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कामधेनु योजना पर बैंक ने लगाया ब्रेक
अमर उजाला कन्नाैैज
Updated Sun, 01 Feb 2015 11:58 PM IST
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अखिलेश सरकार की महत्वाकांक्षी कामधेनु व मिनी कामधेनु योजना को साकार कराने में बैंक बाधक बन गई हैं। वे लाभार्थियों को ऋण वितरण करने के बजाय तरह-तरह के बहाने बनाकर कन्नी काट रही हैं। न सिर्फ कन्नौज बल्कि कानपुर मंडल के सभी 6 जिलों में यह योजना अंजाम तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ती नजर आ रही है।
बैंकों की तरफ से लगे ब्रेक का मामला मंडलायुक्त के दरबार में पहुंच गया है। अब इस योजना को अमलीजामा पहनाने का जिम्मा डीएम को सौंपा गया है।
कानपुर मंडल में मिनी कामधेुन योजना बेहाल होने की सच्चाई सामने आने के बाद कमिश्नर मो. इफ्तखारुद्दीन ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने मामले में कार्रवाई के लिए डीएम को पत्र भेजा है। कमिश्नर के अनुसार कानपुर मंडल में निर्धारित लक्ष्य 180 के सापेक्ष 178 लाभार्थियों का चयन करके आवेदन पत्र बैंकों में भेजे जा चुके हैं।
केवल इटावा में दो लाभार्थियों का अभी तक चयन नहीं हो सका है। चयनित 168 लाभार्थियों में से अब तक मात्र 59 आवेदन पत्रों को ही बैंकों ने स्वीकृत किया है। इनमें से 34 लाभार्थी ऋण पाने के लिए चक्कर लगा रहे हैं।
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बैंकों ने अब तक इटावा के चार, औरैया के 5, कन्नौज के सभी 6, कानपुर नगर के 8, फर्रुखाबाद के 2 व कानपुर देहात के सभी 9 लाभार्थियों को ऋण वितरित नहीं किया है। कमिश्नर को छानबीन के दौरान पता चला है कि पहले तो बैंकों ने ऋण पत्रावली स्वीकृत करने में जरूरत से ज्यादा विलंब किया।
काफी कोशिशों के बाद ऋण की स्वीकृति दी। इसके बाद धनराशि देने में तरह-तरह के रोड़े अटकाए जा रहे हैं। इस कारण डेयरी स्थापित करने में परेशानी हो रही है। कमिश्नर ने निर्देश दिए हैं कि डीएम योजना की समीक्षा बैंक अधिकारियों के साथ करें।
लक्ष्य के सापेक्ष शत-प्रतिशत ऋण पत्रावली को मंजूरी दिलाकर लाभार्थियों को ऋण की धनराशि मुहैया कराना सुनिश्चित करें। अपर निदेशक पशुपालन कानपुर मंडल को भी इस योजना को पूर्ण कराने में डीएम का सहयोग करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
उधर बैंक सूत्रों की मानें तो इस योजना का लाभ लेने के लिए राजनैतिक दलों से जुड़े लोग उमड़ पड़े हैं। बैंकों को डर है कि यदि उन्होंने कुरताधारियों की ऋण पत्रावलियां स्वीकृत करके उन्हें कर्ज दे दिया तो वे उसका उपयोग मनमाने तरीके से करेंगे। बाद में राजनैतिक लाभार्थियों से ऋण की वसूली करना भी टेढ़ी खीर साबित होगा।
भविष्य के झंझटों से बचने के लिए बैंकें सारे दांवपेंच आजमा रही हैं ताकि ऋण वितरित करने से बच सकें। कामधेनु योजना के तहत आवेदन करने वाले हरिओम यादव का कहना है कि बैंक के अधिकारी हर बार कोई न कोई नई कमी निकाल देते हैं। मामूली सी कागजी कवायद पूरी करने में जानबूझकर महीनों का वक्त लगाया जा रहा है, जिससे सरकार की योजना उद्देश्य से भटक गई है।
कानपुर मंडल में कामधेनु योजना भी धीमी है। 36 के सापेक्ष 35 लाभार्थियों का चयन किया गया। लाभार्थियों के आवेदन पत्रों को बैंकों में भेजा जा चुका है। 35 में से अब तक मात्र 15 आवेदन पत्र स्वीकृत किए गए हैं। इसके सापेक्ष 4 लाभार्थियों को ही ऋण वितरण हो सका है।
अपर निदेशक, पशुपालन
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डेयरी से होने वाले फायदे
कामधेनु व मिनी कामधेनु योजना के तहत डेयरी स्थापित होने पर पशुपालन को बढ़ावा मिलेगा। दुधारू पशुओं से दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा। किसान व पशुपालक दूध को बेंचकर पैसा कमा सकेंगे। इससे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी। खेती की लागत के लिए पैसा आ जाने पर वे बेहतर ढंग से खेती भी कर सकेंगे।
ॎ खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए गोबर की खाद की उपलब्धता बढ़ेगी। पशुपालक किसानों को रासायनिक खाद कम मात्रा में खरीदनी पड़ेगी। रासायनिक खादों की भरपाई वे पशुओं के गोबर की खाद खेत में डालकर कर सकेंगे।
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बैंकों की तरफ से लगे ब्रेक का मामला मंडलायुक्त के दरबार में पहुंच गया है। अब इस योजना को अमलीजामा पहनाने का जिम्मा डीएम को सौंपा गया है।
कानपुर मंडल में मिनी कामधेुन योजना बेहाल होने की सच्चाई सामने आने के बाद कमिश्नर मो. इफ्तखारुद्दीन ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने मामले में कार्रवाई के लिए डीएम को पत्र भेजा है। कमिश्नर के अनुसार कानपुर मंडल में निर्धारित लक्ष्य 180 के सापेक्ष 178 लाभार्थियों का चयन करके आवेदन पत्र बैंकों में भेजे जा चुके हैं।
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केवल इटावा में दो लाभार्थियों का अभी तक चयन नहीं हो सका है। चयनित 168 लाभार्थियों में से अब तक मात्र 59 आवेदन पत्रों को ही बैंकों ने स्वीकृत किया है। इनमें से 34 लाभार्थी ऋण पाने के लिए चक्कर लगा रहे हैं।
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बैंकों ने अब तक इटावा के चार, औरैया के 5, कन्नौज के सभी 6, कानपुर नगर के 8, फर्रुखाबाद के 2 व कानपुर देहात के सभी 9 लाभार्थियों को ऋण वितरित नहीं किया है। कमिश्नर को छानबीन के दौरान पता चला है कि पहले तो बैंकों ने ऋण पत्रावली स्वीकृत करने में जरूरत से ज्यादा विलंब किया।
काफी कोशिशों के बाद ऋण की स्वीकृति दी। इसके बाद धनराशि देने में तरह-तरह के रोड़े अटकाए जा रहे हैं। इस कारण डेयरी स्थापित करने में परेशानी हो रही है। कमिश्नर ने निर्देश दिए हैं कि डीएम योजना की समीक्षा बैंक अधिकारियों के साथ करें।
लक्ष्य के सापेक्ष शत-प्रतिशत ऋण पत्रावली को मंजूरी दिलाकर लाभार्थियों को ऋण की धनराशि मुहैया कराना सुनिश्चित करें। अपर निदेशक पशुपालन कानपुर मंडल को भी इस योजना को पूर्ण कराने में डीएम का सहयोग करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
उधर बैंक सूत्रों की मानें तो इस योजना का लाभ लेने के लिए राजनैतिक दलों से जुड़े लोग उमड़ पड़े हैं। बैंकों को डर है कि यदि उन्होंने कुरताधारियों की ऋण पत्रावलियां स्वीकृत करके उन्हें कर्ज दे दिया तो वे उसका उपयोग मनमाने तरीके से करेंगे। बाद में राजनैतिक लाभार्थियों से ऋण की वसूली करना भी टेढ़ी खीर साबित होगा।
भविष्य के झंझटों से बचने के लिए बैंकें सारे दांवपेंच आजमा रही हैं ताकि ऋण वितरित करने से बच सकें। कामधेनु योजना के तहत आवेदन करने वाले हरिओम यादव का कहना है कि बैंक के अधिकारी हर बार कोई न कोई नई कमी निकाल देते हैं। मामूली सी कागजी कवायद पूरी करने में जानबूझकर महीनों का वक्त लगाया जा रहा है, जिससे सरकार की योजना उद्देश्य से भटक गई है।
कानपुर मंडल में कामधेनु योजना भी धीमी है। 36 के सापेक्ष 35 लाभार्थियों का चयन किया गया। लाभार्थियों के आवेदन पत्रों को बैंकों में भेजा जा चुका है। 35 में से अब तक मात्र 15 आवेदन पत्र स्वीकृत किए गए हैं। इसके सापेक्ष 4 लाभार्थियों को ही ऋण वितरण हो सका है।
अपर निदेशक, पशुपालन
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डेयरी से होने वाले फायदे
कामधेनु व मिनी कामधेनु योजना के तहत डेयरी स्थापित होने पर पशुपालन को बढ़ावा मिलेगा। दुधारू पशुओं से दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा। किसान व पशुपालक दूध को बेंचकर पैसा कमा सकेंगे। इससे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी। खेती की लागत के लिए पैसा आ जाने पर वे बेहतर ढंग से खेती भी कर सकेंगे।
ॎ खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए गोबर की खाद की उपलब्धता बढ़ेगी। पशुपालक किसानों को रासायनिक खाद कम मात्रा में खरीदनी पड़ेगी। रासायनिक खादों की भरपाई वे पशुओं के गोबर की खाद खेत में डालकर कर सकेंगे।