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Kanpur News: एचबीटीयू शोधार्थी तीन साल के अंदर जमा कर सकेंगे थीसिस
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कानपुर। हरकोर्ट बटलर तकनीकी विश्वविद्यालय (एचबीटीयू) ने शोधार्थियों के लिए पीएचडी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने पीएचडी पूरी करने की न्यूनतम समय-सीमा को सरल करने के साथ और लचीला बना दिया है। अब फुल टाइम और पार्ट टाइम दोनों श्रेणियों के शोधार्थी तीन वर्ष के अंदर ही अपनी थीसिस जमा कर सकेंगे। इस पर एकेडमिक काउंसिल की बैठक में मुहर लग गई है।
आईआईटी रुड़की सहित अन्य तकनीक संस्थानों की तरह एचबीटीयू ने भी पीएचडी कार्यक्रम में परिवर्तन किया है। संस्थान में पहले की व्यवस्था के अनुसार, फुल टाइम शोधार्थियों के लिए पीएचडी पूरी करने की न्यूनतम अवधि तीन वर्ष और पार्ट टाइम शोधार्थियों के लिए चार वर्ष निर्धारित थी। शोध कार्य पूरा होने के बाद थीसिस जमा करने के लिए अलग से समय दिया जाता था, जिससे पूरी प्रक्रिया लंबी हो जाती थी। इस कारण से कई छात्र दीक्षांत समारोह का हिस्सा होने से वंचित रह जाते थे। नई नीति के तहत दोनों श्रेणियों के लिए न्यूनतम समय-सीमा समान कर दी गई है और इसे तीन वर्ष निर्धारित किया गया है।
विश्वविद्यालय के निर्णय से शोधार्थियों को काफी राहत मिलेगी। अब उन्हें अनावश्यक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। वह अपनी शोध प्रगति के अनुसार निर्धारित समय के भीतर ही थीसिस जमा कर सकेंगे। शोध कार्य में गति आएगी और छात्रों को समय पर डिग्री प्राप्त करने में आसानी होगी। बदलाव से विश्वविद्यालय में शोध कार्य की गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा दोनों में वृद्धि होगी। समय-सीमा में लचीलापन मिलने से प्रतिभाशाली शोधार्थी अपने कार्य को तेजी से पूरा कर सकेंगे।
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नई व्यवस्था से दीक्षांत समारोह में अधिक संख्या में शोधार्थियों को उपाधि प्रदान की जा सकेगी। पहले कई छात्र समय-सीमा और प्रक्रिया में देरी के कारण दीक्षांत में शामिल नहीं हो पाते थे। अब इस समस्या का समाधान संभव हो सकेगा।
- प्रो. वंदना कौशिक, डीन एकेडमिक अफेयर्स, एचबीटीयू
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आईआईटी रुड़की सहित अन्य तकनीक संस्थानों की तरह एचबीटीयू ने भी पीएचडी कार्यक्रम में परिवर्तन किया है। संस्थान में पहले की व्यवस्था के अनुसार, फुल टाइम शोधार्थियों के लिए पीएचडी पूरी करने की न्यूनतम अवधि तीन वर्ष और पार्ट टाइम शोधार्थियों के लिए चार वर्ष निर्धारित थी। शोध कार्य पूरा होने के बाद थीसिस जमा करने के लिए अलग से समय दिया जाता था, जिससे पूरी प्रक्रिया लंबी हो जाती थी। इस कारण से कई छात्र दीक्षांत समारोह का हिस्सा होने से वंचित रह जाते थे। नई नीति के तहत दोनों श्रेणियों के लिए न्यूनतम समय-सीमा समान कर दी गई है और इसे तीन वर्ष निर्धारित किया गया है।
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विश्वविद्यालय के निर्णय से शोधार्थियों को काफी राहत मिलेगी। अब उन्हें अनावश्यक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। वह अपनी शोध प्रगति के अनुसार निर्धारित समय के भीतर ही थीसिस जमा कर सकेंगे। शोध कार्य में गति आएगी और छात्रों को समय पर डिग्री प्राप्त करने में आसानी होगी। बदलाव से विश्वविद्यालय में शोध कार्य की गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा दोनों में वृद्धि होगी। समय-सीमा में लचीलापन मिलने से प्रतिभाशाली शोधार्थी अपने कार्य को तेजी से पूरा कर सकेंगे।
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नई व्यवस्था से दीक्षांत समारोह में अधिक संख्या में शोधार्थियों को उपाधि प्रदान की जा सकेगी। पहले कई छात्र समय-सीमा और प्रक्रिया में देरी के कारण दीक्षांत में शामिल नहीं हो पाते थे। अब इस समस्या का समाधान संभव हो सकेगा।
- प्रो. वंदना कौशिक, डीन एकेडमिक अफेयर्स, एचबीटीयू