{"_id":"60ac92388ebc3ea39d188f4f","slug":"gsvm-medical-college-kanpur-two-member-committee-investigated","type":"story","status":"publish","title_hn":"कानपुर: कमिश्नर ने दो सदस्यीय टीम से करवाई मेडिकल कॉलेज की जांच, मिलीं खामियां ही खामियां","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कानपुर: कमिश्नर ने दो सदस्यीय टीम से करवाई मेडिकल कॉलेज की जांच, मिलीं खामियां ही खामियां
Tue, 25 May 2021 11:30 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 25 May 2021 11:30 AM IST
सार
दो सदस्यीय कमेटी ने जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में मरीजों के भर्ती ना कराए जाने की शिकायतों के संबंध में जांच की। जांच में खामियां ही खामियां सामने आईं। कमिश्नर ने मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल को पत्र जारी कर तीन दिन में जवाब मांगा है कि वे इसमें सुधार कैसे करेंगे।
विज्ञापन
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में मरीजों के भर्ती ना कराए जाने की शिकायतों के संबंध में कमिश्नर डॉ. राजशेखर ने दो सदस्यीय कमेटी बनाकर जांच करवाई तो खामियां ही खामियां सामने आईं। सीडीओ और अपर निदेशक, चिकित्सा स्वास्थ्य व परिवार कल्याण की ओर से की गई जांच के बाद कमिश्नर ने मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल को पत्र जारी कर तीन दिन में जवाब मांगा है कि वे इसमें सुधार कैसे करेंगे।
साथ ही यह व्यवस्था निर्धारित की है कि कोई भी मरीज बेड न होने या अन्य कारण से हैलट से वापस किया जाता है तो किसी वरिष्ठ चिकित्सक या चिकित्साधीक्षक की अनुमति ली जाए। वापस करने वाले मरीज का भी पूरा ब्यौरा हो ताकि बेड खाली होने पर उसे ट्रैस किया जा सके।
जांच में पाया गया कि मरीज के इमरजेंसी में दाखिले के समय बनने वाली इमरजेंसी स्लिप की एक प्रति मेडिकल कॉलेज या अस्पताल प्रशासन के पास होनी चाहिए थी, मगर ऐसा कोई अभिलेख इमरजेंसी में नहीं मिला। इस अभिलेख के जरिये लिखित तौर पर इस बात की पुष्टि होती कि मरीज को इमरजेंसी के अंदर लिया गया और उसका क्या एसेसमेंट किया गया और चिकित्सक की ओर से उसे क्या परामर्श दिया गया।
विज्ञापन
इतना ही नहीं मरीज के रजिस्ट्रेशन की स्लिप में उसका मोबाइल नंबर भी अंकित नहीं पाया गया, जबकि रजिस्ट्रेशन स्लिप में मरीज का पूर्ण पता, कोई परिचय पत्र नंबर, मोबाइल नंबर होना चाहिए, जिससे कि मरीज को भविष्य में ट्रैक किया जा सके। जांच में इस बात की भी पुष्टि नहीं हो सकी कि आईसीयू में सुबह शाम डॉक्टरों का दौरा भी होता है।
प्रिंसिपल ने इस आशय का मौखिक आदेश किए जाने का दावा किया मगर जांच के समय इस तरह का कोई अभिलेख नहीं मिला जिससे कि स्पष्ट हो सके कि आईसीयू में डॉक्टरों की निरंतर निगरानी है। किस डॉक्टर ने कब राउंड लिया और उसे क्या कमियां मिलीं। जिला प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक लगातार इस बात की शिकायतें मिल रही हैं कि मरीजों को इमरजेंसी में दाखिल नहीं किया जाता। जांच में सामने आया कि मेडिसिन आईसीयू में वेंटिलेटर बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।
विज्ञापन
साथ ही यह व्यवस्था निर्धारित की है कि कोई भी मरीज बेड न होने या अन्य कारण से हैलट से वापस किया जाता है तो किसी वरिष्ठ चिकित्सक या चिकित्साधीक्षक की अनुमति ली जाए। वापस करने वाले मरीज का भी पूरा ब्यौरा हो ताकि बेड खाली होने पर उसे ट्रैस किया जा सके।
विज्ञापन
जांच में पाया गया कि मरीज के इमरजेंसी में दाखिले के समय बनने वाली इमरजेंसी स्लिप की एक प्रति मेडिकल कॉलेज या अस्पताल प्रशासन के पास होनी चाहिए थी, मगर ऐसा कोई अभिलेख इमरजेंसी में नहीं मिला। इस अभिलेख के जरिये लिखित तौर पर इस बात की पुष्टि होती कि मरीज को इमरजेंसी के अंदर लिया गया और उसका क्या एसेसमेंट किया गया और चिकित्सक की ओर से उसे क्या परामर्श दिया गया।
विज्ञापन
इतना ही नहीं मरीज के रजिस्ट्रेशन की स्लिप में उसका मोबाइल नंबर भी अंकित नहीं पाया गया, जबकि रजिस्ट्रेशन स्लिप में मरीज का पूर्ण पता, कोई परिचय पत्र नंबर, मोबाइल नंबर होना चाहिए, जिससे कि मरीज को भविष्य में ट्रैक किया जा सके। जांच में इस बात की भी पुष्टि नहीं हो सकी कि आईसीयू में सुबह शाम डॉक्टरों का दौरा भी होता है।
प्रिंसिपल ने इस आशय का मौखिक आदेश किए जाने का दावा किया मगर जांच के समय इस तरह का कोई अभिलेख नहीं मिला जिससे कि स्पष्ट हो सके कि आईसीयू में डॉक्टरों की निरंतर निगरानी है। किस डॉक्टर ने कब राउंड लिया और उसे क्या कमियां मिलीं। जिला प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक लगातार इस बात की शिकायतें मिल रही हैं कि मरीजों को इमरजेंसी में दाखिल नहीं किया जाता। जांच में सामने आया कि मेडिसिन आईसीयू में वेंटिलेटर बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।