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‘बस एक मां है जो मुझसे खफा नहीं होती’

Sun, 10 May 2015 12:50 AM IST
अमर उजाला कन्नाैैज
अमर उजाला कन्नाैैज Updated Sun, 10 May 2015 12:50 AM IST
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bas ek maa hai jo mujhse khafa nahi hoti
‘लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती, बस एक मां है जो मुझसे खफा नहीं होती।’ शायर मुनव्वर राना के ये अल्फाज भी शायद मां की शख्सियत को बयां करने को कम हैं। समूची धरती पर बस यही एक पावन रिश्ता है जिसमें कोई कपट नहीं होता। इस एक रिश्ते में समाया है ममता का सागर। शीतल और सुगंधित बयार का कोमल अहसास। मदर्स डे के मौके पर आइए आपको को मिलवाते हैं कुछ ऐसी ही मांओं से जिन्होंने अपने अरमानों का दबाकर अपने बच्चों को एक मुकाम तक पहुंचाया।
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मां की प्रेरणा ने बनाया आईपीएस
एसपी कलानिधि नैथानी को उनकी मां डा. कुसुम नैथानी की प्रेरणा और मार्गदर्शन ने आईपीएस बना दिया। मां का जिक्र आते ही बेहद भावुक हुए एसपी ने बताया कि उनकी जिंदगी में बचपन से ही मां की विशेष भूमिका रही। सात-आठ साल की उम्र से ही मां की टोकाटाकी, गलतियां करने पर समझाना और भविष्य में आगे बढ़ने की प्रेरणा ने ही मुझे यहां तक पहुंचाया।
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प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद जब आईएएस की बजाय आईपीएस बनने का रास्ता मां ने ही दिखाया। वह कहते हैं कि बच्चों में पाजिटिव सोच, मानसिक मजबूती, दृढ़ इच्छाशक्ति, विषम परिस्थिति में आगे बढ़ने का जज्बा, जुझारूपन मां के जरिए ही पनपता है। जब मां पढ़ी-लिखी होती है तो बच्चे देश के बेहतर नागरिक बनते हैं। खान-पान का सलीका, बोलचाल का ढंग, खाली समय को सदुपयोग करने का तरीका सब मां से सीखा।
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विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए विचलित न होना और कठिन  से कठिन हालातों में भी मंजिल तक पहुंचने का हुनर मां ने ही सिखाया। यही वजह है कि सर्विस के दौरान जब कभी कोई अड़चन आती है तो उससे निपटने और तमाम तरह की गुत्थियों को सुलझाने की शक्ति मां के जरिए मिलती है।


गर्दिश को चुनौती देकर बेटी को बनाया जांबाज
मोहल्ला बजरिया में अभावों के बीच परिवार चला रही मां ने गर्दिश को चुनौती देते हुए बेटी को सिपाही बनाकर सफलता के मुकाम तक पहुंचा दिया। बेटी शालिनी भी अपनी सफलता का श्रेय मां आशा को देती है। बताया कि गरीबी के चलते घर में दो वक्त की रोटी जुटाना तक मुश्किल था। इन हालातों में भी मां ने बकरी पालन किया।

उनके बच्चों को बेचकर मेरी एडमीशन फीस चुकाई। 2005 में हाईस्कूल, 2007 में इंटरमीडिएट और 2010 में बीए पास किया। बीएड में सेलेक्शन हुआ, लेकिन फीस के लिए पैसे न होने से यह सपना अधूरा रह गया। इसके बाद 2013 में पुलिस भर्ती में फार्म डाला। इसकी सभी परीक्षाओं को पास किया।

शालिनी कहती हैं घर में पैसे की तंगी हर समय रही, लेकिन मां ने कभी हिम्मत नहीं हारी। हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। मैंने स्कूल की फीस चुकाने के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया। लड़कियों के डांस क्लास और मेंहदी क्लास चलाए। पापा वेदप्रकाश ने भी घर चलाने में पूरा योगदान दिया। वह सुबह होते फलों की ठिलिया लगाकर गली-गली बेचने निकल पड़ते हैं। हम भाई-बहनों की परवरिश में मां के त्याग और मेहनत को कभी नहीं भुलाया जा सकता।


मां के हौसलों से मिला मुकाम
मोहल्ला भैनपुरा की अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी मनु पाल के लिए मदरर्स-डे काफी अहमियत रखता है। वजह संघर्ष के दिनों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्वर्ण पदक विजेता बनने के सफर में उसकी मां का हौसला ही काम आया। मनु का कहना है जब उसका हौसला टूटने लगता तो मां ही उसे हिम्मत बंधाती थी। हर बार वह हौसला अफजाई करती।

रामनरायन पाल और हरिप्यारी की पुत्री मनु कुमारी ने बगैर किसी संसाधन के लॉन बाल्स जैसे विदेशी खेल में हाथ अजमाना शुरू किए था। इस खेल से जुड़ने के बाद मनु ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक देश और विदेश में हुई कई प्रतियोगिताओं में उसने तमाम मेडल अपने नाम किए।


कामनवेल्थ गेम्स में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी मनु पाल ने झारखंड की ओर से खेलते हुए राष्ट्रमंडल खेलों में लॉन बाल्स प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। मलेशिया में हुए एशियाई खेलों में उसे कांस्य पदक और सिल्वर मेडल हासिल हुआ। मनु ने 34वें नेशनल गेम्स 2011 में अपनी टीम के लिए गोल्ड मेडल जीता था। केरल के अन्नाकुणम में चल रहे 35 वें राष्ट्रीय खेलकूद में उसने स्वर्ण पदक जीतकर मेडल अपनी मां को भेंट किया।
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