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सिंघाड़े की खेती को चाहिए इमदाद
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
Updated Mon, 23 Nov 2015 11:52 PM IST
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क्षेत्र में सिंघाड़े की खेती करके परिवार का पेट
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पालने वालों को आज भी सरकारी मदद का इंतजार है। साल दर साल बीतते जा रहे,
पर सरकार की तरफ से सिंघाड़े की खेती को बढ़ावा देने को कोई ठोस योजना नहीं
तैयार की जा रही, जिससे सिंघाड़ा की खेती करने वाले किसान खुद को उपेक्षित
महसूस कर रहे हैं।
मनरेगा से खुदाए गए तालाबों में पानी भराकर सिंघाड़े की खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है, पर न तो इस ओर जनप्रतिनिधियों का ध्यान जा रहा और न ही अफसरों का। माधौनगर के कोमिल बताते हैं कि वे कई सालों से सिंघाड़े की खेती कर रहे, पर आज तक सरकार की किसी योजना के तहत उन्हें फूटी कौड़ी भी मदद के नाम पर नहीं मिली।
आज भी परंपरागत ढंग से ही सिंघाड़े की खेती हो रही है। समय के साथ-साथ दिक्कतें कम होने की बजाय बढ़ी हैं। तालाबों में घट रहा पानी भी कहर बरपा रहा है। अमोलर के हीरालाल ने बताया कि तालाब सूखने पर किसी सरकारी योजना से कोई अनुदान नहीं मिलता है। किसी सरकारी योजना के तहत वैज्ञानिक जानकारियां भी नहीं मिल पाती हैं।
पैतृक धंधा है, पर इसके तौरतरीके आज भी सालों पुराने हैं। बताया कि सबसे पहले सिंघाड़े की पौध छोटे तालाब में तैयार करते हैं। कई किसान पौध तैयार कर बिक्री भी करते हैं। कई किसान उनसे पौध लेकर तालाब में डालते हैं। एक एकड़ तालाब में करीब तीन हजार रुपये कीमत की पौध डालनी पड़ती है।
जुलाई के प्रथम सप्ताह में पौध तैयार होती है। इसके बाद इसे तैयार करने के दौरान डीएपी व जैविक खाद डालनी पड़ती है। कीटनाशक दवाओं का भी प्रयोग करते हैं। अक्तूबर महीने में फसल तैयार होनी शुरू हो जाती है। इसके बाद सिंघाड़े की तुड़ाई की जाती है। करीब तीन से चार महीने में फसल तैयार होती है।
सुभाष चंद्र बताते हैं कि एक एकड़ में करीब 40 हजार रुपये तक कुल लागत आती है। इसमें सिंघाड़ा का उत्पादन करीब 40 क्विंटल तक होता है जो 60 से 70 हजार रुपये तक में बिक जाता है। सिंघाड़े के बाद मछली पालन भी करके किसान पेट पालते हैं। उन्होंने कहा कि यदि सरकार अत्याधुनिक प्रजाति विकसित करे व बीज अनुदान पर दे और तालाबों में पानी भराने की सुविधा मुहैया कराए तो सिंघाड़े उगाने वालों को दिन बहुर जाएं।
मनरेगा से खुदाए गए तालाबों में पानी भराकर सिंघाड़े की खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है, पर न तो इस ओर जनप्रतिनिधियों का ध्यान जा रहा और न ही अफसरों का। माधौनगर के कोमिल बताते हैं कि वे कई सालों से सिंघाड़े की खेती कर रहे, पर आज तक सरकार की किसी योजना के तहत उन्हें फूटी कौड़ी भी मदद के नाम पर नहीं मिली।
आज भी परंपरागत ढंग से ही सिंघाड़े की खेती हो रही है। समय के साथ-साथ दिक्कतें कम होने की बजाय बढ़ी हैं। तालाबों में घट रहा पानी भी कहर बरपा रहा है। अमोलर के हीरालाल ने बताया कि तालाब सूखने पर किसी सरकारी योजना से कोई अनुदान नहीं मिलता है। किसी सरकारी योजना के तहत वैज्ञानिक जानकारियां भी नहीं मिल पाती हैं।
पैतृक धंधा है, पर इसके तौरतरीके आज भी सालों पुराने हैं। बताया कि सबसे पहले सिंघाड़े की पौध छोटे तालाब में तैयार करते हैं। कई किसान पौध तैयार कर बिक्री भी करते हैं। कई किसान उनसे पौध लेकर तालाब में डालते हैं। एक एकड़ तालाब में करीब तीन हजार रुपये कीमत की पौध डालनी पड़ती है।
जुलाई के प्रथम सप्ताह में पौध तैयार होती है। इसके बाद इसे तैयार करने के दौरान डीएपी व जैविक खाद डालनी पड़ती है। कीटनाशक दवाओं का भी प्रयोग करते हैं। अक्तूबर महीने में फसल तैयार होनी शुरू हो जाती है। इसके बाद सिंघाड़े की तुड़ाई की जाती है। करीब तीन से चार महीने में फसल तैयार होती है।
सुभाष चंद्र बताते हैं कि एक एकड़ में करीब 40 हजार रुपये तक कुल लागत आती है। इसमें सिंघाड़ा का उत्पादन करीब 40 क्विंटल तक होता है जो 60 से 70 हजार रुपये तक में बिक जाता है। सिंघाड़े के बाद मछली पालन भी करके किसान पेट पालते हैं। उन्होंने कहा कि यदि सरकार अत्याधुनिक प्रजाति विकसित करे व बीज अनुदान पर दे और तालाबों में पानी भराने की सुविधा मुहैया कराए तो सिंघाड़े उगाने वालों को दिन बहुर जाएं।