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Kannauj News: सीजेएम का आदेश रद्द, कहा- संज्ञान के स्तर पर नहीं हो सकता मिनी ट्रायल
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कन्नौज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कन्नौज के चर्चित नवाब सिंह यादव पॉक्सो एवं दुष्कर्म प्रकरण की गवाह महिला चिकित्सक को धमकी देने के मामले में अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) कन्नौज के आरोपपत्र पर संज्ञान लेने से इन्कार करने के आदेश को कानून का उल्लंघन बताते हुए निरस्त कर दिया है। साथ ही मामले को नए सिरे से सुनवाई और विधि के अनुसार आदेश पारित करने के लिए सीजेएम न्यायालय को वापस भेज दिया है।
मंगलवार को न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने सरकार की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि संज्ञान लेने के चरण पर मजिस्ट्रेट का दायित्व केवल यह देखना होता है कि उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं। इस स्तर पर साक्ष्यों का विश्लेषण कर उनकी सत्यता या विश्वसनीयता पर निर्णय देना अथवा मिनी ट्रायल करना न्यायोचित नहीं है।
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यह है पूरा मामला
मूल मामला कन्नौज के तिर्वा क्षेत्र की एक नाबालिग किशोरी से जुड़ा है, जिसने पूर्व ब्लॉक प्रमुख नवाब सिंह यादव पर नौकरी दिलाने का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। विवेचना के दौरान कोर्ट में पीड़िता का बयान दर्ज कराया गया था। मेडिकल परीक्षण और फोरेंसिक साइंस लैब (एफएसएल) की डीएनए रिपोर्ट में भी अभियोजन के अनुसार महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य मिले। इसके आधार पर पुलिस ने आरोपी और अन्य सहअभियुक्तों के विरुद्ध पॉक्सो अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं में आरोपपत्र दाखिल किया था।
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गवाही के दौरान डॉक्टर को दी गई थी धमकी
मुकदमे की सुनवाई के दौरान जिला अस्पताल की महिला चिकित्सक डॉ. स्वास्तिका शालिनी ने अदालत में चिकित्सा संबंधी साक्ष्य प्रस्तुत किए। आरोप है कि गवाही देने के बाद उन पर बयान बदलने का दबाव बनाया गया और जान से मारने की धमकी दी गई। इस संबंध में पुलिस ने अलग से प्राथमिकी दर्ज कर विवेचना की और आरोपपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया।
सीजेएम ने संज्ञान लेने से किया था इनकार
तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 20 सितंबर 2025 को आरोपपत्र पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था। आदेश में विवेचना की प्रक्रिया, पुलिस की कार्यप्रणाली और साक्ष्यों पर विस्तार से टिप्पणी की गई थी। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने क्या कहा- अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्य किया
खंडपीठ ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने संज्ञान के स्तर पर उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण कर अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्य किया। इस स्तर पर अदालत को केवल प्रथम दृष्टया मामला देखना होता है, न कि यह तय करना कि आरोप अंततः सिद्ध होंगे या नहीं। न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड और केस डायरी से प्रथम दृष्टया अभियोजन चलाने योग्य मामला बनता है। हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि संज्ञान से इन्कार करने से पहले शिकायतकर्ता को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के अनुसार ऐसा किया जाना आवश्यक है।
हाई कोर्ट ने दिए दोबारा सुनवाई के निर्देश
हाईकोर्ट ने सीजेएम कन्नौज का 20 सितंबर 2025 का आदेश निरस्त करते हुए मामला पुनः उसी न्यायालय में भेज दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि पुलिस रिपोर्ट और उपलब्ध अभिलेखों पर कानून के अनुरूप तथा हाईकोर्ट के निर्णय में की गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से आदेश पारित किया जाए। इस फैसले को संज्ञान लेने की न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा रहा है।
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मंगलवार को न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने सरकार की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि संज्ञान लेने के चरण पर मजिस्ट्रेट का दायित्व केवल यह देखना होता है कि उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं। इस स्तर पर साक्ष्यों का विश्लेषण कर उनकी सत्यता या विश्वसनीयता पर निर्णय देना अथवा मिनी ट्रायल करना न्यायोचित नहीं है।
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यह है पूरा मामला
मूल मामला कन्नौज के तिर्वा क्षेत्र की एक नाबालिग किशोरी से जुड़ा है, जिसने पूर्व ब्लॉक प्रमुख नवाब सिंह यादव पर नौकरी दिलाने का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। विवेचना के दौरान कोर्ट में पीड़िता का बयान दर्ज कराया गया था। मेडिकल परीक्षण और फोरेंसिक साइंस लैब (एफएसएल) की डीएनए रिपोर्ट में भी अभियोजन के अनुसार महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य मिले। इसके आधार पर पुलिस ने आरोपी और अन्य सहअभियुक्तों के विरुद्ध पॉक्सो अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं में आरोपपत्र दाखिल किया था।
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गवाही के दौरान डॉक्टर को दी गई थी धमकी
मुकदमे की सुनवाई के दौरान जिला अस्पताल की महिला चिकित्सक डॉ. स्वास्तिका शालिनी ने अदालत में चिकित्सा संबंधी साक्ष्य प्रस्तुत किए। आरोप है कि गवाही देने के बाद उन पर बयान बदलने का दबाव बनाया गया और जान से मारने की धमकी दी गई। इस संबंध में पुलिस ने अलग से प्राथमिकी दर्ज कर विवेचना की और आरोपपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया।
सीजेएम ने संज्ञान लेने से किया था इनकार
तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 20 सितंबर 2025 को आरोपपत्र पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था। आदेश में विवेचना की प्रक्रिया, पुलिस की कार्यप्रणाली और साक्ष्यों पर विस्तार से टिप्पणी की गई थी। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने क्या कहा- अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्य किया
खंडपीठ ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने संज्ञान के स्तर पर उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण कर अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्य किया। इस स्तर पर अदालत को केवल प्रथम दृष्टया मामला देखना होता है, न कि यह तय करना कि आरोप अंततः सिद्ध होंगे या नहीं। न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड और केस डायरी से प्रथम दृष्टया अभियोजन चलाने योग्य मामला बनता है। हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि संज्ञान से इन्कार करने से पहले शिकायतकर्ता को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के अनुसार ऐसा किया जाना आवश्यक है।
हाई कोर्ट ने दिए दोबारा सुनवाई के निर्देश
हाईकोर्ट ने सीजेएम कन्नौज का 20 सितंबर 2025 का आदेश निरस्त करते हुए मामला पुनः उसी न्यायालय में भेज दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि पुलिस रिपोर्ट और उपलब्ध अभिलेखों पर कानून के अनुरूप तथा हाईकोर्ट के निर्णय में की गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से आदेश पारित किया जाए। इस फैसले को संज्ञान लेने की न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा रहा है।