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पराक्रम की प्रतिमूर्ति हैं वृंदावन लाल वर्मा के साहित्य की नायिकाएं

Thu, 01 Jul 2021 02:03 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 01 Jul 2021 02:03 AM IST
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Vrandavan lal verma
झांसी। बुंदेलखंड के झांसी जिले के मऊरानीपुर कसबे में 9 जनवरी 1889 को कायस्थ परिवार में जन्मे उपन्यास सम्राट वृंदावन लाल वर्मा की तुलना जर्मन के उपन्यासकार वाल्टर स्कॉट से की जाती है। उन्हें लोग हिंदी उपन्यास जगत का वाल्टर स्कॉट कहते हैं। जिस दौर में डा. वृंदावन लाल वर्मा ने उपन्यास लिखना शुरू किया वह प्रेमचंद के सामाजिक परंपराओं के तानेबाने से बुने उपन्यासों का दौर था, पर वृंदावन लाल वर्मा ने बड़ा जोखिम उठाते हुए ऐतिहासिक उपन्यासों के सृजन का जोखिम उठाया तथा उसमें वे सफल भी रहे। गढ़कुंडार, देवगढ़ की मुस्कान, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, मृगनयनी, अहिल्याबाई जैसे उपन्यासों का सृजन कर यह संदेश दिया कि नारी सिर्फ अबला ही नहीं सबला भी होती है।
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बचपन की एक छोटी सी घटना ने बना दिया उपन्यासकार
डा. वृंदावन लाल वर्मा के प्रपौत्र मधुर वर्मा बताते हैं कि उनके घर में बुजुर्ग अक्सर इस घटना का जिक्र करते हैं। उनका कहना है कि बात उन दिनों की है जब देश गुलाम था। मऊरानीपुर निवासी कानूनगो अयोध्या प्रसाद के पुत्र वृंदावन लाल स्कूल में आठवां कक्षा में पढ़ते थे। उन्हें अंग्रेजी सरकार का डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल मार्सडन इतिहास पढ़ता था। वह न केवल शिक्षण का कार्य करता था बल्कि कि वह इतिहासकार भी था, इस कारण वह अपनी लिखी किताबें ही कक्षा में पढ़ाता था। इतिहास की एक किताब में उसने एक संदर्भ में लिखा था, कि अंग्रेजों से भारतीय कभी मुकाबला नहीं कर पाएंगे, और हमेशा ही ऐसे ही गुलाम बने रहेंगे। यह बात वृंदावन के बालमन को आहत कर गई। घर आकर उन्होंने किताब के उस पृष्ठ को फाड़कर नीचे फेंक दिया। उनके साथ ज्यादातर समय रहने वाले उनके चाचा विहारी लाल शाम को घर आए तो फटी हुई किताब को देखकर कारण पूछा। आक्रोशित बालक वृंदावन ने बताया कि चाचाजी जो अंग्रेज लेखक ने लिखा है क्या सही है, तो उनके चाचा विहारी लाल ने बताया कि अंग्रेज इतिहासकार भारतीयों का मनोबल तोड़ने के लिए इस तरह की बातें इतिहास में लिखते हैं। इसके बाद ही वृंदावन लाल वर्मा ने इतिहास को नये सिरे से लिखने का संकल्प लिया। बमुश्किल 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहला उपन्यास ऊदल लिखा, इसमें अंग्रेज सत्ता के खिलाफ लिखा गया था कि यह अत्याचारी हैं, इनकी हत्या करने से पाप नहीं लगता। अंग्रेज सरकार ने इस उपन्यास को जब्त कर लिया था तथा वृंदावन लाल वर्मा को कई दिनों तक कारागार में रखा था।
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उपन्यासों के केंद्र में रहे बुंदेलखंड और आसपास के ऐतिहासिक स्थल
मधुर वर्मा बताते हैं वृंदावन लाल वर्मा पेशे से वकील थे तथा डिस्ट्रिक बोर्ड के चेयरमैन भी थे, इस नाते उनका क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में आना जाना लगा रहता था। इसी दौरान उनकी मुलाकात हुई सुल्तानपुरा गांव के दुर्जन कुम्हार से और वह उनके साथ रहने लगा। दुर्जन ने निर्जन जंगलों में स्थित प्राचीन किलों और अन्य स्थल वर्मा जी को दिखाए, और इन्हीं को केंद्र में रखकर उन्होंने उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। सृजन स्थली बनाया गढ़कुंडार के पास स्थित गांव श्यामसी को। गढ़ कुंडार उपन्यास पढ़कर ओरछा के शासक वीरसिंह जूदेव (द्वितीय) इतने खुश हुए कि उन्होंने वृंदावन लाल वर्मा को एक हजार बीघा जमीन श्यामसी गांव के पास दे दी। इसी दौरान एक दिन ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया का वुलावा वृंदावन लाल वर्मा को आया तथा उन्होंने ग्वालियर के तोमर राजा मान सिंह और उनकी प्रेयसी मृगनयनी को लेकर उपन्यास लिखने का आग्रह किया। वृंदावन लाल वर्मा ने मृगनयनी उपन्यास लिखा जो उनकी साहित्य यात्रा में मील का पत्थर साबित हुआ। उस दौर में जहां यह बेहद लोकप्रिय हुआ वहीं बाद में दूरदर्शन ने इसे लेकर धारावाहिक भी बनाया। इसी तरह चिरगांव के पास विराटा गांव की दांगी कन्या को लेकर विराटा की पद्मिनी तो वहीं बेतवा नदी किनारे स्थित पारौल गांव को केंद्र में रखकर लगन उपन्यास में प्रेमकथा लिखी।
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बदहाल है उपन्यास सम्राट का साहित्य सृजन स्थल
मधुर वर्मा बताते हैं कि गढ़कुंडार, मृगनयनी, झांसी की रानी, टूटे कांटें, लगन, मुसाहिब जू, दबे पांव शिकार, अमरबेल विराटा की पद्मिनी, कचनार, देवगढ़ की मुस्कान, राखी की लाज, खिलौना की खोज जैसे अनेक उपन्यासों का सृजन वृंदावन लाल वर्मा ने पहाड़ियों से घिरे छोटे से गांव श्यामसी में किया। यहां उनकी हवेली थी, जो अब पूरी तरह से खंडहर हो चुकी है। अब यह गांव मध्यप्रदेश के निवाड़ी जिले में है। प्रदेश सरकार ने इसके जीर्णोद्धार के लिए दस लाख रुपये की घोषणा की थी, पर आज तक इसें कोई काम नहीं हुआ।
वर्मा जी के उपन्यासों में होते हैं नारी शक्ति और समाजवाद के दर्शन
इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि उनके पिता गोले माते श्यामसी में वृंदावन लाल वर्मा की रसोई पकाते थे, इस नाते उन्हें नजदीक से समझने का मौका मिला। कुशवाहा ने कहा कि वर्मा जी के साहित्य में जहां नारी शक्ति के दर्शन होते हैं वहीं समाजवाद और समरसता भी दिखाई देती है। राई गांव की पिछड़ी जाति की गूजर कन्या मृगनयनी को शिकार करते हुए देखकर राजा मान सिंह उसके रूप लावण्य से अधिक पराक्रम पर रीझ जाते हैं और ऊंचनीच गरीब और अमीर का भेद मिटाकर बना लेते हैं उसे अपनी आठवीं, रानी । इसी तरह अंग्रेजों से युद्ध लड़ते लड़ते अपने प्राणोत्सर्ग करने वाली झांसी की रानी के वीर चरित्र को उन्होंने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उपन्यास में वर्णित किया है। कुशवाहा बताते हैं कि वृंदावन लाल वर्मा एक अच्छे शिकारी भी थे और अक्सर वे रात को अपने साथ दुर्जन और गोले माते को साथ लेकर शिकार के लिए जंगल में निकल जाया करते थे। उन्होंने अपने उपन्यासों में शिकार के जो चित्र खींचे हैं वह उनके एक कुशल शिकारी होने के प्रमाण हैं।

पद्मभूषण व सोवियत नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया
हरगोविंद बताते हैं कि वृंदावन लाल वर्मा की साहित्य साधना के लिए उन्हें पद्मभूषण व सोवियत रूस नेहरु पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लोगों को साहूकारी प्रथा से दूर करके सहकारिता से जोड़ने के लिए उन्होंने अमरबेल उपन्यास लिखा, इसके लिए भारत सरकार की ओर से उन्हें एक वर्ष के लिए रूस यात्रा पर भेजा गया था। बाद में इनके इस उपन्यास का रूसी भाषा में भी अनुवाद हुआ। कुशवाहा बताते है कि आखिरी दिनों में वृंदावन लाल वर्मा श्यामसी की सारी जमीन गरीबों में बांटकर हवेली छोड़कर झांसी में ही रहने लगे थे और 23 जनवरी 1969 को उनका देहावसान हो गया।
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