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न्याय की आस लिए चल बसे बेहमई कांड के वादी राजाराम
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कानपुर देहात जिले के बेहमई कांड के वादी राजाराम की फाइल फोटो। संवाद
- फोटो : AKBARPUR
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कानपुर देहात/राजपुर। बेहमई कांड के वादी राजाराम (85) की लंबी बीमारी के चलते रविवार को मौत हो गई। कानपुर के एक निजी अस्पताल में उनके लीवर का इलाज चल रहा था। मौत के समय वह घर मेें थे। घटना की जानकारी पर गांव के लोग उनके दरवाजे पर एकत्र हो गए।
राजपुर कस्बे के बेहमई गांव निवासी राजाराम सिंह बेहमई कांड के वादी थे। इनके पुत्र रामकेश सिंह ने बताया कि पिता दो साल से लीवर की बीमारी से ग्रसित थे। बता दें कि 14 फरवरी 1981 को बेहमई गांव में फूलन देवी ने लाइन से खड़ा करके 20 लोगों को गोलियों से मार डाला था। घटना की चर्चा विदेशों तक हुई थी। गांव के राजाराम सिंह ने फूलन समेत 36 डकैतों पर हत्या व लूटपाट की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। बेहमई कांड में राजाराम सिंह के दो सगे भाई बनवारी सिंह व हिम्मत सिंह, एक चचेरे भाई नरेश सिंह के अलावा भतीजे देव सिंह, हुकुम सिंह, दशरथ सिंह समेत परिवार के छह लोग मारे गए थे। पूरा परिवार उजड़ जाने के बाद राजाराम ने हिम्मत से काम लेते हुए डकैतों के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुुरू की थी।
वह सुनवाई के हर मौके पर कोर्ट पहुंचते थे। उनके चार बेटे सबसे बड़े बादाम सिंह उर्फ राजू सिंह, रामकेश सिंह, देशराज सिंह व कंद्रपाल सिंह हैं। सबसे छोटे बेटे कंद्रपाल सिंह सेना में हैं। वह इस समय दिल्ली में तैनात है। रामकेश सिंह होमगार्ड हैं। बाकी दो बेटे खेती करते हैं। राजाराम सिंह की पत्नी की पहले ही मौत हो चुकी है। तहसीलदार सिकंदरा के लखनलाल राजपूत ने बताया कि बेहमई कांड के वादी के निधन की सूचना मिली है। राजस्व टीम व पुलिस के साथ मौजूद रहकर उनका अंतिम संस्कार कराया जाएगा। गांव में भीड़ उमड़ने की आशंका लेकर पुलिस को सतर्कता रखने के निर्देश दिए गए हैं-
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न्यायालय में फैसला टलने से रहते थे गुमसुम
बेहमई कांड के वादी राजाराम सिंह आरोपियों को सजा दिलाने के लिए पूरी तरह से संघर्ष करते रहे। वह हर तारीख पर कोर्ट जाते थे। घटना के बाद शुरुआती दौर में भी वह डकैतों से बेखौफ होकर पैरवी में लगे रहे। उस समय डकैतों का बीहड़ के आसपास गांवों में खासा आतंक था। इसके बाद भी वह कभी डरे नहीं। हालांकि कई बार डकैतों ने उन्हें घेरने की कोशिश की थी। सावधानी बरतते हुए करीब दो साल तक वह अकबरपुर में भतीजे के साथ रहे थे। कोर्ट में तारीख पर जाने के दौरान डकैत उन्हें डराने की कोशिश करते रहते थे। बेटे रामकेश सिंह ने बताया कि न्यायालय में मूल केश डायरी न होने से फैसला टलने के बाद पिता गुमसुम रहने लगे थे। वह घटना में शामिल हर आरोपी को कड़ी सजा दिलाना चाहते थे। इस कारण पैरवी में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। मुकदमे में वह चश्मदीद गवाह भी थे।
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राजपुर कस्बे के बेहमई गांव निवासी राजाराम सिंह बेहमई कांड के वादी थे। इनके पुत्र रामकेश सिंह ने बताया कि पिता दो साल से लीवर की बीमारी से ग्रसित थे। बता दें कि 14 फरवरी 1981 को बेहमई गांव में फूलन देवी ने लाइन से खड़ा करके 20 लोगों को गोलियों से मार डाला था। घटना की चर्चा विदेशों तक हुई थी। गांव के राजाराम सिंह ने फूलन समेत 36 डकैतों पर हत्या व लूटपाट की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। बेहमई कांड में राजाराम सिंह के दो सगे भाई बनवारी सिंह व हिम्मत सिंह, एक चचेरे भाई नरेश सिंह के अलावा भतीजे देव सिंह, हुकुम सिंह, दशरथ सिंह समेत परिवार के छह लोग मारे गए थे। पूरा परिवार उजड़ जाने के बाद राजाराम ने हिम्मत से काम लेते हुए डकैतों के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुुरू की थी।
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वह सुनवाई के हर मौके पर कोर्ट पहुंचते थे। उनके चार बेटे सबसे बड़े बादाम सिंह उर्फ राजू सिंह, रामकेश सिंह, देशराज सिंह व कंद्रपाल सिंह हैं। सबसे छोटे बेटे कंद्रपाल सिंह सेना में हैं। वह इस समय दिल्ली में तैनात है। रामकेश सिंह होमगार्ड हैं। बाकी दो बेटे खेती करते हैं। राजाराम सिंह की पत्नी की पहले ही मौत हो चुकी है। तहसीलदार सिकंदरा के लखनलाल राजपूत ने बताया कि बेहमई कांड के वादी के निधन की सूचना मिली है। राजस्व टीम व पुलिस के साथ मौजूद रहकर उनका अंतिम संस्कार कराया जाएगा। गांव में भीड़ उमड़ने की आशंका लेकर पुलिस को सतर्कता रखने के निर्देश दिए गए हैं-
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न्यायालय में फैसला टलने से रहते थे गुमसुम
बेहमई कांड के वादी राजाराम सिंह आरोपियों को सजा दिलाने के लिए पूरी तरह से संघर्ष करते रहे। वह हर तारीख पर कोर्ट जाते थे। घटना के बाद शुरुआती दौर में भी वह डकैतों से बेखौफ होकर पैरवी में लगे रहे। उस समय डकैतों का बीहड़ के आसपास गांवों में खासा आतंक था। इसके बाद भी वह कभी डरे नहीं। हालांकि कई बार डकैतों ने उन्हें घेरने की कोशिश की थी। सावधानी बरतते हुए करीब दो साल तक वह अकबरपुर में भतीजे के साथ रहे थे। कोर्ट में तारीख पर जाने के दौरान डकैत उन्हें डराने की कोशिश करते रहते थे। बेटे रामकेश सिंह ने बताया कि न्यायालय में मूल केश डायरी न होने से फैसला टलने के बाद पिता गुमसुम रहने लगे थे। वह घटना में शामिल हर आरोपी को कड़ी सजा दिलाना चाहते थे। इस कारण पैरवी में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। मुकदमे में वह चश्मदीद गवाह भी थे।