{"_id":"a3c2a79d61aebe1adf2da2cf0b2186ca","slug":"malnutrition-difference-in-standards-childs-in-problem-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"कुपोषण : मानकों में टक्कर, बच्चे बने घनचक्कर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कुपोषण : मानकों में टक्कर, बच्चे बने घनचक्कर
अमर उजाला कन्नाैैज
Updated Tue, 10 Mar 2015 11:53 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रदेश सरकार की ओर से कुपोषित व अति कुपोषित बच्चों को पोषाहार और जिला अस्पताल में उपचार के माध्यम से सेहतमंद बनाने की योजना पर जिले के अफसर पानी फेरने पर आमादा हैं। बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग और स्वास्थ्य विभाग में तालमेल की कमी का खामियाजा कुपोषित बच्चे भुगत रहे हैं। जिले में कई मामले ऐसे आए हैं जहां एक विभाग बच्चों को कुपोषित बता रहा है तो दूसरा सेहतमंद।
जिले में कई महीनों से गांवों के कुपोषित बच्चों को सेहतमंद बनाने के लिए योजना संचालित की जा रही है। इसकी मानीटरिंग जिला कार्यक्रम अधिकारी कार्यालय व स्वास्थ्य विभाग संयुक्त रूप से कर रहे हैं। डीएम ने दर्जनों की तादात में अफसरों की टीमों को गांवों में भेजकर कुपोषित बच्चों का सर्वे कराया है। लोहिया गांवों को विशेष तौर पर अफसरों को गोद देकर कुपोषण दूर कराने की मुहिम चल रही है।
योजना के तहत पहले कुपोषित बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र के जरिए खोजा जाता है। इसके बाद पोषाहार और उपचार के लिए उन्हें जिला अस्पताल में पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया जाता है। बीते कई महीनों से बच्चों को भर्ती कराने के दौरान आंगनबाड़ी विभाग व स्वास्थ्य महकमे में जंग छिड़ी है।
विज्ञापन
आंगनबाड़ी केंद्रों से चिह्नित ज्यादातर कुपोषित बच्चों को जिला अस्पताल में बने पुनर्वास केंद्र में भर्ती ही नहीं किया जा रहा है। आए दिन कुपोषित बच्चों को लौटा दिया जाता है। इस दौरान होने वाली परेशानी के लिए दोनों विभाग एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराकर पल्ला झाड़ लेते हैं। अब तक सैकड़ों बच्चे लौटाए जा चुके हैं।
केस-1
जलालाबाद निवासी बालिका पुष्पा और गुंजन को आंगनबाड़ी केंद्र पर वहां तैनात कार्यकत्री और सहायिका ने जांच के बाद कुपोषित पाया। दोनों ने इसकी सूचना बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना की टीम को दी। टीम के सदस्यों ने मौके पर पहुंचकर दोनों बच्चों की स्वास्थ्य जांच की और कुपोषित करार दिया। इसके बाद दोनों को उनके मां-बाप के साथ जिला अस्पताल स्थित कुपोषित वार्ड लाया गया। यहां बच्चों को भर्ती करने की जगह वापस लौटा दिया गया। जिला अस्पताल के स्टाफ ने कहा कि उनके मानकों के अनुसार दोनों बच्चे अति कुपोषित श्रेणी में नहीं आते।
केस-2
छिबरामऊ निवासी बालिका राधा को उसके परिजन आंगनबाड़ी केंद्र पर लेकर पहुंचे। वहां कार्यकत्री ने वजन करने के दौरान उसे कुपोषित पाया। इसी दौरान आंगनबाड़ी केंद्र पहुंची बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना की स्वास्थ्य टीम के सामने उसे पेश किया गया। इस टीम ने भी बच्चों को कुपोषित मानते हुए इलाज के लिए जिला अस्पताल में बने पोषण पुनर्वास केंद्र पर भेजा। बालिका के परिजन उसे लेकर जिला अस्पताल आए तो उसे भर्ती करने इनकार कर दिया गया। पुनर्वास केंद्र के स्टाफ ने कहा कि उनके मानकों के अनुसार बच्चा कुपोषित श्रेणी में नहीं आता है।
दोनोें विभाग के मानकों में है फर्क
आंगनबाड़ी महकमे का स्टाफ कुपोषित व अति कुपोषित बच्चों की पहचान उम्र और वजन के आधार पर करता है। वहीं जिला अस्पताल में बने पुनर्वास केंद्र का स्टाफ बच्चे की लंबाई नापने के बाद उसके वजन के आधार पर निर्धारित मानक के मुताबिक उसे कुपोषित या अति कुपोषित की कैटागिरी में रखते हैं। दोनों महकमों के मानकों का यही अंतर विवाद का कारण बन गया है।
रेफरल प्रारूप बनाया जा रहा है। आगे से आंगनबाड़ी कार्यकत्री की तरफ से चिह्नित कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों का बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना के तहत चिह्नित डाक्टर जांच के बाद निर्धारित प्रारूप भरेंगे। भर्ती होने के लिए भेजे जाने के वक्त रेफर करने वाले कागजात की एक प्रति बच्चे के अभिभावक को दी जाएगी। ताकि वह जिला अस्पताल के स्टाफ को दिखा सके। आगे से ऐसी व्यवस्था भी की जाएगी कि जो बच्चे पहुंचें उन्हें कम से कम दो दिन तक पुनर्वास केंद्र में रखकर उपचार प्रदान किया जाए। विभागीय तालमेल बेहतर बनाया जाएगा।
राजेश कुमार बघेल, बाल स्वास्थ्य पोषण समिति के सदस्य
पुनर्वास केंद्र में तैनात स्टाफ को अति कुपोषित बच्चे को भर्ती करने संबंधी अधिकार नहीं है। यह अधिकार वहां तैनात बाल रोग विशेषज्ञ डा. सीपी सिंह को दिए गए हैं। बच्चे को लेकर सीधे जिला अस्पताल पहुंचना गलत है। पहले बच्चे को लेकर सीएचसी व पीएचसी जाएं, जहां डाक्टर उनकी जांच करेंगे। जो बच्चे दवा से ठीक हो सकते हैं उन्हें भर्ती नहीं किया जाएगा। पीएचसी-सीएचसी के डाक्टर जब बच्चे को कुपोषित वार्ड के लिए रेफर करेंगे तभी उसे भर्ती किया जाएगा। आंगनबाड़ी कार्यकत्री व बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना के कर्मचारी बच्चे को सीधे भर्ती नहीं करा सकते हैं।
डा. पीएन वाजपेयी, सीएमओ
विज्ञापन
जिले में कई महीनों से गांवों के कुपोषित बच्चों को सेहतमंद बनाने के लिए योजना संचालित की जा रही है। इसकी मानीटरिंग जिला कार्यक्रम अधिकारी कार्यालय व स्वास्थ्य विभाग संयुक्त रूप से कर रहे हैं। डीएम ने दर्जनों की तादात में अफसरों की टीमों को गांवों में भेजकर कुपोषित बच्चों का सर्वे कराया है। लोहिया गांवों को विशेष तौर पर अफसरों को गोद देकर कुपोषण दूर कराने की मुहिम चल रही है।
विज्ञापन
योजना के तहत पहले कुपोषित बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र के जरिए खोजा जाता है। इसके बाद पोषाहार और उपचार के लिए उन्हें जिला अस्पताल में पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया जाता है। बीते कई महीनों से बच्चों को भर्ती कराने के दौरान आंगनबाड़ी विभाग व स्वास्थ्य महकमे में जंग छिड़ी है।
विज्ञापन
आंगनबाड़ी केंद्रों से चिह्नित ज्यादातर कुपोषित बच्चों को जिला अस्पताल में बने पुनर्वास केंद्र में भर्ती ही नहीं किया जा रहा है। आए दिन कुपोषित बच्चों को लौटा दिया जाता है। इस दौरान होने वाली परेशानी के लिए दोनों विभाग एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराकर पल्ला झाड़ लेते हैं। अब तक सैकड़ों बच्चे लौटाए जा चुके हैं।
केस-1
जलालाबाद निवासी बालिका पुष्पा और गुंजन को आंगनबाड़ी केंद्र पर वहां तैनात कार्यकत्री और सहायिका ने जांच के बाद कुपोषित पाया। दोनों ने इसकी सूचना बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना की टीम को दी। टीम के सदस्यों ने मौके पर पहुंचकर दोनों बच्चों की स्वास्थ्य जांच की और कुपोषित करार दिया। इसके बाद दोनों को उनके मां-बाप के साथ जिला अस्पताल स्थित कुपोषित वार्ड लाया गया। यहां बच्चों को भर्ती करने की जगह वापस लौटा दिया गया। जिला अस्पताल के स्टाफ ने कहा कि उनके मानकों के अनुसार दोनों बच्चे अति कुपोषित श्रेणी में नहीं आते।
केस-2
छिबरामऊ निवासी बालिका राधा को उसके परिजन आंगनबाड़ी केंद्र पर लेकर पहुंचे। वहां कार्यकत्री ने वजन करने के दौरान उसे कुपोषित पाया। इसी दौरान आंगनबाड़ी केंद्र पहुंची बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना की स्वास्थ्य टीम के सामने उसे पेश किया गया। इस टीम ने भी बच्चों को कुपोषित मानते हुए इलाज के लिए जिला अस्पताल में बने पोषण पुनर्वास केंद्र पर भेजा। बालिका के परिजन उसे लेकर जिला अस्पताल आए तो उसे भर्ती करने इनकार कर दिया गया। पुनर्वास केंद्र के स्टाफ ने कहा कि उनके मानकों के अनुसार बच्चा कुपोषित श्रेणी में नहीं आता है।
दोनोें विभाग के मानकों में है फर्क
आंगनबाड़ी महकमे का स्टाफ कुपोषित व अति कुपोषित बच्चों की पहचान उम्र और वजन के आधार पर करता है। वहीं जिला अस्पताल में बने पुनर्वास केंद्र का स्टाफ बच्चे की लंबाई नापने के बाद उसके वजन के आधार पर निर्धारित मानक के मुताबिक उसे कुपोषित या अति कुपोषित की कैटागिरी में रखते हैं। दोनों महकमों के मानकों का यही अंतर विवाद का कारण बन गया है।
रेफरल प्रारूप बनाया जा रहा है। आगे से आंगनबाड़ी कार्यकत्री की तरफ से चिह्नित कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों का बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना के तहत चिह्नित डाक्टर जांच के बाद निर्धारित प्रारूप भरेंगे। भर्ती होने के लिए भेजे जाने के वक्त रेफर करने वाले कागजात की एक प्रति बच्चे के अभिभावक को दी जाएगी। ताकि वह जिला अस्पताल के स्टाफ को दिखा सके। आगे से ऐसी व्यवस्था भी की जाएगी कि जो बच्चे पहुंचें उन्हें कम से कम दो दिन तक पुनर्वास केंद्र में रखकर उपचार प्रदान किया जाए। विभागीय तालमेल बेहतर बनाया जाएगा।
राजेश कुमार बघेल, बाल स्वास्थ्य पोषण समिति के सदस्य
पुनर्वास केंद्र में तैनात स्टाफ को अति कुपोषित बच्चे को भर्ती करने संबंधी अधिकार नहीं है। यह अधिकार वहां तैनात बाल रोग विशेषज्ञ डा. सीपी सिंह को दिए गए हैं। बच्चे को लेकर सीधे जिला अस्पताल पहुंचना गलत है। पहले बच्चे को लेकर सीएचसी व पीएचसी जाएं, जहां डाक्टर उनकी जांच करेंगे। जो बच्चे दवा से ठीक हो सकते हैं उन्हें भर्ती नहीं किया जाएगा। पीएचसी-सीएचसी के डाक्टर जब बच्चे को कुपोषित वार्ड के लिए रेफर करेंगे तभी उसे भर्ती किया जाएगा। आंगनबाड़ी कार्यकत्री व बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना के कर्मचारी बच्चे को सीधे भर्ती नहीं करा सकते हैं।
डा. पीएन वाजपेयी, सीएमओ