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कन्नौजः लॉकडाउन में छलका दर्द, उधार के रुपये भी खर्च
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कन्नौजः रामपुर निवादा में आवास के बाहर बैठीं विधवा मीना देवी और परिजन।
- फोटो : KANNAUJ
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जलालपुर पनवारा (कन्नौज) में मुंबई से घर पहुंचे चार लोगों की दास्तां दिल को झकझोर देने वाली है। भूख से बेबस लोगों के उधार लिए छह हजार रुपये खर्च हो गए तो एक समय का खाना भी मुश्किल हो गया।
ऐसे में घर की याद आई। 14 हजार का मोबाइल 1200 रुपये में बेचना पड़ा। इतने में तीन लोगों की टिकट मिल पाई। यह ट्रेन से घर पहुंचे। छोटे बेटे को पैदल आना पड़ा। परिवार ने दर्द बयां किया तो लोगों की आंखें छलक गईं।
सदर तहसील के रामपुर निवादा गांव की मीना देवी के पति ब्रजकिशोर कश्यप की दो साल पहले मौत हो गई। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इससे दो साल पहले मीना देवी देवर राम तिलक के साथ मुंबई चली र्गइं। बेटे शनि और श्याम को भी साथ ले गईं।
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धुल्ले जिले के साकीर में किराये पर मकान लिया। बर्फ की ठेली और कारखाने में काम से गुजर बसर होने लगी। कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन ने मुसीबत खड़ी कर दी। जमा पूंजी 50 दिन के लॉकडाउन में खत्म हो गई। छह हजार रुपये उधार लेने पड़े। कमरे का किराया बढ़ रहा था। फांकों की नौबत आ गई। कई दफा एक ही वक्त रोटी मिली।
रात को भूखे सोना पड़ा। ऐसे में घर लौटना ही इकलौता रास्ता था। किराये के लिए पैसे जुटाने की कोशिश शुरू की। शनि ने 14 हजार का मोबाइल फोन 1200 रुपये में बेच दिया। इतने में मीना देवी, राम तिलक और शनि की टिकटें मिल पाईं।
श्याम की टिकट खरीदने के लिए रुपये नहीं बचे थे। तीनों ट्रेन में भूखे प्यासे बैठ गए। श्याम को गांव के लिए पैदल निकल पड़ा। मीना देवी, राम तिलक और शनि दूसरे दिन शाम को घर पहुंच गए। श्याम कभी पैदल तो कभी किसी वाहन का सहारा लेकर चार दिन में गांव पहुंचा। घर पहुंचने पर इनके आंसू थम नहीं रहे थे।
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ऐसे में घर की याद आई। 14 हजार का मोबाइल 1200 रुपये में बेचना पड़ा। इतने में तीन लोगों की टिकट मिल पाई। यह ट्रेन से घर पहुंचे। छोटे बेटे को पैदल आना पड़ा। परिवार ने दर्द बयां किया तो लोगों की आंखें छलक गईं।
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सदर तहसील के रामपुर निवादा गांव की मीना देवी के पति ब्रजकिशोर कश्यप की दो साल पहले मौत हो गई। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इससे दो साल पहले मीना देवी देवर राम तिलक के साथ मुंबई चली र्गइं। बेटे शनि और श्याम को भी साथ ले गईं।
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धुल्ले जिले के साकीर में किराये पर मकान लिया। बर्फ की ठेली और कारखाने में काम से गुजर बसर होने लगी। कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन ने मुसीबत खड़ी कर दी। जमा पूंजी 50 दिन के लॉकडाउन में खत्म हो गई। छह हजार रुपये उधार लेने पड़े। कमरे का किराया बढ़ रहा था। फांकों की नौबत आ गई। कई दफा एक ही वक्त रोटी मिली।
रात को भूखे सोना पड़ा। ऐसे में घर लौटना ही इकलौता रास्ता था। किराये के लिए पैसे जुटाने की कोशिश शुरू की। शनि ने 14 हजार का मोबाइल फोन 1200 रुपये में बेच दिया। इतने में मीना देवी, राम तिलक और शनि की टिकटें मिल पाईं।
श्याम की टिकट खरीदने के लिए रुपये नहीं बचे थे। तीनों ट्रेन में भूखे प्यासे बैठ गए। श्याम को गांव के लिए पैदल निकल पड़ा। मीना देवी, राम तिलक और शनि दूसरे दिन शाम को घर पहुंच गए। श्याम कभी पैदल तो कभी किसी वाहन का सहारा लेकर चार दिन में गांव पहुंचा। घर पहुंचने पर इनके आंसू थम नहीं रहे थे।