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मुख्यमंत्री जी, फाइलों में अटकी है कानपुर की सेहत, बेहतर इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे लोग

Sat, 22 May 2021 10:30 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Sat, 22 May 2021 10:30 AM IST
सार

कोरोना के कहर से कानपुर में बेहिसाब मौतें हुईं। वहीं येभी माना जा रहा है कि लोगों को समय से इलाज मिल जाता तो कइयों की जानें बच सकती थीं।

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Chief Minister yogi in Kanpur, Kanpur health system
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

मुख्यमंत्री जी, कोरोना की दूसरी लहर में जिले के सैकड़ों लोगों की जान चली गई। इनमें से तमाम लोगों को बचाया जा सकता था, यदि समय पर इन्हें बेहतर इलाज मिल जाता तो...। अब कोरोना की तीसरी लहर कितना कहर बरपाएगी, इसे लेकर सिर्फ कयास ही लगाए जा रहे हैं।
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मगर संसाधन जुटाकर मौतों का आंकड़ा कम जरूर किया जा सकता है। वक्त अभी भी है। कोरोना की दूसरी लहर ढलान पर है। कम से कम इतना करवा दीजिए कि जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था कोरोना की तीसरी लहर से मोर्चा लेने के लिए तैयार हो सके। कानपुर के उर्सला और हैलट जैसे बड़े अस्पतालों के तमाम अहम प्रोजेक्ट अटके हैं।
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कहीं शासन की लापरवाही है तो कहीं स्थानीय अफसरों की ढिलाई। हम कुछ महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की हकीकत आपके सामने रख रहे हैं। इन्हें फाइलों से बाहर निकलवाइए और अधूरे कामों को पूरा कराइए, ताकि तीसरी लहर में हमारे बच्चों को कुछ न हो सके।
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हार्ट और लंग्स ट्रांसप्लांट की फाइल शासन में अटकी
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के कॉर्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में हृदय और फेफड़ों के ट्रांसप्लांट की सर्जरी का प्रस्ताव शासन ने पास तो कर दिया है, लेकिन कुछ कागजी प्रक्रिया की वजह से अटका है। इस प्रस्ताव पर अमल होता है तो कॉर्डियोलॉजी प्रदेश में हार्ट और लंग्स का ट्रांसप्लांट करने वाला पहला संस्थान होगा। यह प्रस्ताव शासन को डेढ़ साल पहले भेजा गया था। प्रस्ताव शासन में अटका होने से ट्रांसप्लांट सर्जरी की शुरुआत नहीं हो सकी है। कोरोनाकाल में सबसे अधिक रोगियों के फेफड़े ही खराब हुए हैं। इसके बाद दूसरा असर लोगों के हार्ट पर आया है। कोरोना की तीसरी लहर में यह सर्जरी कइयों को जीवन दे सकती है।

डेढ़ साल में उर्सला की कार्डियक यूनिट शुरू नहीं हो पाई
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के नॉन कम्युनिकेबिल डिजीज (एनसीडी) कार्यक्रम के तहत उर्सला अस्पताल में डेढ़ साल पहले कार्डियक यूनिट को मंजूरी मिली थी। मगर ये शुरू नहीं हो सकी। कार्डियक यूनिट में सिर्फ एसी लगा है। कुछ सामान सीएमओ कार्यालय में पड़ा है। स्टाफ की नियुक्ति शासन से होनी है।

लापरवाही के कारण सारी प्रक्रिया रुकी पड़ी है। व्यवस्थाएं जुटाकर इसे सीएमओ के माध्यम से चालू किया जाना था। अगर यह यूनिट शुरू हो जाती तो कोरोनाकाल में रोगियों को इलाज मिल पाता। कोरोना काल में इसकी सबसे अधिक जरूरत थी, लेकिन इसके बहाने ही सारी प्रक्रिया रोक दी गई।

हैलट के पास अपनी एमआरआई, सीटी स्कैन मशीन तक नहीं
कितनी विडंबना है कि एम्स का दर्जा लेने चले जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पताल के पास अपनी एमआरआई और सीटी स्कैन मशीन तक नहीं है। शासन ने मेडिकल कॉलेज के लिए एमआरआई और सीटी स्कैन मशीन का प्रस्ताव पास कर मशीनें भी आवंटित कर दी हैं। लेकिन, मेडिकल कॉलेज प्रशासन स्थान न होने का रोना रो रहा है। प्रबंधन प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत बन रहे भवन के इंतजार में बैठा है। भवन निर्माण में जितनी देरी होगी, उतना ही मरीजों को परेशान होना पड़ेगा। दूसरी लहर में परेशान हो रहे मरीजों को राहत देने के बजाय हैलट प्रबंधन ने आंखें मूंद ली हैं। 

फाइलों में बंद इमरजेंसी मेडिसिन विभाग
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज का इमरजेंसी मेडिसिन विभाग भी फाइलों में ही बंद है। शासन ने डेढ़ साल पहले प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने विभागाध्यक्ष की नियुक्ति भी कर दी, मगर विभाग शुरू नहीं हो पाया। इस समय यदि विभाग होता तो कोविड और नॉन कोविड गंभीर रोगियों का अच्छा इलाज मिलता।

कई की जान भी बच सकती थी। इमरजेंसी मेडिसिन विभाग बनने से रोगी को विभागों के चक्कर नहीं लगाने होंगे। ब्लैक फंगस के आने के बाद नया संकट पैदा हुआ है। इसमें रोगी ईएनटी, नेत्र रोग, न्यूरोलॉजी और सर्जरी के बीच चक्कर लगाता रहता है। इस तरह के मामलों में इमरजेंसी मेडिसिन विभाग होने से बहुत राहत मिलती। इस रोग में भी मरीज को किडनी, लिवर, हार्ट की समस्या होने लगती है। विभाग होता तो उन्हें भी एक ही छत के नीचे इलाज मिल जाता।

बच्चों को खतरा ज्यादा और बालरोग में वेंटिलेटर नहीं
कोरोना की तीसरी लहर बच्चों के लिए ज्यादा खतरनाक बताई जा रही है। ऐसे में हैलट के बालरोग अस्पताल के पास अपना एक वेंटिलेटर तक नहीं है। 28 बेड के वेंटिलेटर युक्त आईसीयू के लिए शासन को भेजा गया प्रस्ताव तीन साल से ठंडे बस्ते में है। अब तीसरी लहर का खतरा सिर पर मंडराने लगा है तो न्यूरो साइंसेज लेवल थ्री कोविड अस्पताल की दूसरी मंजिल पर बाल रोगियों को भर्ती करने की योजना बनाई जा रही है।

हैलट के बालरोग अस्पताल में नगर और देहात ही नहीं, आसपास के आठ जिलों के रोगी आते हैं। यह रेफरल सेंटर भी है। मेडिसिन विभाग के आईसीयू में ही बाल रोगियों को जगह दे दी जाती है। कभी उनके लिए दो तो कभी पांच वेंटिलेटर दिए जाते हैं। अगर बच्चों में संक्रमण बढ़ा तो स्थिति संभालनी मुश्किल हो जाएगी।
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