देश में भाषा की उपेक्षा से अधिक दुखद और क्या हो सकता है। लिहाजा हमें भी हिंदी को पूरा सम्मान देते हुए उसे अधिक अधिक उपयोग में लाने की आवश्यकता है। संगोष्ठी में शामिल सभी वक्ताओं ने भाषा के उत्थान के लिए अमर उजाला के प्रयासों की भी सराहना की। वक्ताओं के मुताबिक हिंदी भाषा आज भी हमें गौरवान्वित करती है। संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ राकेश शुक्ला और संचालन डॉ नीरज द्विवेदी ने किया।
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हिंदी के बजाए अंग्रेजी का विरोध प्रासंगिक होगा
डॉ. राकेश शुक्ला एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, वीएसएसडी कालेज कानपुर ने कहा कि हमारे देश में हिंदी के विरोध के स्थान पर अंग्रेजी का विरोध ज्यादा प्रासंगिक होगा, क्योंकि उसमें एक आधिपत्य का भाव निहित है। इस भाव के कारण वह हमारी हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं, बोलियों को पनपने से रोक रही है। हिंदी के बाजारीकरण के कारण उसमें अन्य भाषा के शब्दों का मिश्रण आवश्यकता से अधिक होने लगा है। अत: एक बार पुन: उसके मानकीकरण की दिशा में कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
हिंदी का हित समूचे राष्ट्रहित से जुड़ा
डॉ. राजेश चंद्र पांडे एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग प्रभारी, दयानंद वैदिक कालेज उरई का कहना है कि हिंदी का हित समूचे राष्ट्र के हित के साथ जुड़ा है, इस बात को ध्यान में रखते हुए हिंदी की सेवा करनी चाहिए क्योंकि इसी के सहारे हम प्रत्येक जनमानस में राष्ट्रीय भावना को जागृत कर सकते हैं। हमें अपनी सोच, विचार को उन्मुक्त गगन में खुला छोड़ना होगा ताकि हम अपनी भूली हुई संस्कृति पर ध्यान केंद्रित करते हुए देश को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग दें। सोशल मीडिया हिंदी भाषा के विस्तार में अहम भूमिका अदा कर रहा है।
डॉ. राकेश शुक्ला एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, वीएसएसडी कालेज कानपुर ने कहा कि हमारे देश में हिंदी के विरोध के स्थान पर अंग्रेजी का विरोध ज्यादा प्रासंगिक होगा, क्योंकि उसमें एक आधिपत्य का भाव निहित है। इस भाव के कारण वह हमारी हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं, बोलियों को पनपने से रोक रही है। हिंदी के बाजारीकरण के कारण उसमें अन्य भाषा के शब्दों का मिश्रण आवश्यकता से अधिक होने लगा है। अत: एक बार पुन: उसके मानकीकरण की दिशा में कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
हिंदी का हित समूचे राष्ट्रहित से जुड़ा
डॉ. राजेश चंद्र पांडे एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग प्रभारी, दयानंद वैदिक कालेज उरई का कहना है कि हिंदी का हित समूचे राष्ट्र के हित के साथ जुड़ा है, इस बात को ध्यान में रखते हुए हिंदी की सेवा करनी चाहिए क्योंकि इसी के सहारे हम प्रत्येक जनमानस में राष्ट्रीय भावना को जागृत कर सकते हैं। हमें अपनी सोच, विचार को उन्मुक्त गगन में खुला छोड़ना होगा ताकि हम अपनी भूली हुई संस्कृति पर ध्यान केंद्रित करते हुए देश को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग दें। सोशल मीडिया हिंदी भाषा के विस्तार में अहम भूमिका अदा कर रहा है।
हिंदी के सम्मान से ही पाएंगे सम्मान
डॉ. नीरज कुमार द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर हिंदी विभाग, दयानंद वैदिक कालेज उरई बोले कि जिस प्रकार भारतीय संस्कृति की विशेषता अनेकता में एकता है। देश की सभी भाषाएं अपने मूल स्वरूप में बनी रहें, विकसित होती रहें, उसके लिए हमें जिन प्रयासों की, जिस समर्पण की आवश्यकता है वही हमारी अनेकता में एकता की पहचान है। हमें समझना होगा कि जब तक हम अपने देश व यहां की मुख्य हिंदी भाषा का सम्मान नहीं करेंगे, तब हम दूसरे से सम्मान पाने में भी असफल रह सकते हैं। लिहाजा हिंदी को सर्वोपरि मानना चाहिए।
हिंदी सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा
डॉ नीरज गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर एवं हिंदी विभाग प्रभारी, गोस्वामी तुलसीदास राजकीय महाविद्यालय, चित्रकूट ने कहा कि वर्तमान में प्रचलित वैश्विक भाषाओं में हिंदी सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है। इसका वृहद शब्दकोष है, वृहद आत्मसात करने की क्षमता है, इसीलिए इस भाषा को वैश्विक पहचान मिलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। भाषिक संवर्धन में सरकारी आयोग अपनी अहम भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। तकनीकी, न्यायिक, वाणिज्यिक आदि अनेक क्षेत्रों के प्रचलित अन्य भाषा के शब्दों को हिंदी में लाने का प्रयास कर रहे हैं।
हर भाव के लिए हिंदी में अलग शब्द
सुधीर अवस्थी, असिस्टेंट प्रोफेसर, मथुरा प्रसाद महाविद्यालय कोंच ने हिंदी भाषा के सामर्थ्य पर परिचर्चा करते हुए कहा कि हिंदी का शब्दकोष बहुत व्यापक है। एक-एक भाव की अभिव्यक्ति के लिए अलग-अलग शब्द मिलते हैं। हिंदी वैश्विक स्तर पर अपने वर्चस्व को अनवरत रूप से बढ़ा रही है। अमेरिका में आज हिंदी सेकेंड लार्जेस्ट स्पोकन लैंग्वेज के रूप में अपना स्थान बना चुकी है। हिंदी की दुर्दशा भी हिंदीभाषी क्षेत्र में ही होती है। जिस हिंदी को रोजगार के सैकड़ों नवीन आयाम प्राप्त हुए हैं, उसी में हमारी परंपरागत अनेक परीक्षाओं में उचित सम्मान प्राप्त नहीं हो पा रहा है।
डॉ. नीरज कुमार द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर हिंदी विभाग, दयानंद वैदिक कालेज उरई बोले कि जिस प्रकार भारतीय संस्कृति की विशेषता अनेकता में एकता है। देश की सभी भाषाएं अपने मूल स्वरूप में बनी रहें, विकसित होती रहें, उसके लिए हमें जिन प्रयासों की, जिस समर्पण की आवश्यकता है वही हमारी अनेकता में एकता की पहचान है। हमें समझना होगा कि जब तक हम अपने देश व यहां की मुख्य हिंदी भाषा का सम्मान नहीं करेंगे, तब हम दूसरे से सम्मान पाने में भी असफल रह सकते हैं। लिहाजा हिंदी को सर्वोपरि मानना चाहिए।
हिंदी सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा
डॉ नीरज गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर एवं हिंदी विभाग प्रभारी, गोस्वामी तुलसीदास राजकीय महाविद्यालय, चित्रकूट ने कहा कि वर्तमान में प्रचलित वैश्विक भाषाओं में हिंदी सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है। इसका वृहद शब्दकोष है, वृहद आत्मसात करने की क्षमता है, इसीलिए इस भाषा को वैश्विक पहचान मिलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। भाषिक संवर्धन में सरकारी आयोग अपनी अहम भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। तकनीकी, न्यायिक, वाणिज्यिक आदि अनेक क्षेत्रों के प्रचलित अन्य भाषा के शब्दों को हिंदी में लाने का प्रयास कर रहे हैं।
हर भाव के लिए हिंदी में अलग शब्द
सुधीर अवस्थी, असिस्टेंट प्रोफेसर, मथुरा प्रसाद महाविद्यालय कोंच ने हिंदी भाषा के सामर्थ्य पर परिचर्चा करते हुए कहा कि हिंदी का शब्दकोष बहुत व्यापक है। एक-एक भाव की अभिव्यक्ति के लिए अलग-अलग शब्द मिलते हैं। हिंदी वैश्विक स्तर पर अपने वर्चस्व को अनवरत रूप से बढ़ा रही है। अमेरिका में आज हिंदी सेकेंड लार्जेस्ट स्पोकन लैंग्वेज के रूप में अपना स्थान बना चुकी है। हिंदी की दुर्दशा भी हिंदीभाषी क्षेत्र में ही होती है। जिस हिंदी को रोजगार के सैकड़ों नवीन आयाम प्राप्त हुए हैं, उसी में हमारी परंपरागत अनेक परीक्षाओं में उचित सम्मान प्राप्त नहीं हो पा रहा है।