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खंडहर में गुम हो रहा दूधई के प्राचीन मंदिरों का वैभव
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झांसी/ललितपुर। ललितपुर में जैन पुरातत्व संपदा का अकूत भंडार है। लेकिन सुविधाओं के अभाव और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण यह संपदा बदहाली की शिकार हो रही है। दूधई के प्राचीन जैन मंदिरों का वैभव खंडहर में गुम हो रहा है।
पाली तहसील क्षेत्र के कनपुरा घाटी से पांच कि मी दूर विंध्याचल पर्वत शृंखला पर बसे गांव दूधई के जैन मंदिर भी प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। मंदिर रख-रखाव के अभाव में खंडहर होते जा रहे हैं। बारिश के मौसम में यहां जाने के लिए रास्ते बंद हो जाते हैं। यहां न तो पीने के पानी की व्यवस्था है और न ही बिजली है। रेस्ट हाउस भी बदाल स्थिति में है।
इतिहासकारों की मानें तो गांव दूधई में बने भगवान शांतिनाथ और आदिनाथ के जिनालय नौवीं और दसवीं शताब्दी के हैं। भगवान शांतिनाथ की 16 फुट ऊंची मूर्ति एक ही पत्थर में बनी है। ऐसा माना जाता है कि यहां मनोकामना जरूर पूरी होती है। वहीं एक मंदिर में भगवान नेमिनाथ की बरात का सजीव चित्रण किया गया है। वह भी जीर्णशीर्ण हो चुका है।
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भगवान आदिनाथ की विशाल सात फु ट ऊंची पद्मासन खंडित मूर्ति है। इसपर कोई छाया नहीं है। इसी मंदिर में बीच में भरत बाहुबलि की मूर्ति है। इसके अलावा गांव में कुछ ऐसे टीले हैं जिनमें जैन मूर्तियों के अवशेष हैं। भगवान महावीर के 2600वें निर्वाण महोत्सव वर्ष में केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यहां पर एक विश्रामालय और सड़क बनवाई थी, लेकिन अब दोनों बदहाल हो गए हैं। सड़क मार्ग तो बारिश में पूरी तरह से बंद हो जाता है। साथ ही विश्रामालय भी बंद पड़ा है।
उत्तर प्रदेश-उत्तरांचल तीर्थ क्षेत्र कमेटी के सदस्य सुनील जैन संचय और उत्तर प्रदेश-उत्तरांचल तीर्थक्षेत्र कमेटी के महामंत्री प्रवीण जैन बताते हैं कि क्षेत्र के विकास और जीर्णोद्धार की महती आवश्यकता है। साथ ही पुरातत्व धरोहर का संरक्षण कर इसे बचाया जा सकता है। सरकार और प्रशासन को भी इस पुरातत्व विरासत के संरक्षण और संवर्द्धन की पहल करनी चाहिए।
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पाली तहसील क्षेत्र के कनपुरा घाटी से पांच कि मी दूर विंध्याचल पर्वत शृंखला पर बसे गांव दूधई के जैन मंदिर भी प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। मंदिर रख-रखाव के अभाव में खंडहर होते जा रहे हैं। बारिश के मौसम में यहां जाने के लिए रास्ते बंद हो जाते हैं। यहां न तो पीने के पानी की व्यवस्था है और न ही बिजली है। रेस्ट हाउस भी बदाल स्थिति में है।
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इतिहासकारों की मानें तो गांव दूधई में बने भगवान शांतिनाथ और आदिनाथ के जिनालय नौवीं और दसवीं शताब्दी के हैं। भगवान शांतिनाथ की 16 फुट ऊंची मूर्ति एक ही पत्थर में बनी है। ऐसा माना जाता है कि यहां मनोकामना जरूर पूरी होती है। वहीं एक मंदिर में भगवान नेमिनाथ की बरात का सजीव चित्रण किया गया है। वह भी जीर्णशीर्ण हो चुका है।
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भगवान आदिनाथ की विशाल सात फु ट ऊंची पद्मासन खंडित मूर्ति है। इसपर कोई छाया नहीं है। इसी मंदिर में बीच में भरत बाहुबलि की मूर्ति है। इसके अलावा गांव में कुछ ऐसे टीले हैं जिनमें जैन मूर्तियों के अवशेष हैं। भगवान महावीर के 2600वें निर्वाण महोत्सव वर्ष में केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यहां पर एक विश्रामालय और सड़क बनवाई थी, लेकिन अब दोनों बदहाल हो गए हैं। सड़क मार्ग तो बारिश में पूरी तरह से बंद हो जाता है। साथ ही विश्रामालय भी बंद पड़ा है।
उत्तर प्रदेश-उत्तरांचल तीर्थ क्षेत्र कमेटी के सदस्य सुनील जैन संचय और उत्तर प्रदेश-उत्तरांचल तीर्थक्षेत्र कमेटी के महामंत्री प्रवीण जैन बताते हैं कि क्षेत्र के विकास और जीर्णोद्धार की महती आवश्यकता है। साथ ही पुरातत्व धरोहर का संरक्षण कर इसे बचाया जा सकता है। सरकार और प्रशासन को भी इस पुरातत्व विरासत के संरक्षण और संवर्द्धन की पहल करनी चाहिए।