{"_id":"e3ad94b4f3ffc59d2c41096a1f013189","slug":"india-could-not-build-dreams-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘सपनों के भारत का नहीं हो सका निर्माण’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘सपनों के भारत का नहीं हो सका निर्माण’
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
Updated Mon, 25 Jan 2016 11:58 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कस्बे के 103 वर्षीय वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी
विज्ञापन
गोवर्धनलाल कनौजिया व 99 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी रामसनेही पांडेय को इस
बात का मलाल है कि जंग-ए-आजादी की लड़ाई के दौरान आजाद भारत का जो सपना
उन्होंने देखा था वह पूरा नहीं हो पाया।
कहा कि देश आजाद तो हुआ, पर उनके सपनों का देश नहीं बन पाया। आज भी देशवासी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्षरत है। वहीं सरकारें सिर्फ अपने हितों की रक्षा में ही मशगूल हैं। सेनानी गोवर्धनलाल के मुताबिक कल हम अपना 67वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं।
गणतंत्र का अर्थ जनता की सरकार, जनता द्वारा चुनी हुई व जनता के लिए है, पर सरकारें इन उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पा रही है। देश भर में अराजकता का माहौल है। कोई भी सरकार इस पर अंकुश नहीं लगा पा रही है। जनता खामोशी के साथ सबकुछ सहन कर रही है।
मौजूदा सरकारों को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा, जिससे नागरिकों का सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक उत्थान हो, तभी हम कह सकेंगे कि हम सही मायनों में अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए हैं। सेनानी रामसनेही के मुताबिक शासन व प्रशासन आजादी के लिए लड़ने वाले लोगों को भूल रहा है। राष्ट्रीय पर्वों पर ही उन्हें सेनानियों की याद आती है।
कहा कि देश आजाद तो हुआ, पर उनके सपनों का देश नहीं बन पाया। आज भी देशवासी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्षरत है। वहीं सरकारें सिर्फ अपने हितों की रक्षा में ही मशगूल हैं। सेनानी गोवर्धनलाल के मुताबिक कल हम अपना 67वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं।
गणतंत्र का अर्थ जनता की सरकार, जनता द्वारा चुनी हुई व जनता के लिए है, पर सरकारें इन उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पा रही है। देश भर में अराजकता का माहौल है। कोई भी सरकार इस पर अंकुश नहीं लगा पा रही है। जनता खामोशी के साथ सबकुछ सहन कर रही है।
मौजूदा सरकारों को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा, जिससे नागरिकों का सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक उत्थान हो, तभी हम कह सकेंगे कि हम सही मायनों में अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए हैं। सेनानी रामसनेही के मुताबिक शासन व प्रशासन आजादी के लिए लड़ने वाले लोगों को भूल रहा है। राष्ट्रीय पर्वों पर ही उन्हें सेनानियों की याद आती है।