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सवा सौ साल बाद भी जस का तस है सुकुवां-ढुकुवां बांध
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झांसी। मंडल में पारीछा एवं सुकुवां-ढुकुवां डैम करीब सवा सौ साल पुराने हो चुके लेकिन, आज भी इन दोनों जलाशयों की मजबूती बेजोड़ है। दोनों जलाशय पहले की तरह काम कर रहे हैं। यहां उतना ही पानी करीब आज भी स्टोर होता है, जितना शुरूआती समय में हुआ करता था। इसी खासियत के चलते इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट के लिए नामित किया गया है।
सिंचाई विभाग के पुराने आंकड़े बताते हैं कि बेतवा नदी के बहाव का 1855 में पहली बार सर्वे आरंभ हुआ। इसके बाद 1857 में गदर के बाद मामला ठंडा पड़ गया। इसके बाद 1881-82 में तत्कालीन अधिशासी अभियंता थार्नहिल ने पारीछा से करीब 112 मील ऊपर बेतवा नदी का सर्वे किया। उनकी रिपोर्ट को आधार बनाकर अधिशासी अभियंता एटकिंसन ने वर्ष 1901 में बेतवा नदी के कमांड एरिया में सुकुवां-ढुकुवां डैम का प्रस्ताव बनाया। यह प्रस्ताव परीछा बांध से पानी की जरूरत पूरी न होने की वजह से बनाया गया। इसकी मदद से रबी की फसल को भी पानी देना तय हुआ। जरूरत को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने इसे मंजूर कर दिया। इसके बाद 1905 में बांध का निर्माण शुरू हुआ। उस दौरान इसकी कुल लागत 23.98 लाख रुपये आई। उस समय के लिहाज से यह रकम काफी अधिक थी लेकिन, सिंचाई की जरूरत को देखते हुए सरकार ने बजट में कटौती नहीं की। करीब चार साल तक लगातार निर्माण चलता रहा। वर्ष 1909 में इसका निर्माण पूरा हुआ। निर्माण के समय इसका कैचमेंट करीब 82440 मील था। आज भी यहां पानी संग्रहित होता है। अभी इसे 273.71 मीटर तक भरा जाता है। पूरा भरा होने पर 57.77 मीट्रिक घन मीटर पानी स्टोर किया जाता है।
हेरिटेज साइट में शामिल होने से बढ़ेगा पर्यटन
सुकुवां-ढुकुवां डैम झांसी के बबीना ब्लॉक में स्थित है। इसके यूनेस्को के हेरिटेज साइट में शामिल होने से यहां पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकेगा। सूची में शामिल होने के बाद यहां तक का पहुंच मार्ग चौड़ा होगा। उसकी कनेक्टिवटी बेहतरीन की जाएगी। सुरक्षा के लिए अलग से गार्ड तैनात होंगे। बांध के आसपास उसे सुरक्षित करने के लिए आसपास घेरा तैयार होगा। देश-विदेश के पर्यटकों की आवाजाही भी बढ़ेगी। बता दें, यूनेस्को ऐतिहासिक अथवा दूसरे महत्व की वजह से स्थान अथवा संरचना को विश्व धरोहर स्थल (वर्ल्ड हेरिटेज साइट) के तौर पर घोषित करता है। इसकी प्रक्रिया बहुत लंबी होती है। हर देश से चुनिंदा प्रवृष्टियां ही भेजी जाती हैं। ऐसे में सुकुवां-ढुकुवां को इसमें शामिल किया जाना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है। सिंचाई विभाग के अभियंताओं का कहना है कि देशभर में ब्रिटिश काल के दौरान बने चुनिंदा बांधों में यह शुमार है। बारिश के दिनों में जब यहां से तीन लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ा जाता है, तब इसका नाजारा देखने लायक होता है।
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सिंचाई विभाग के पुराने आंकड़े बताते हैं कि बेतवा नदी के बहाव का 1855 में पहली बार सर्वे आरंभ हुआ। इसके बाद 1857 में गदर के बाद मामला ठंडा पड़ गया। इसके बाद 1881-82 में तत्कालीन अधिशासी अभियंता थार्नहिल ने पारीछा से करीब 112 मील ऊपर बेतवा नदी का सर्वे किया। उनकी रिपोर्ट को आधार बनाकर अधिशासी अभियंता एटकिंसन ने वर्ष 1901 में बेतवा नदी के कमांड एरिया में सुकुवां-ढुकुवां डैम का प्रस्ताव बनाया। यह प्रस्ताव परीछा बांध से पानी की जरूरत पूरी न होने की वजह से बनाया गया। इसकी मदद से रबी की फसल को भी पानी देना तय हुआ। जरूरत को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने इसे मंजूर कर दिया। इसके बाद 1905 में बांध का निर्माण शुरू हुआ। उस दौरान इसकी कुल लागत 23.98 लाख रुपये आई। उस समय के लिहाज से यह रकम काफी अधिक थी लेकिन, सिंचाई की जरूरत को देखते हुए सरकार ने बजट में कटौती नहीं की। करीब चार साल तक लगातार निर्माण चलता रहा। वर्ष 1909 में इसका निर्माण पूरा हुआ। निर्माण के समय इसका कैचमेंट करीब 82440 मील था। आज भी यहां पानी संग्रहित होता है। अभी इसे 273.71 मीटर तक भरा जाता है। पूरा भरा होने पर 57.77 मीट्रिक घन मीटर पानी स्टोर किया जाता है।
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हेरिटेज साइट में शामिल होने से बढ़ेगा पर्यटन
सुकुवां-ढुकुवां डैम झांसी के बबीना ब्लॉक में स्थित है। इसके यूनेस्को के हेरिटेज साइट में शामिल होने से यहां पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकेगा। सूची में शामिल होने के बाद यहां तक का पहुंच मार्ग चौड़ा होगा। उसकी कनेक्टिवटी बेहतरीन की जाएगी। सुरक्षा के लिए अलग से गार्ड तैनात होंगे। बांध के आसपास उसे सुरक्षित करने के लिए आसपास घेरा तैयार होगा। देश-विदेश के पर्यटकों की आवाजाही भी बढ़ेगी। बता दें, यूनेस्को ऐतिहासिक अथवा दूसरे महत्व की वजह से स्थान अथवा संरचना को विश्व धरोहर स्थल (वर्ल्ड हेरिटेज साइट) के तौर पर घोषित करता है। इसकी प्रक्रिया बहुत लंबी होती है। हर देश से चुनिंदा प्रवृष्टियां ही भेजी जाती हैं। ऐसे में सुकुवां-ढुकुवां को इसमें शामिल किया जाना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है। सिंचाई विभाग के अभियंताओं का कहना है कि देशभर में ब्रिटिश काल के दौरान बने चुनिंदा बांधों में यह शुमार है। बारिश के दिनों में जब यहां से तीन लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ा जाता है, तब इसका नाजारा देखने लायक होता है।
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