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हिमालय पर चढ़कर ‘डर के आगे जीत’ हासिल करने जा रहे ये बच्चे

Sat, 29 Jul 2017 04:29 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर Updated Sat, 29 Jul 2017 04:29 PM IST
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Children going to climb Himalayas
नवोदय विद्यालय की छात्रा अंशिका और छात्र देवेन्द्र
बहादुरी से जिसकी प्रीत है, ज्ञान यही है जीवन का कि डर के आगे जीत है...। गांवों, कस्बों, छोटे शहरों से निकल कर विराट हिमालय फतह करना जिनकी ख्वाहिश है उनके लिए तो यही संदेश है। कानपुर देहात जलालपुर नागिन स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय के कक्षा 11 के एक छात्र व एक छात्रा का चयन माउंट एवरेस्ट फाउंडेशन की ओर से हिमालय पर चढ़ने के लिए किया गया है। इन छात्रों को प्रशिक्षण के लिए 28 अगस्त को मनाली के लिए रवाना किया जाएगा। 
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मत थर-थर-थर कांपो तुम, इस अवसर को अब भांपो तुम ये वक्त है तुम्हें पुकार रहा, इससे अब दूर न भागो तुम...।  हरिद्वार की संस्था माउंट एवरेस्ट फाउंडेशन हर वर्ष रोमांचक कार्यक्रम आयोजित करती है। इसके तहत बच्चों को पहाड़ों पर चढ़ने की ट्रेनिंग दी जाती है। प्रशिक्षण के बाद बच्चों को हिमालय पर चढ़ने के लिए भेजा जाता है। इस संस्था ने कानपुर देहात के जवाहर नवोदय विद्यालय के कक्षा 11 के छात्र देवेंद्र कुमार व छात्रा अंशिका कटियार को चयनति किया है।

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लखनऊ संभाग में आने वाले जवाहर नवोदय विद्यालय के 29 बच्चों का चयन किया गया है। प्राचार्य योगेंद्र भक्त ने बताया कि 31 अगस्त से 5 सितंबर तक यह कार्यक्रम मनाली में आयोजित किया जाएगा। इसमें प्रशिक्षण के बाद बच्चे हिमालय की चढ़ाई चढ़ेंगे। उन्होंने बताया कि इसके लिए अभिभावकों से अनापत्ति प्रमाण समेत कई औपचारिकताएं पूर्ण कराई जाएंगी। संस्था आने जाने का खर्च भी वहन करेगी। इस कार्यक्रम के लिए चयनित छात्र देवेंद्र पुत्र राकेश कुमार ने बताया कि वह मैथा के भक्तिनपुरवा का निवासी है। वह वॉलीबाल, क्रिकेट खेल का शौकीन है। पहाड़ पर चढ़ने की विशेष रुचि है। सिकंदरा के जितेंद्र की बेटी अंशिका ने बताया कि उसकी पहाड़ों पर चढ़ने की इच्छा शुरू से रही है। इसके पहले कई बार मध्यप्रदेश स्थित कई पहाड़ों पर चढ़ने की कोशिश की है। संस्था की ओर से छात्रों के चयन पर विद्यालय के शिक्षक व साथी छात्रों ने उन्हें बधाई दी है।
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धनश्री से लें प्रेरणा

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पर्वतारोही धनश्री
सूरत निवासी नौ वर्ष की धनश्री ने यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माउंट एलब्रस (18510 फीट) इसी वर्ष 18 जून को फतह कर ली। उसके साथ चोटी फतह करने वालों में उसका 13 वर्षीय भाई जानम, मां डॉ.सारिका पिता जिग्नेश भी थे। तमाम चुनौतियों, तूफान को परास्त कर परिवार ने यह सफलता हासिल की जो प्रेरणा और मिसाल है।

विदुषी विकलांगों, नेत्रहीनों को कराती हैं पर्वतारोहण 
बंगलूरू के क्राइस्ट चर्च कॉलेज से मनोविज्ञान में परास्नातक करने वाली विदुषी विकलांगों, नेत्रहीनों को पर्वतारोहण कराती हैं। लगभग वो इनेबल इंडिया में कम्युनिटी इनीशिएटिव की नेशनल कोर्डिनेटर हैं।
 

भारत के कुछ महत्वपूर्ण ट्रैकिंग क्षेत्र

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ट्रैकिंग सेंटर
लद्दाख
उत्तराखंड
हिमाचल प्रदेश
सिक्किम

पर्वतारोहण (ट्रैकिंग) में भविष्य
ग्राउंड कोर्डिनेटर

ट्रैकर्स से संवाद का गुण, प्रबंधन का कौशल होना चाहिए। शुरुआती वेतन 3 से 5 लाख रुपये सालाना।

ट्रैक लीडर्स
14000 फीट या अधिक ऊंचाई पर पर्वतारोहण का अनुभव। महीनों घर से दूर पहाड़ों पर रहने का सामर्थ्य। नेतृत्व क्षमता। शुरुआती वेतन 4 से 6 लाख रुपये सालाना।

 

कंटेंट राइटर

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डेमो पिक
पर्वतारोहण की दुनिया से लोगों को रूबरू कराना भी एक कला है। पहाडों की जटिलताओं को सहजता और उम्मीद से समझाना, फोटोग्राफी, वीडियो और सोशल मीडिया में काम करने की क्षमता। प्रिंट मीडिया के अनुभव को तरजीह मिलती है। शुरुआती वेतन 4 लाख सालाना।

ट्रैक रिसर्चर
देश भर के ट्रैक की महत्वपूर्ण सूचना जुटाना। पर्वतारोहियों को उनकी रुचि, समय और क्षमताओं के अनुसार संबंधित विकल्प बताना। बेहतर संवाद का हुनर होना चाहिए।
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