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UP: आखिर कहां से गायब हुईं ऑस्ट्रेलिया में रखीं 7 दुर्लभ भारतीय कलाकृतियां, इसलिए खंगाले जा रहे पुराने अभिलेख
Sat, 18 Jul 2026 01:31 PM IST
Sharukh Khan
हिमांशु पांडेय, अमर उजाला, झांसी
हिमांशु पांडेय, अमर उजाला, झांसी
Published by: Sharukh Khan
Updated Sat, 18 Jul 2026 01:31 PM IST
सार
ऑस्ट्रेलिया में रखीं सात दुर्लभ भारतीय कलाकृतियां गायब हो गई हैं। स्वामित्व तय करने के लिए पुराने अभिलेख खंगाले जा रहे हैं। कुछ कलाकृतियों का संबंध बुंदेलखंड से होने की संभावना है।
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भारत की सात दुर्लभ पुरातात्विक कलाकृतियां गायब
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
ऑस्ट्रेलिया के संग्रहालयों में संरक्षित भारत की सात दुर्लभ पुरातात्विक कलाकृतियों को वापस लाने की तैयारी चल रही है, लेकिन उनकी मूल उत्पत्ति और स्वामित्व को लेकर पेच फंस गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को यह स्पष्ट नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया पहुंचने से पहले ये कलाकृतियां भारत में कहां संरक्षित थीं।
यही कारण है कि देश के चुनिंदा संग्रहालयों से पुराने अभिलेख और रजिस्टर खंगाले जा रहे हैं। झांसी संग्रहालय से भी इन कलाकृतियों के संबंध में रिकॉर्ड उपलब्ध कराने को कहा गया है। पुरातत्व विभाग के अनुसार ये सातों कलाकृतियां ऑस्ट्रेलिया की गैलरी ऑफ न्यू साउथ वेल्स (एनएसडब्ल्यू) और नेशनल गैलरी ऑफ ऑस्ट्रेलिया में सुरक्षित हैं।
इन्हें भारत वापस लाने से पहले इनका मूल स्वामित्व और स्रोत तय करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद न हो। बताया जाता है कि ये मूर्तियां ऑस्ट्रेलिया के नागरिकों ने भारत आकर अलग-अलग समय में खरीदी थी।
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यही कारण है कि देश के चुनिंदा संग्रहालयों से पुराने अभिलेख और रजिस्टर खंगाले जा रहे हैं। झांसी संग्रहालय से भी इन कलाकृतियों के संबंध में रिकॉर्ड उपलब्ध कराने को कहा गया है। पुरातत्व विभाग के अनुसार ये सातों कलाकृतियां ऑस्ट्रेलिया की गैलरी ऑफ न्यू साउथ वेल्स (एनएसडब्ल्यू) और नेशनल गैलरी ऑफ ऑस्ट्रेलिया में सुरक्षित हैं।
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इन्हें भारत वापस लाने से पहले इनका मूल स्वामित्व और स्रोत तय करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद न हो। बताया जाता है कि ये मूर्तियां ऑस्ट्रेलिया के नागरिकों ने भारत आकर अलग-अलग समय में खरीदी थी।
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इन कलाकृतियों में चोल वंश (9वीं से 13वीं शताब्दी) की ग्रेनाइट से निर्मित पवित्र वृषभ नंदी की प्रतिमा, 11वीं शताब्दी की कांस्य निर्मित भद्रकाली का त्रिशूल, षडानन स्कंद (कार्तिकेय) की प्रतिमा तथा किशनगढ़ शैली (1760-70) की प्रसिद्ध चित्रकला ''राजा सावंत सिंह विद कोर्टेसन'' शामिल हैं।
इसके अलावा बूंदी शैली की ''कृष्ण और गोपियों का वृत्ताकार नृत्य'' (वर्ष 1850), 10वीं शताब्दी की लाल बलुआ पत्थर से बनी महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा और 10वीं शताब्दी की अवलोकितेश्वर की प्रतिमा भी इस सूची में शामिल हैं।
तीन कलाकृतियां यूपी और एमपी के बुंदेलखंड से संबंधित हो सकती हैं
पुरातत्व विभाग का मानना है कि इनमें से तीन कलाकृतियां उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड से संबंधित हो सकती हैं। विशेष रूप से अवलोकितेश्वर की प्रतिमा के ग्वालियर-झांसी अंचल से जुड़े होने की संभावना जताई जा रही है।
पुरातत्व विभाग का मानना है कि इनमें से तीन कलाकृतियां उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड से संबंधित हो सकती हैं। विशेष रूप से अवलोकितेश्वर की प्रतिमा के ग्वालियर-झांसी अंचल से जुड़े होने की संभावना जताई जा रही है।
झांसी संग्रहालय के निदेशक डॉ. मनोज कुमार ने बताया कि इस संबंध में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का पत्र प्राप्त हुआ था। उपलब्ध अभिलेखों का मिलान कर आवश्यक जानकारी विभाग को भेजी जा रही है। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी राजीव त्रिवेदी का कहना है कि कलाकृतियों की वास्तविक जानकारी का पता लगाने के लिए पुराने अभिलेख खंगाले जा रहे हैं।