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सिस्टर्स आपके जज्बे को सलाम, कोरोना काल में इस योगदान को नहीं भूल सकेगा हिंदुस्तान
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world nurses day
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झांसी। ...सदा बचाती हैं रोगी को दुख, दर्दों बीमारी से, भेदभाव को नहीं करें वह नर रोगी और नारी से। देख बुलंदी को नर्सों की बीमारी डर जाती है फ्लोरेंस की वह पावन बेटी नर्स कहलाती है। नर्स और उनके सम्मानजनक पेशे के लिए किसी कवि की ये पंक्तियां सटीक हैं। आज कोरोना महामारी जब काल का रूप लेकर लोगों पर कहर बरपा रही है, इस दौर में ये नर्स खुद अपनी और अपने परिवार की चिंता छोड़कर मरीजों की जान बचाने में जुटी हैं। डॉक्टर के साथ-साथ पैरामेडिकल स्टाफ की भी अहम भूमिका है। नर्स अपनी जान जोखिम में डालकर ड्यूटी कर रही हैं। इन्होंने खुद को तो कोरोना योद्धा के तौर पर झोंक रखा है लेकिन परिवार वालों से दूरी बना ली है। नर्सों का कहना है कि इस समय में तो उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। कइयों को ड्यूटी करने के बाद क्वारंटीन रहना पड़ रहा है, ऐसे में कोई बच्चे को सास के पास छोड़ आया है तो कोई रिश्तेदार के पास। किसी ने घर पर ही कमरा अलग कर लिया है तो कोई बीमार बच्चे तक की देखभाल नहीं कर पा रहा। नर्सिंग डे पर अमर उजाला ऐसी ही कोरोना योद्धाओं के बारे में आपको बता रहा है। पेश है रिपोर्ट।
फर्ज के आगे भूलीं मां की भूमिका
खातीबाबा निवासी मेहरोज मेडिकल कॉलेज में स्टाफ नर्स हैं। पांच मई से वह ड्यूटी के बाद कॉलेज द्वारा निर्धारित होटल में क्वारंटीन हो जाती हैं। पिछले पांच दिन से वह अपने परिवार से दूर हैं। इसके अलावा अभी यह भी नहीं पता कि कब तक क्वारंटीन में रहना होगा। उनके घर पर पिता, सास और पति के अलावा दस साल की बेटी है। बेटी मां की याद में रोती रहती है। परिवार वाले बमुश्किल उसका मन बहला पाते हैं। मेहरोज ने बताया कि फर्ज के आगे अभी वह मां की भूमिका को भूल गई हैं। वह जानती हैं कि इस समय ड्यूटी के बाद घर जाने की जगह क्वारंटीन में रहना ही ठीक है।
दस दिन हो गए बच्चे को नहीं देखा
मेडिकल कॉलेज में स्टाफ नर्स रजनी राजपूत पारीछा में पति और चार साल के बेटे के साथ किराए पर रहती हैं। पति भी एक नर्सिंगहोम में नौकरी करते हैं। पति भी रोज ड्यूटी जाते हैं। ऐसे में जिस घर में वह रहती हैं, उसी घर की महिला के पास चार साल के बच्चे को कुछ घंटों के लिए छोड़ना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि पति को खाना बनाना आता नहीं है, इसलिए वह जो बना पाते हैं, वो बनाकर बच्चे को खिला देते हैं। पिछले दस दिनों से उन्होंने अपने बच्चे को नहीं देखा है। जब वीडियो कॉल करके बच्चे से बात करती हैं तो वह रोना शुरू कर देता है। दुख होता है पर ड्यूटी जरूरी है।
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बच्चों की देखभाल के लिए गांव से सास को बुलाया
जिला अस्पताल की स्टाफ नर्स सुनीता प्रजापति ने नौ साल की बेटी और चार साल के बेटे की देखभाल के लिए हमीरपुर से अपनी सांस को बुला लिया है। उनके पति भी मेडिकल कॉलेज में लैब टेक्नीशियन हैं। उनकी भी कोरोना वार्ड में ड्यूटी लगी हुई है और वह सैंपल लेने का काम करते हैं। ऐसे में दोनों पति-पत्नी घर जाते समय विशेष सावधानियां बरत रहे हैं। पहले से ज्यादा साफ-सफाई का ध्यान रखना पड़ रहा है। हालांकि, घर पर खाना सुनीता ही बनाती हैं लेकिन बच्चों से अब दूर रहती हैं। दोनों बच्चों को सास के साथ ही सुलाती हैं। मेड को बंद कर देने से खुद घर की सफाई भी करती हैं।
नौ साल के बेटे को रखती हैं दूर
मेडिकल कॉलेज की कोरोना ओपीडी में तैनात झोकनबाग निवासी रोजलीन पॉलक ने अपने नौ साल आरोन को खुद से दूर कर दिया है। पूरी मुस्तैदी से कोरोना वार्ड में ड्यूटी करती हैं। इस दौरान कोरोना संक्रमण के संदिग्ध मरीजों का इलाज करती हैं। बेटा घर पर अकेला रहता है। इस दौरान वह मां से वीडियो कॉल के जरिए बात करता है। रोजलीन बताती हैं कि मेरे पति भी लॉकडाउन के चलते बिहार में फंस गए हैं। बेटा शुरुआत में परेशान होता था। लेकिन अब समझने लगा है। उनका कहना है मेरी जिम्मेदारी इस वक्त देश के लिए बेहद जरूरी है। वह देश की सेवा कर रही है।
बच्चे को नाना-नानी के भरोसे छोड़ ड्यूटी पर डटीं
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज की स्टाफ नर्स अर्चना कुशवाहा और एकता मोसिस ने अपने-अपने बच्चों को नाना-नानी के भरोसे छोड़ दिया है। दोनों ही कोरोना वायरस के इस संक्रमणकाल में ड्यूटी पर डटी हुई हैं और पांच मई से ड्यूटी से एक्टिव क्वारंटीन में हैं। इतना छोटा बच्चा संभालना परिवार वालों के बस की बात नहीं है लेकिन अर्चना और एकता का कहना है कि इस समय सबसे ज्यादा जरूरत समाज को डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की है। ऐसे में वो ड्यूटी पर डटी हुई हैं। हैं। जब बच्चा देखने के लिए ज्यादा जिद करता है तो वीडियो कॉलिंग कर लेती हैं।
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फर्ज के आगे भूलीं मां की भूमिका
खातीबाबा निवासी मेहरोज मेडिकल कॉलेज में स्टाफ नर्स हैं। पांच मई से वह ड्यूटी के बाद कॉलेज द्वारा निर्धारित होटल में क्वारंटीन हो जाती हैं। पिछले पांच दिन से वह अपने परिवार से दूर हैं। इसके अलावा अभी यह भी नहीं पता कि कब तक क्वारंटीन में रहना होगा। उनके घर पर पिता, सास और पति के अलावा दस साल की बेटी है। बेटी मां की याद में रोती रहती है। परिवार वाले बमुश्किल उसका मन बहला पाते हैं। मेहरोज ने बताया कि फर्ज के आगे अभी वह मां की भूमिका को भूल गई हैं। वह जानती हैं कि इस समय ड्यूटी के बाद घर जाने की जगह क्वारंटीन में रहना ही ठीक है।
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दस दिन हो गए बच्चे को नहीं देखा
मेडिकल कॉलेज में स्टाफ नर्स रजनी राजपूत पारीछा में पति और चार साल के बेटे के साथ किराए पर रहती हैं। पति भी एक नर्सिंगहोम में नौकरी करते हैं। पति भी रोज ड्यूटी जाते हैं। ऐसे में जिस घर में वह रहती हैं, उसी घर की महिला के पास चार साल के बच्चे को कुछ घंटों के लिए छोड़ना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि पति को खाना बनाना आता नहीं है, इसलिए वह जो बना पाते हैं, वो बनाकर बच्चे को खिला देते हैं। पिछले दस दिनों से उन्होंने अपने बच्चे को नहीं देखा है। जब वीडियो कॉल करके बच्चे से बात करती हैं तो वह रोना शुरू कर देता है। दुख होता है पर ड्यूटी जरूरी है।
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बच्चों की देखभाल के लिए गांव से सास को बुलाया
जिला अस्पताल की स्टाफ नर्स सुनीता प्रजापति ने नौ साल की बेटी और चार साल के बेटे की देखभाल के लिए हमीरपुर से अपनी सांस को बुला लिया है। उनके पति भी मेडिकल कॉलेज में लैब टेक्नीशियन हैं। उनकी भी कोरोना वार्ड में ड्यूटी लगी हुई है और वह सैंपल लेने का काम करते हैं। ऐसे में दोनों पति-पत्नी घर जाते समय विशेष सावधानियां बरत रहे हैं। पहले से ज्यादा साफ-सफाई का ध्यान रखना पड़ रहा है। हालांकि, घर पर खाना सुनीता ही बनाती हैं लेकिन बच्चों से अब दूर रहती हैं। दोनों बच्चों को सास के साथ ही सुलाती हैं। मेड को बंद कर देने से खुद घर की सफाई भी करती हैं।
नौ साल के बेटे को रखती हैं दूर
मेडिकल कॉलेज की कोरोना ओपीडी में तैनात झोकनबाग निवासी रोजलीन पॉलक ने अपने नौ साल आरोन को खुद से दूर कर दिया है। पूरी मुस्तैदी से कोरोना वार्ड में ड्यूटी करती हैं। इस दौरान कोरोना संक्रमण के संदिग्ध मरीजों का इलाज करती हैं। बेटा घर पर अकेला रहता है। इस दौरान वह मां से वीडियो कॉल के जरिए बात करता है। रोजलीन बताती हैं कि मेरे पति भी लॉकडाउन के चलते बिहार में फंस गए हैं। बेटा शुरुआत में परेशान होता था। लेकिन अब समझने लगा है। उनका कहना है मेरी जिम्मेदारी इस वक्त देश के लिए बेहद जरूरी है। वह देश की सेवा कर रही है।
बच्चे को नाना-नानी के भरोसे छोड़ ड्यूटी पर डटीं
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज की स्टाफ नर्स अर्चना कुशवाहा और एकता मोसिस ने अपने-अपने बच्चों को नाना-नानी के भरोसे छोड़ दिया है। दोनों ही कोरोना वायरस के इस संक्रमणकाल में ड्यूटी पर डटी हुई हैं और पांच मई से ड्यूटी से एक्टिव क्वारंटीन में हैं। इतना छोटा बच्चा संभालना परिवार वालों के बस की बात नहीं है लेकिन अर्चना और एकता का कहना है कि इस समय सबसे ज्यादा जरूरत समाज को डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की है। ऐसे में वो ड्यूटी पर डटी हुई हैं। हैं। जब बच्चा देखने के लिए ज्यादा जिद करता है तो वीडियो कॉलिंग कर लेती हैं।

ममता पुरोहित। - फोटो : REPORTERS

सुनीता प्रजापति। - फोटो : REPORTERS