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टेंडर खत्म होने के तीन माह बाद तक होती रही यूजर चार्ज की वसूली
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झांसी। घरों से कूड़ा उठाने वाली कंपनियों के साथ नगर निगम करीब तीन माह पहले अपना करार खत्म कर चुका, लेकिन इसके बावजूद भवनस्वामियों से यूजर चार्ज वसूली होती रही। तीन माह में लाखों रुपये की अवैध वसूली हो गई। पार्षदों के इस मामले को उठाते ही हंगामा शुरू हो गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए नगर आयुक्त ने जांच कराने के साथ दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात कही।
कूड़ा उठाने में कई गड़बड़ियों के सामने आने के बाद निगम प्रशासन ने मार्च माह में सभी छह एजेंसियों से करार खत्म करके उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद सॉलिड वेस्ट प्रोजेक्ट के जरिए नई कंपनी की तलाश शुरू हुई लेकिन, तब तक घरों से कूड़ा उठाने की वैकल्पिक व्यवस्था के लिए निगम ने कुछ कर्मचारी तैनात कर दिए। इनमें आउटसोर्स के कर्मचारी भी शामिल हैं। इनको वाहन भी उपलब्ध कराए गए।
घरों से कूड़ा उठाने के साथ ही कर्मचारियों ने घरों से चालीस रुपये की वसूली शुरू कर दी। इसके लिए बकायदा नगर निगम के नाम की छपी रसीद का इस्तेमाल किया जा रहा था। पार्षदों ने यह रसीद निगम सदन के सामने भी रखी। हैरत की बात यह कि तीन माह के दौरान भी निगम अफसरों को इसकी भनक तक नहीं लगी। पार्षद अमन राय समेत अन्य पार्षदों ने इस मामले के उठाते ही पार्षदों ने घपले का आरोप लगाते हुए स्थिति साफ करने की मांग की। पड़ताल में मालूम चलाकि यह कुछ दिनों पहले ही नगर निगम में 90 हजार रुपये जमा कराए गए। लाखों रुपये का कोई हिसाब-किताब नहीं मिला। निगम अफसर भी इसका जवाब नहीं दे सके। महापौर रामतीर्थ सिंघल ने इस पूरे मामले पर नाराजगी जताते हुए मामले की पड़ताल के निर्देश दिए। नगर आयुक्त अवनीश राय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच कराने के साथ दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात कही।
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कूड़ा उठाने में कई गड़बड़ियों के सामने आने के बाद निगम प्रशासन ने मार्च माह में सभी छह एजेंसियों से करार खत्म करके उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद सॉलिड वेस्ट प्रोजेक्ट के जरिए नई कंपनी की तलाश शुरू हुई लेकिन, तब तक घरों से कूड़ा उठाने की वैकल्पिक व्यवस्था के लिए निगम ने कुछ कर्मचारी तैनात कर दिए। इनमें आउटसोर्स के कर्मचारी भी शामिल हैं। इनको वाहन भी उपलब्ध कराए गए।
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घरों से कूड़ा उठाने के साथ ही कर्मचारियों ने घरों से चालीस रुपये की वसूली शुरू कर दी। इसके लिए बकायदा नगर निगम के नाम की छपी रसीद का इस्तेमाल किया जा रहा था। पार्षदों ने यह रसीद निगम सदन के सामने भी रखी। हैरत की बात यह कि तीन माह के दौरान भी निगम अफसरों को इसकी भनक तक नहीं लगी। पार्षद अमन राय समेत अन्य पार्षदों ने इस मामले के उठाते ही पार्षदों ने घपले का आरोप लगाते हुए स्थिति साफ करने की मांग की। पड़ताल में मालूम चलाकि यह कुछ दिनों पहले ही नगर निगम में 90 हजार रुपये जमा कराए गए। लाखों रुपये का कोई हिसाब-किताब नहीं मिला। निगम अफसर भी इसका जवाब नहीं दे सके। महापौर रामतीर्थ सिंघल ने इस पूरे मामले पर नाराजगी जताते हुए मामले की पड़ताल के निर्देश दिए। नगर आयुक्त अवनीश राय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच कराने के साथ दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात कही।
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