{"_id":"5864bf114f1c1b445ceebd1c","slug":"akhilesh-yadav-contest-election-from-here","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"...तो अखिलेश इस बार यहां से लड़ेंगे चुनाव","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
...तो अखिलेश इस बार यहां से लड़ेंगे चुनाव
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर
Updated Fri, 30 Dec 2016 11:36 AM IST
सार
तेईसवीं बार आमद के बाद खोला चुनावी पत्ता
पांच साल में मुख्यमंत्री 23 बार आए बुंदेलखंड
विज्ञापन
डेमो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पांच साल के कार्यकाल में 23 मर्तबा बुंदेलखंड की दौड़ शायद ‘रन फार वोट’ की थी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बुंदेलखंड के बबेरू या बबीना सीट से चुनाव लड़ने की मंशा जताने से यह बात साफ हो गई है। हालांकि इन दोनों सीटों का इतिहास सपा के लिए संतोषजनक नहीं रहा। बबेरू में 13 विधानसभा चुनाव में मात्र दो बार सपा को जीत हासिल हुई। बबीना में 11 चुनावों में सिर्फ एक बार सपा का परचम लहराया। बबेरू में पिछले 10 वर्षों से सपा और बबीना में बसपा का कब्जा है।
चर्चा है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अबकी विधानसभा चुनाव बुंदेलखंड से लड़ने के लिए दो सीटें बबेरू (बांदा) और बबीना (झांसी) पार्टी मुखिया
मुलायम सिंह यादव के सामने पेशकश की है। इसे लेकर बुंदेलखंड में राजनीति गरमा गई है। यहां के सपा विधायकों के साथ कांग्रेस विधायकों ने भी मुख्यमंत्री के यहां से चुनाव लड़ने पर स्वागत भरे बयान दिए हैं। बबेरू के सपा विधायक विशंभर सिंह यादव अपनी सीट मुख्यमंत्री के लिए छोड़ने की पेशकश पहले ही कर चुके हैं।
किसान आत्महत्याओं, कर्ज, पेयजल संकट, सूखा, भूख से मौतें इत्यादि समस्याओं से जकड़े बुंदेलखंड से मुख्यमंत्री ने चुनाव लड़ने की मंशा जताई है। बुंदेलखंड वैसे भी कभी सपा का गढ़ नहीं रहा। यहां 70 के दशक तक लाल झंडा यानी वामपंथी काबिज रहे। उसके बाद कांग्रेस ने लंबी पारी खेली। फिर बसपा ने अपने पांव जमा लिए। मौजूदा समय मेें भी बुंदेलखंड से बसपा के सात विधायक हैं। हालांकि सपा ने भी अपने विधायकों की संख्या बसपा के बराबर कर ली है। चरखारी और हमीरपुर में उप चुनाव हुए सपा ने ये सीटें भाजपा से छीनीं थीं। बुंदेलखंड में कांग्रेस के चार और भाजपा का मात्र एक विधायक है। यहां 19 सीटें हैं। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनने के बाद हमीरपुर और महोबा में पांच-पांच बार, बांदा में चार बार और जालौन, ललितपुर व झांसी में तीन-तीन बार आ चुके हैं लेकिन कभी यह भनक नहीं लगने दी कि वह यहां से चुनाव लड़ने का भी इरादा रखते हैं। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से सीएम ने इच्छा जताई थी लेकिन बुधवार की शाम को ही दोनों ही सीटों से प्रत्याशी घोषित कर दिए गए।
विज्ञापन
विज्ञापन
चर्चा है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अबकी विधानसभा चुनाव बुंदेलखंड से लड़ने के लिए दो सीटें बबेरू (बांदा) और बबीना (झांसी) पार्टी मुखिया
मुलायम सिंह यादव के सामने पेशकश की है। इसे लेकर बुंदेलखंड में राजनीति गरमा गई है। यहां के सपा विधायकों के साथ कांग्रेस विधायकों ने भी मुख्यमंत्री के यहां से चुनाव लड़ने पर स्वागत भरे बयान दिए हैं। बबेरू के सपा विधायक विशंभर सिंह यादव अपनी सीट मुख्यमंत्री के लिए छोड़ने की पेशकश पहले ही कर चुके हैं।
विज्ञापन
किसान आत्महत्याओं, कर्ज, पेयजल संकट, सूखा, भूख से मौतें इत्यादि समस्याओं से जकड़े बुंदेलखंड से मुख्यमंत्री ने चुनाव लड़ने की मंशा जताई है। बुंदेलखंड वैसे भी कभी सपा का गढ़ नहीं रहा। यहां 70 के दशक तक लाल झंडा यानी वामपंथी काबिज रहे। उसके बाद कांग्रेस ने लंबी पारी खेली। फिर बसपा ने अपने पांव जमा लिए। मौजूदा समय मेें भी बुंदेलखंड से बसपा के सात विधायक हैं। हालांकि सपा ने भी अपने विधायकों की संख्या बसपा के बराबर कर ली है। चरखारी और हमीरपुर में उप चुनाव हुए सपा ने ये सीटें भाजपा से छीनीं थीं। बुंदेलखंड में कांग्रेस के चार और भाजपा का मात्र एक विधायक है। यहां 19 सीटें हैं। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनने के बाद हमीरपुर और महोबा में पांच-पांच बार, बांदा में चार बार और जालौन, ललितपुर व झांसी में तीन-तीन बार आ चुके हैं लेकिन कभी यह भनक नहीं लगने दी कि वह यहां से चुनाव लड़ने का भी इरादा रखते हैं। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से सीएम ने इच्छा जताई थी लेकिन बुधवार की शाम को ही दोनों ही सीटों से प्रत्याशी घोषित कर दिए गए।
विज्ञापन
एक को जीत और दूसरे सीएम को झेलनी पड़ी है हार
अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश
एक को जीत और दूसरे सीएम को झेलनी पड़ी है हार
इसके पहले भी बुंदेलखंड दो बार मुख्यमंत्रियों के चुनाव से सुर्खियों में रहा है। बुंदेली मतदाताओं ने 60 के दशक में एक मुख्यमंत्री को पराजय का मजा चखाया। अलबत्ता 80 के दशक में लड़े मुख्यमंत्री को बुंदेलियों ने सिर आंखों पर बैठाया। यह दोनों ही कांग्रेस के थे। अखिलेश यादव अगर चुनाव लड़े तो वह बुंदेलखंड में तीसरे मुख्यमंत्री प्रत्याशी होंगे। 1967 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता ने मौदहा (हमीरपुर) से चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें एक महिला निर्दलीय प्रत्याशी रानी राजेंद्र कुमारी ने पराजित कर दिया था। दूसरी बार बुंदेलखंड से तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1980 में तिंदवारी (बांदा) सीट से चुनाव लड़ा था। वह जीत गए थे।
इसके पहले भी बुंदेलखंड दो बार मुख्यमंत्रियों के चुनाव से सुर्खियों में रहा है। बुंदेली मतदाताओं ने 60 के दशक में एक मुख्यमंत्री को पराजय का मजा चखाया। अलबत्ता 80 के दशक में लड़े मुख्यमंत्री को बुंदेलियों ने सिर आंखों पर बैठाया। यह दोनों ही कांग्रेस के थे। अखिलेश यादव अगर चुनाव लड़े तो वह बुंदेलखंड में तीसरे मुख्यमंत्री प्रत्याशी होंगे। 1967 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता ने मौदहा (हमीरपुर) से चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें एक महिला निर्दलीय प्रत्याशी रानी राजेंद्र कुमारी ने पराजित कर दिया था। दूसरी बार बुंदेलखंड से तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1980 में तिंदवारी (बांदा) सीट से चुनाव लड़ा था। वह जीत गए थे।
जातिगत आंकड़ों से सीएम भी नहीं उबरे
डेमो
जातिगत आंकड़ों से सीएम भी नहीं उबरे
मुख्यमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर आसीन होने के बाद भी अपनी सीट तलाशने में जातिगत आंकड़ों से उबर नहीं पाए। तिंदवारी विधानसभा क्षेत्र ठाकुर बाहुल्य मानी जाती है। यहां खासी तादाद में ठाकुर मतदाता हैं। कांग्रेस से शिव प्रताप सिंह विधायक चुने गए थे। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर सीट खाली की थी। बबेरू में भी यादव बिरादरी के मतदाता काफी हैं। इसीलिए उन्होंने वहां से चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर की है। मौजूदा विधायक विशंभर सिंह यादव पिछले दो चुनावों से लगातार जीत रहे हैं।
मुख्यमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर आसीन होने के बाद भी अपनी सीट तलाशने में जातिगत आंकड़ों से उबर नहीं पाए। तिंदवारी विधानसभा क्षेत्र ठाकुर बाहुल्य मानी जाती है। यहां खासी तादाद में ठाकुर मतदाता हैं। कांग्रेस से शिव प्रताप सिंह विधायक चुने गए थे। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर सीट खाली की थी। बबेरू में भी यादव बिरादरी के मतदाता काफी हैं। इसीलिए उन्होंने वहां से चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर की है। मौजूदा विधायक विशंभर सिंह यादव पिछले दो चुनावों से लगातार जीत रहे हैं।
सभी 19 सीटों पर बढ़ सकते हैं सपा के वोट
डेमो
सभी 19 सीटों पर बढ़ सकते हैं सपा के वोट
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बुंदेलखंड से चुनाव लड़ना यहां की 19 विधानसभा सीटों पर भी असर डाल सकता है। सपा गलियारों में इसे लेकर काफी उत्साह नजर आ रहा है। दूसरी तरफ विपक्षी दल भले ही ऊपरी तौर पर मुख्यमंत्री का कोई असर न पड़ने की बात कह रहे हों, पर अंदरूनी दौर पर वह भी चिंतित हैं। राजनीति में दिलचस्पी और वोटों की गणित में महारत रखने वालों का मानना है कि मुख्यमंत्री के चुनाव लड़ने से सपा को अच्छे खासे वोटों का फायदा होगा। यादव और मुस्लिम मतदाताओं के अलावा कई पिछड़ों का भी वोट जुड़ेगा। 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का प्रस्ताव कैबिनेट में पास कराकर इन जातियों को अपने पाले में लाने का कार्ड हाल में मुख्यमंत्री खेल चुके हैं। ऐसे में उनका वोट भी मुख्यमंत्री के नाम पर सपा की झोली मेें आ सकता है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बुंदेलखंड से चुनाव लड़ना यहां की 19 विधानसभा सीटों पर भी असर डाल सकता है। सपा गलियारों में इसे लेकर काफी उत्साह नजर आ रहा है। दूसरी तरफ विपक्षी दल भले ही ऊपरी तौर पर मुख्यमंत्री का कोई असर न पड़ने की बात कह रहे हों, पर अंदरूनी दौर पर वह भी चिंतित हैं। राजनीति में दिलचस्पी और वोटों की गणित में महारत रखने वालों का मानना है कि मुख्यमंत्री के चुनाव लड़ने से सपा को अच्छे खासे वोटों का फायदा होगा। यादव और मुस्लिम मतदाताओं के अलावा कई पिछड़ों का भी वोट जुड़ेगा। 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का प्रस्ताव कैबिनेट में पास कराकर इन जातियों को अपने पाले में लाने का कार्ड हाल में मुख्यमंत्री खेल चुके हैं। ऐसे में उनका वोट भी मुख्यमंत्री के नाम पर सपा की झोली मेें आ सकता है।
बबेरू में 13 में दो और बबीना मेें 11 में एक चुनाव जीती सपा
डेमो
बबेरू में 13 में दो और बबीना मेें 11 में एक चुनाव जीती सपा
बबेरू और बबीना विधानसभा क्षेत्रों के पुराने चुनावी इतिहास पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि 1952 से 2012 तक हुए विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा जीत कांग्रेस के पाले में आई है। यहां 1952, 1957, 1962, 1967, 1980, और 1989 में (कुल छह बार) कांग्रेस जीती। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को दो बार 1974 व 1977 में जीत हासिल हुई। बसपा भी दो चुनाव में 1993 और 2002 में चुनाव जीती। सपा को यहां से 2007 और 2012 में सफलता हासिल हुई। भाजपा का परचम मात्र एक बार 1996 में लहराया। इसके अलावा एक बार 1985 में निर्दलीय प्रत्याशी ने चुनाव जीता। मौजूदा में पिछले दो चुनावों से सपा के विशंभर सिंह यादव विधायक हैं।
उधर, बबीना (झांसी) सीट में पिछले 11 चुनावों में कांग्रेस और बसपा को 3-3 बार और भाजपा को दो बार जीत मिली। कांग्रेस 1967, 1989 व 1985 में और बसपा 1996, 2007 व 2012 में जीती। सपा मात्र एक बार 2002 में जीत हासिल कर सकी। एक-एक बार बीजेएस और जेएनपी (1974 व 1977) में विजयी हुई। मौजूदा में इस सीट पर बसपा के कृष्णपाल सिंह रापजूत काबिज हैं। इसके पूर्व 2007 में भी बसपा के रतनलाल अहिरवार जीते थे।
बबेरू और बबीना विधानसभा क्षेत्रों के पुराने चुनावी इतिहास पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि 1952 से 2012 तक हुए विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा जीत कांग्रेस के पाले में आई है। यहां 1952, 1957, 1962, 1967, 1980, और 1989 में (कुल छह बार) कांग्रेस जीती। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को दो बार 1974 व 1977 में जीत हासिल हुई। बसपा भी दो चुनाव में 1993 और 2002 में चुनाव जीती। सपा को यहां से 2007 और 2012 में सफलता हासिल हुई। भाजपा का परचम मात्र एक बार 1996 में लहराया। इसके अलावा एक बार 1985 में निर्दलीय प्रत्याशी ने चुनाव जीता। मौजूदा में पिछले दो चुनावों से सपा के विशंभर सिंह यादव विधायक हैं।
उधर, बबीना (झांसी) सीट में पिछले 11 चुनावों में कांग्रेस और बसपा को 3-3 बार और भाजपा को दो बार जीत मिली। कांग्रेस 1967, 1989 व 1985 में और बसपा 1996, 2007 व 2012 में जीती। सपा मात्र एक बार 2002 में जीत हासिल कर सकी। एक-एक बार बीजेएस और जेएनपी (1974 व 1977) में विजयी हुई। मौजूदा में इस सीट पर बसपा के कृष्णपाल सिंह रापजूत काबिज हैं। इसके पूर्व 2007 में भी बसपा के रतनलाल अहिरवार जीते थे।