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Jhansi News: झांसी में बुना गया था ओलंपिक के पहले स्वर्ण पदक का ताना-बाना

Mon, 15 Jul 2024 03:59 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 15 Jul 2024 03:59 AM IST
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The fabric of the first Olympic gold medal was woven in Jhansi.
अमर उजाला ब्यूरो
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झांसी। ओलंपिक खेलों में भारत को पहला स्वर्ण पदक हॉकी में मिला था और इसका ताना-बाना झांसी की धरती पर मेजर ध्यानचंद ने बुना था। अपने करिश्माई के खेल के बूते ध्यानचंद ने गुलामी की जंजीरों में जकड़ी देश की जनता का सिर फख्र से ऊंचा कर दिया था। 26 जुलाई से पेरिस में ओलंपिक की शुरुआत होने जा रही है, इसे लेकर खेल प्रेमी खासे उत्साहित हैं। वे ओलंपिक में शामिल हो रहे भारतीय दल के सदस्यों से ध्यानचंद जैसे प्रदर्शन की उम्मीद लगाए हैं।
सन 1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलंपिक खेलों में पहली बार भारतीय हॉकी टीम ने हिस्सा लिया था। शुरुआत से ही भारतीय टीम को कमजोर माना जा रहा था। लेकिन, भारतीय टीम एक के बाद एक मैच जीतती चली गई और फाइनल में अपनी जगह बना ली। फाइनल में भारत का मुकाबला हॉलैंड से हुआ था। भारत ने यह मुकाबला 3-0 से जीता था और इनमें से दो गोल ध्यानचंद ने किए थे। इस मैच में ध्यानचंद के करिश्माई खेल की झलक पूरी दुनिया ने देखी थी। इसके बाद 1932 में लॉज एंजिल्स और 1936 बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीते थे। ओलंपिक में भारतीय टीम की सफलता में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ध्यानचंद ने अदा की थी। बर्लिन ओलंपिक में तो ध्यानचंद भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे।
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ओलंपिक में इस सफलता की पटकथा ध्यानचंद ने झांसी की धरती से ही लिखी थी। सीपरी बाजार स्थित हीरोज फील्ड में वह हॉकी का अभ्यास किया करते थे। तपती दोपहरी में भी वह घंटों मैदान में पसीना बहाते थे। इसी दरम्यान वह सेना में शामिल हो गए थे। सेना में भी उन्हें खुद की पहचान हॉकी के खिलाड़ी रूप में बनाने में ज्यादा समय नहीं लगा था। क्योंकि, उनके पास झांसी में किए गए अभ्यास का लंबा अनुभव था। खेल से संन्यास लेने के बाद भी ध्यानचंद का ज्यादातर समय हीरोज फील्ड में ही बीतता था। वह यहां नवोदित खिलाड़ियों को हॉकी की बारीकियां बताते थे। तीन दिसंबर 1979 को उनके निधन के बाद हीरोज फील्ड में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया था।
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ध्यानचंद की विरासत को झांसी ने आगे बढ़ाया
मेजर ध्यानचंद द्वारा छोड़ी गई हॉकी की विरासत को झांसी ने आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। समय-समय पर यहां से अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी निकलते रहे। पहला नाम ध्यानचंद के पुत्र अशोक ध्यानचंद का आता है, जिन्होंने ओलंपिक में अपने शानदार खेल का प्रदर्शन किया था। इसके अलावा सुबोध खंडकर, अब्दुल अजीज, जगदीश यादव, जमशेर खान, तुषार खंडकर व नेहा सिंह ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने खेल की छाप छोड़ी। जबकि, जूनियर खिलाड़ियों में केपी यादव, वीरेंद्र सिंह, अब्दुल आहद, ज्योति सिंह, केतन कुशवाहा ने पूरी दुनिया में पहचान बनाई। वहीं, झांसी के शिवम और सौरभ आनंद इन दिनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हॉकी का प्रदर्शन कर रहे हैं।
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हॉकी के हस्ताक्षर हैं ध्यानचंद
पूर्व ओलंपियन अशोक ध्यानचंद ने कहा कि मेजर ध्यानचंद को हॉकी के जादूगर का खिताब यूं ही नहीं मिला था। दुनिया का कोई भी मैदान हो बॉल उनकी हॉकी के इशारे पर नाचती थी। सही मायने में मेजर ध्यानचंद हॉकी के हस्ताक्षर हैं। 1928 में देश ने पहली बार ओलंपिक में स्वर्ण पदक ध्यानचंद के करिश्माई खेल के बूते हासिल किया था।

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भारत रत्न न मिलने का है मलाल
पूर्व अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी सुबोध खंडकर ने कहा कि मेजर ध्यानचंद को 1956 में भारत सरकार ने पद्मभूषण सम्मान दिया था। लेकिन, ध्यानचंद खेल के क्षेत्र में भारत रत्न के भी हकदार हैं। इसकी लगातार मांग की जा रही है। लेकिन, अब तक ध्यान नहीं दिया गया। ध्यानचंद को भारत रत्न मिलने से देश के राष्ट्रीय खेल हॉकी का भी सम्मान बढ़ेगा।
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