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नेत्र रोग हरने वाली ज्वालामुखी मां
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
Updated Tue, 20 Oct 2015 12:40 AM IST
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विशुनगढ़ नगरिया का ऐतिहासिक ज्वालामुखी देवी मंदिर
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नवरात्र में आस्था का केंद्र बना है। यहां रोजाना सुबह से ही पूजन-अर्चना
करने को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। मान्यता है कि मंदिर के
गर्भगृह में स्थापित ज्वालामुखी देवी नेत्र रोगों का कष्ट हरने वाली हैं।
यहां देश के हर हिस्से से श्रद्धालु मनौती पूरी होने के बाद माथा टेकने पहुंचते हैं। बेटियों के मुंडन की खास परंपरा है। नवरात्रों में यहां श्रद्धालु की भीड़ में इजाफा हो जाता है। ज्वालामुखी देवी का यह मंदिर वर्षों पुराना है। इस मंदिर की स्थापना विशुनगढ़ किले के राजा चौधरी भास्कर उर्फ राजकुमार ने ज्वालाजी मूर्ति लाकर कराई थी।
जमीन से चार फिट की ऊंचाई पर मंदिर का निर्माण हुआ है। भीतर ज्वालामुखी की सफेद प्रतिमा विराजमान है। पहले प्रतिमा अष्टधातु की थी। इसे चोरों ने खंडित कर दिया। अब यह कहां है, किसी को पता नहीं। मुख्य मंदिर के चारों ओर पक्का परिक्रमा मार्ग है। मंदिर से जुड़ा हुआ कोई भी इतिहास सुरक्षित नहीं है।
परिक्रमा मार्ग के आसपास काले पत्थरों की कई देवियों की कलात्मक मूर्तियां रखी हुई हैं। सामने कभी कुआं आबाद था। ज्वालामुखी देवी को नेत्र रोगों का कष्ट दूर करने की मान्यता मिली हुई है। यहां मध्यप्रदेश, गुजरात, दिल्ली, हरियाणा व उत्तराखंड प्रांतों से भी श्रद्धालु पूजन के लिए पहुंचते हैं।
नवरात्र की नवमी से पूर्णमासी तक परिसर में मेला लगता है। अन्न प्राशन व मुंडन संस्कार भी यहां होते हैं। मनौती मानने वाले उसे पूरा होने के बाद जात करने के लिए आते हैं। कभी बड़े-बड़े ककरीले पत्थरों से बनी मंदिरों की दीवारें जीर्णशीर्ण हालत में थी। जिसका जीर्णोद्धार कसबे के सेवानिवृत्त टीचर सोनेलाल पाल ने कराया है। मान्यता है कि देवी के चरणों के पास भरा नीर आंखों में लगाने से देवी मां नेत्र रोगों को हर लेती हैं।
यहां देश के हर हिस्से से श्रद्धालु मनौती पूरी होने के बाद माथा टेकने पहुंचते हैं। बेटियों के मुंडन की खास परंपरा है। नवरात्रों में यहां श्रद्धालु की भीड़ में इजाफा हो जाता है। ज्वालामुखी देवी का यह मंदिर वर्षों पुराना है। इस मंदिर की स्थापना विशुनगढ़ किले के राजा चौधरी भास्कर उर्फ राजकुमार ने ज्वालाजी मूर्ति लाकर कराई थी।
जमीन से चार फिट की ऊंचाई पर मंदिर का निर्माण हुआ है। भीतर ज्वालामुखी की सफेद प्रतिमा विराजमान है। पहले प्रतिमा अष्टधातु की थी। इसे चोरों ने खंडित कर दिया। अब यह कहां है, किसी को पता नहीं। मुख्य मंदिर के चारों ओर पक्का परिक्रमा मार्ग है। मंदिर से जुड़ा हुआ कोई भी इतिहास सुरक्षित नहीं है।
परिक्रमा मार्ग के आसपास काले पत्थरों की कई देवियों की कलात्मक मूर्तियां रखी हुई हैं। सामने कभी कुआं आबाद था। ज्वालामुखी देवी को नेत्र रोगों का कष्ट दूर करने की मान्यता मिली हुई है। यहां मध्यप्रदेश, गुजरात, दिल्ली, हरियाणा व उत्तराखंड प्रांतों से भी श्रद्धालु पूजन के लिए पहुंचते हैं।
नवरात्र की नवमी से पूर्णमासी तक परिसर में मेला लगता है। अन्न प्राशन व मुंडन संस्कार भी यहां होते हैं। मनौती मानने वाले उसे पूरा होने के बाद जात करने के लिए आते हैं। कभी बड़े-बड़े ककरीले पत्थरों से बनी मंदिरों की दीवारें जीर्णशीर्ण हालत में थी। जिसका जीर्णोद्धार कसबे के सेवानिवृत्त टीचर सोनेलाल पाल ने कराया है। मान्यता है कि देवी के चरणों के पास भरा नीर आंखों में लगाने से देवी मां नेत्र रोगों को हर लेती हैं।