पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच तो नहीं हैं लेकिन उनके मर्मस्पर्शी बोल और कविताएं लोगों के बीच कभी खत्म नहीं होंगी। अटल युवाओं के बीच अपनी कविताओं की वजह से काफी लोकप्रिय लोकप्रिय हुए थे। अटल की जिंदगी का एक बड़ा समय कानपुर में बीता।
जन्मदिन विशेषः 'कार्ल मार्क्स और सत्यार्थ' की विचारधारा का अटल के जीवन में था खास महत्व
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अपने भाषणों में अटल बिहारी अक्सर कनपुरिया कहावतों को दोहराते थे। हटिया खुली बजाजा बंद... झाड़े रहौ कलेक्टरगंज जैसी पंक्तियां उनके कानपुर के प्रति लगाव को प्रदर्शित करती थीं। लेकिन वह कानपुर से चुनाव लडने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। डीएवी कॉलेज के हॉस्टल में अटल के साथ रहने वाले उनके दोस्त बताते हैं कि उस दौर में मजदूरों के शहर में तत्कालीन सांसद एसएन बनर्जी को हराना मुश्किल था। कानपुर में कम्युनिस्टों का बोलबाला था, जबकि जनसंघ की जड़ें कमजोर थीं। यहां संघ का संगठनात्मक ढांचा ज्यादा अच्छी स्थिति में नहीं था। इसी कारण कानपुर से अच्छे रिश्तों के बावजूद अटल ने यहां से चुनाव नहीं लड़ा।
कुछ ही लोगों को यह पता होगा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने बतौर कम्युनिस्ट कदम रखा था। पढ़ाई-लिखाई के दौर में छात्र आंदोलनों में अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों में लाल परचम लहराता था। जिस शहर के छात्रावास में अटल रहते थे, उस शहर यानी मजदूरों और मिलों के शहर कानपुर का माहौल भी कम्युनिस्ट था। अटल पर मार्क्सवाद की छाप पड़ चुकी थी। इसी दौर में कार्ल मार्क्स और सत्यार्थ को पढ़ा तो महसूस हुआ कि दोनों के विचारों में खास अंतर नहीं है। राह बदली और अटल बिहारी वाजपेयी अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सानिध्य में थे।
कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एमए करने के बाद उन्होंने एलएलबी में प्रवेश लिया। इसके बाद उन्होंने कानपुर में ही एलएलबी की पढ़ी पूरी की। यह संयोग रहा कि उनके पिता भी उनके साथ ही एलएलबी के छात्र रहे। राजनीति में उनके सक्रिय होने के संकेत यहीं से दिखने लगे थे। पढाई के दौरान छात्र आंदोलनों में उनकी हमेशा सक्रिय और अग्रणी भूमिका रही। पढ़ाई और आंदोलनों के दौरान ही वे आरएसएस से प्रभावित हुए और सक्रिय रूप से संघ के कार्यों में जुट गए।
यह संयोग ही रहा कि संघ की विचारधारा के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक अटल बिहारी बाजपेई ने शुरूआती दौर में कम्युनिस्ट पार्टी के साथी कई आंदोलनों में हिस्सा लिया। कानपुर में छात्र जीवन के दौरान उन्होंने लाल परचम के साए में कई आंदोलनों ने हिस्सा लिया।