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हिंदी हैं हम: भारतेंदु के नाटकों ने अलख जगाई, प्रताप नारायण ने मूंछ मुड़वाई
Fri, 11 Sep 2020 01:53 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा
शान्तनु त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर
शान्तनु त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Fri, 11 Sep 2020 01:53 PM IST
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हिंदी हैं हम
- फोटो : Amar Ujala
आधुनिक हिंदी के उन्नायक भारतेंदु हरिश्चंद्र की बुधवार को जयंती पर साहित्य प्रेमियों ने उन्हें याद किया और अतीत के झरोखों से निकल आया उनका कानपुर से रिश्ता। कानपुर में भारतेंदु हरिश्चन्द्र के अनन्य प्रशंसकों में से थे प्रताप नारायण मिश्र। वह न सिर्फ उनके लिखे नाटकों का मंचन करवाते थे, बल्कि उनमें अभिनय भी करते थे।
भारतेंदु के लिखे एक नाटक में अभिनय के लिए उन्होंने अपनी मूंछ तक साफ करवा दी थी। भारतेंदु ने नाटकों से देशप्रेम की अलख जगाई व अन्य रचनाओं से हिंदी के प्रति रुझान को बढ़ाने में महती भूमिका निभाई। हिंदी के प्रति अगाध प्रेम भारतेंदु हरिश्चन्द्र की इन पंक्तियों से प्रकट होता है, 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिनु निज भाषा के ज्ञान के, मिटत न तन को सूल।'
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भारतेंदु के लिखे एक नाटक में अभिनय के लिए उन्होंने अपनी मूंछ तक साफ करवा दी थी। भारतेंदु ने नाटकों से देशप्रेम की अलख जगाई व अन्य रचनाओं से हिंदी के प्रति रुझान को बढ़ाने में महती भूमिका निभाई। हिंदी के प्रति अगाध प्रेम भारतेंदु हरिश्चन्द्र की इन पंक्तियों से प्रकट होता है, 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिनु निज भाषा के ज्ञान के, मिटत न तन को सूल।'
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साफ है कि अपनी भाषा की उन्नति के बिना उत्थान संभव नहीं। साहित्यकार-पूर्व सांसद दिवंगत नरेश चंद्र चतुर्वेदी ने अपने एक लेख में लिखा है कि प्रताप नारायण मिश्र से पहले रामनारायण त्रिपाठी और बाबू बिहारीलाल ने भारतेंदु हरिश्चंद्र के लिखे नाटक 'सत्य हरिश्चंद्र' और 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' खेले थे। सन् 1885 में कानपुर में बंगाली समाज ने 'भारत दुर्दशा' नाटक का मंचन किया था।
इस नाटक में कलाकारों ने बेहद खराब अभिनय किया था, जिस पर प्रताप नारायण मिश्र ने अपने समाचारपत्र 'ब्राह्मण' के अक्तूबर, सन् 1885 के अंक में 'भारत दुर्दशा की दुर्दशा' शीर्षक लेख लिखकर कड़ी टिप्पणी की थी। बाद में प्रताप नारायण मिश्र ने अपने मित्रों के सहयोग से 'श्री भारत मनोरंजिनी सभा' स्थापित की, जिसके माध्यम से तमाम नाटकों का मंचन हुआ।
प्रताप नारायण मिश्र स्वयं तो नाटक लिखते ही थे, अभिनय भी बहुत अच्छा करते थे। एक बार भारतेंदु हरिश्चंद्र के एक नाटक में अपनी भूमिका निभाने के लिए अपने पिता से अनुमति लेकर उन्होंने मूंछ मुंड़वाई थी। पहले पिता के जीते जी मूंछ मुंड़वाना खराब माना जाता था इसलिए प्रताप नारायण मिश्र ने पिता से अनुमति लेना आवश्यक समझा।
इस नाटक में कलाकारों ने बेहद खराब अभिनय किया था, जिस पर प्रताप नारायण मिश्र ने अपने समाचारपत्र 'ब्राह्मण' के अक्तूबर, सन् 1885 के अंक में 'भारत दुर्दशा की दुर्दशा' शीर्षक लेख लिखकर कड़ी टिप्पणी की थी। बाद में प्रताप नारायण मिश्र ने अपने मित्रों के सहयोग से 'श्री भारत मनोरंजिनी सभा' स्थापित की, जिसके माध्यम से तमाम नाटकों का मंचन हुआ।
प्रताप नारायण मिश्र स्वयं तो नाटक लिखते ही थे, अभिनय भी बहुत अच्छा करते थे। एक बार भारतेंदु हरिश्चंद्र के एक नाटक में अपनी भूमिका निभाने के लिए अपने पिता से अनुमति लेकर उन्होंने मूंछ मुंड़वाई थी। पहले पिता के जीते जी मूंछ मुंड़वाना खराब माना जाता था इसलिए प्रताप नारायण मिश्र ने पिता से अनुमति लेना आवश्यक समझा।