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नगर-देहात पुलिस में नहीं रहा तालमेल
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर
Updated Sat, 18 Jun 2016 01:58 AM IST
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कानपुर देहात पुलिस लाइन से बाहर आते कानपुर नगर के एसएसपी शलभ माथुर।
- फोटो : अमर उजाला
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कानपुर देहात। आशुतोष की तलाश में जुटी कानपुर पुलिस को शुरू से ही अपहर्ताओं की लोकेशन कानपुर देहात जिले में होने की बात पता चली थी लेकिन कहीं न कहीं कानपुर शहर व देहात की पुलिस के बीच तालमेल की कमी रही। देहात जनपद की पुलिस का इस्तेमाल केवल सहयोगी की भूमिका के तौर पर किया गया। पुलिस की यही चूक भारी पड़ गई।
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पुलिस सूत्रों की मानें तो शुरूआत से ही छानबीन की कमान कानपुर पुलिस ने अपने हाथों में ले रखी थी। किसे-किसे पूछताछ के लिए उठाना है, किस-किस जगह कब छापा मारना है, किन नंबरों को सर्विलांस पर लेना है और कब क्या निर्णय लेना है, यह सीधे कानपुर की पुलिस तय करती रही।
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यही वजह रही कि इस मामले में कानपुर देहात पुलिस ज्यादा गंभीरता से नहीं जुटी। एक पुलिस अधिकारी की मानें तो यदि पहले दिन से ही स्थानीय पुलिस को भी विवेचक की भूमिका के तौर पर सक्रिय किया जाता तो शायद पहले ही अपराधियों तक पुलिस पहुंच जाती।
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इस मुद्दे पर देहात पुलिस अधीक्षक पुष्पांजलि का कहना है कि देहात पुलिस के स्तर से कोई भी चूक नहीं हुई है। पहले दिन से ही जो-जो सहयोग मांगा गया उसे कानपुर की पुलिस कोमुहैया कराया गया। मुख्य तौर पर जांच की भूमिका में कानपुर पुलिस ही रही।
पुलिस महकमा अब प्रकाश का आपराधिक इतिहास भी खंगालने में जुट गया है। पता चला है कि वह जुआ व सट्टा का धंधा चलाता रहा है। हो सकता है कि जुआ-सट्टा में रकम हारने के बाद उसे पैसे कमाने का यही शार्टकर्ट लगा हो। अकबरपुर कोतवाली पुलिस इस बिंदुओं पर भी जांच पड़ताल में जुट गई है। स्थानीय सट्टेबाजों व जुआरियों से प्रकाश का क्या कनेक्शन रहा, इस बिंदु पर भी जानकारियां इकट्ठी की जा रही हैं।
पकड़े गए अपहर्ताओं से सच कबूल कराने के लिए पुलिस लाइन के कर्मचारी क्वार्टर ब्लाक नंबर पांच (टाइप फोर) में करीब पांच घंटे तक पूछताछ चली। इस दौरान एसएसपी कानपुर शलभ माथुर, एसपी कानपुर देहात पुष्पांजलि मौजूद रहीं। एसटीएफ व कानपुर क्राइम ब्रांच भी रहे।
पुलिस लाइन में कार्यरत सफाई कर्मचारियों के बेेटे के अपहरण व हत्या जैसी घटना में शामिल होने से पूरा महकमा स्तब्ध हो गया है। शुक्रवार को पूरे दिन पुलिस लाइन के आवासीय क्वार्टर में कर्फ्यू जैसा सन्नाटा पसरा रहा।
अधिकांश पुलिस कर्मियों के क्वार्टर में भी दरवाजे से लेकर खिड़कियां तक बंद रहीं। कुछ पुलिस कर्मियों के परिजनों से बातचीत का प्रयास किया गया पर हर कोई चुप्पी साधे रहा। सफाई कर्मचारियों के बेेटे पुलिस लाइन स्थित कालोनी में ही रहते थे। आपराधिक वारदात को अंजाम देने के बाद भी वे यहीं पर डटे रहे।
पूरी घटना के मास्टर माइंड प्रकाश के पिता कानपुर देहात पुलिस लाइन में हेड कांस्टेबल थे। वह वहां बिगुल बजाने का काम करते थे। वह काफी समय तक यहीं रहे। उनके रिटायर हो जाने के बाद सरकारी आवास खाली कराया गया तो प्रकाश अकबरपुर अंडरपास के निकट एक मकान में रहने लगा।
पुलिस लाइन में आने-जाने के कारण उसका संपर्क वहां सफाई कर्मियों के बेटों से हो गया। इस दौरान प्रकाश ने उन्हें चंद दिनों में लखपति बनने का लालच देकर अपनी साजिश में शामिल कर लिया।
पुलिस अधीक्षक पुष्पांजलि का कहना है कि अब तक की छानबीन के दौरान पूरे घटनाक्रम में सफाई कर्मचारियों की कोई भूमिका सामने नहीं आई है। पुलिस लाइन के सफाई कर्मियों के बेटों ने घटना को अंजाम दिया है लेकिन उसकी जानकारी उनके परिवार को नहीं थी।
आशुतोष के अपहरण के बाद दो-तीन दिन तक पुलिस की सक्रियता दिखी। इसके बाद पुलिस ने अपने तरीके से कामकाज शुरू किया तो धर्मपाल और उनके परिजनों को लगा कि पुलिस की दिलचस्पी कम हो गई है।
इसके बाद धर्मपाल का पुलिसपर से विश्वास उठ गया और उन्होंने अपने स्तर से बेटे की तलाश शुरू की। सूत्रों की मानें तो धर्मपाल तीन दिन पहले घर से निकले और फिर नहीं लौटे। उन्होंने अपना पुराना मोबाइल स्विच ऑफ कर लिया।
नया सिम खरीद कर कुछ लोगों से बातचीत की। माना जा रहा है कि धर्मपाल को लगा कि पुलिस के दबाव में अपहर्ताओं ने फिरौती के लिए फोन करना बंद कर लिया है। दूसरा सिम लेकर कुछ लोगों को नंबर दिया जाए तो शायद अपहर्ता फोन करें और वे फिरौती की रकम देकर बेटे को सकुशल वापस ले आएं। धर्मपाल के ऐसा करने से पुलिस को अटपटा भी लगा था। जब धर्मपाल शुक्रवार को घर लौटे तो पुलिस के सारे कयासों पर विराम लग गया।
इकलौते बेटे आशुतोष की सकुशल वापसी के लिए कुसुमलता ने घर में खूब पूजा-पाठ किया। मन्नत भी मानी। परिवार के लोग भी मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर गए। ज्योतिषियों और बाबाओं की शरण में गए, जो इन लोगों ने कहा, वही किया।
सभी ने आशुतोष के सकुशल घर लौटने के भरोसा दिया तो कुसुम के साथ ही परिवार के और लोगों में उम्मीद जाग गई। घर का माहौल भी कुछ बदला। मुहल्ले वालों की मानें कुसुमलता ने बृहस्पतिवार शाम भगवान को भोग लगाया और लोगों में प्रसाद भी बांटा।
यह भी कहा कि शुक्रवार को बेटे की खबर आ जाएगी। इसके बाद सुबह भी कुसुमलता घर के कमरे से निकलकर छत पर आईं और जोर से कहा कि आज मेरे बेटे के बारे में खबर आ जाएगी। कुसुमलता की बात सही साबित हुई। खबर आई लेकिन अच्छी नहीं रही।
पुलिस बाहरियों पर नजर गढ़ाए रही और परिवार के करीबी शातिर निकले। अपहर्ताओं का सुराग पुलिस मुहल्ले और आसपास के लोगों में तलाशती रही। मुहल्ले वालों के मोबाइल नंबरों की लिस्ट तक तैयार की गई।
जब यहां से कुछ नहीं मिला तो अपहरण और लूट की पुरानी वारदातों में प्रकाश में आए बदमाशों पर नजदर गढ़ाई। कानपुर देहात जेल में बंद एक शातिर से पूर्वांचल के एक अपराधी समेत कई प्रोफेशनल अपराधियों के बारे में पूछताछ की।
पुलिस ने अपराधियों के बीच नटवर्क फैलाया। पता किया कौन से अपराधी जेल के बाहर हैं जो अपहरण कर सकते हैं, लेकिन कुछ हाथ नहीं आया। आता भी कैसे जब अपराधी का नाता आशुतोष के परिवार से था। उसे पल-पल की जानकारी मिल रही थी और पुलिस इधर-उधर भटक रही थी।
आरोपी प्रकाश पुलिसकर्मियों के बीच रहने की वजह से पुलिस की हर कार्रवाई को बारीकी से जानता था। उसने कानपुर देहात पुलिस लाइन के एक सिपाही से काफी दिन पहले पूछा था कि कोई अपहरण हो जाए तो पुलिस कैसे काम करती है।
अपहरण करने वालों को कैसे पकड़ती है। तभी सिपाही ने सर्विलांस के बारे में बारीकी से उसे बताया था। इसी के बाद प्रकाश ने फर्जी आईडी के सिम और मोबाइल की व्यवस्था की और आशुतोष को अगवा कर लिया।
उसने सिपाही के बताए तरीके के मुताबिक जिस नंबर से फिरौती मांगी, उससे किसी और को फोन नहीं किया। तीन बार धर्मपाल को फिरौती के लिए फोन किया और दो बार रिचार्ज कराने के लिए फोन किया। इसके बाद फोन स्विच ऑफ कर लिया। इस वजह से पुलिस को प्रकाश और उसके साथियों तक पहुंचने में इतना वक्त लग गया।
पूछताछ के दौरान प्रकाश ने बताया कि 7 जून की शाम को भी वह अपने साथियों के साथ अपहरण करने आया था। लेकिन आशू को उठाने का मौका नहीं मिल सका। उसकी बहन कोचिंग छोड़ गई और कोचिंग छूटने से पहले ही छोटे भाई को लेने पहुंच गई।
घंटो घात लगाए बैठने के बाद भी प्लान फेल हो गया और शातिर खाली हाथ लौट गया था। अगले दिन फिर दोपहर से घात लगाए बैठे थे और शाम को आशू को कोचिंग से बाहर पेनिकलते ही अपहरण कर लिया।
अपहरण के मास्टरमाइंड प्रकाश ने बैंक मैनेजर के घर आने-जाने के दौरान ही पूरी रेकी की थी। जिसकी किसी को भनक घर में मौजूद लोगों को भी नहीं लगी कि प्रकाश घर में क्या करने आया है। स्कूल-कोचिंग आने-जाने का पूरा विवरण नोट करने के बाद आशू को कोचिंग के पास से कार से अपहरण कर ले गए।
आशुतोष कांड की कहानी की शुरुआत और अंत दोनों एसेंट कार में हुआ। इसी कार से आठ जून की शाम कोचिंग से निकले आशुतोष को जब प्रकाश ने खींचकर अपनी एसेंट कार में डाला तो भयभीत मासूम की जुबान से यही निकला कि प्रकाश चाचू मुझे कहां ले जा रहे हो...? इस बात का खुलासा प्रकाश ने पुलिस के सामने किया।
अपहरण करते वक्त प्रकाश सिर और मुंह पर गमछा बांधे हुए था, इसके बाद भी आशू ने उसे पहचान लिया। नाम लेते ही कार में बैठे सभी लोग सन्न रह गए और फिर मामला वहीं से बिगड़ गया।
अपहरण के तीसरे दिन यानी 10 जून को कार से ठिकाना बदलते वक्त आशुतोष ने एक बार फिर कहा कि चाचू मुझे घर जाने दो तो स्टेयरिंग पर बैठे प्रकाश ने पीछे गर्दन घुमाते हुए अपने साथियों से कहा खत्म कर दो साले को।
बस वही एक पल था जब आशु ने अपनी जिंदगी की आखिरी सांसें ली और रह गया उसके मां-बाप के लिए जीवन भर न भूलने वाला गम। पूछताछ के दौरान प्रकाश ने बताया कि उसने अपने दोस्तों के साथ फिरौती के लिए अपहरण किया था।
उसका प्लान था कि फिरौती मिलने के बाद बच्चे को छोड़ देंगे। मुझे क्या पता था कि बच्चा इतना स्मार्ट है कि सिर में गमछा और आधा मुंह ढकने के बाद भी पहचान लेगा। पहले फिरौती की रकम मिलने के बाद आशू की हत्या का प्लान बनाया लेकिन फिर 10 जून को मारकर जला दिया।
आशुतोष के परिजन पुलिस की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है। पिता धर्मपाल विधायक अजय कपूर से बातचीत के दौरान कहा कि जिस तरीके से पुलिस को एक्शन में आना चाहिए था उस तरीके से काम नहीं हुआ है।
पुलिस ने देर से अत्याधुनिक संसधानों का इस्तेमाल किया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। खुद विधायक भी मानते है कि आशुतोष अपहरणकांड में पुलिस से कही न कही भारी चूक हुई है।
वरना रिजल्ट यह न होता। वही, आरोपी प्रकाश के भाई सिद्घार्थ का कहना है कि उसका परिवार से ज्यादा मेलजोल नहीं है। भाई और वारदात में शामिल अन्य लोगों की इस हरकत से वह भी नाराज है।