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Jhansi News: झांसी में हाउस टैक्स की कहानी, 110 साल पुरानी
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झांसी। नगर निगम की आय का सबसे बड़ा हिस्सा हाउस टैक्स से आता है। इससे मिली रकम को ही महानगर के विकास में खर्च किया जाता है। लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि झांसी में हाउस टैक्स की शुरूआत 110 साल पहले वर्ष 1913 में हुई थी। तब नगर पालिका का दौर था। वर्तमान में झांसी में 60 वार्ड हैं, पर उस समय पूरे शहर में महज छह वार्ड ही थे। इन छह वाडोंर् में बने मात्र 1200 घरों से ही टैक्स वसूला जाता था।
नगर निगम के पुराने दस्तावेजों के मुताबिक वर्ष 1913 में नगर पालिका के गठन के साथ ही प्रथम प्रशासक पीएम वायस ने हाउस टैक्स वसूली का नियम बनाया था। उस समय नगर सीमा के भीतर सिर्फ छह वार्ड थे। शुरूआत में 1200 भवनों पर हाउस टैक्स लगाया गया, लेकिन इसका कोई निश्चित नियम नहीं था। तीन वर्ष बाद वर्ष 1916 में नगर पालिका अधिनियम बनने के बाद हाउस टैक्स वसूलने की विधिवत शुरूआत हुई। उस दौरान सभी भवनों से संपत्ति मूल्य का करीब चार फीसदी टैक्स के तौर पर वसूला जाता था।
ब्रिटिश सरकार ने इस पैसे के इस्तेमाल की इजाजत नगर पालिका को दे रखी थी। इन पैसों को नगर पालिका प्याऊ, पड़ाव घर, आश्रय स्थल समेत अन्य जन उपयोगी कार्य में खर्च करती थी। शाम को सड़कों को रोशन करने का प्रबंध भी इन पैसों से किया जाता था। पुराने दस्तावेज के मुताबिक शुरुआती दौर में नगर पालिका को हाउस टैक्स के तौर पर दो हजार रुपये की वसूली होती थी जबकि यह रकम अब बढ़कर 25 करोड़ तक पहुंच गई है। मुख्य कर निर्धारण अधिकारी धीरेंद्र मोहन कटियार का कहना है कि टैक्स वसूली की शुरुआत हुए करीब एक सौ दस साल बीत चुके। इस बीच में टैक्स वसूली में काफी सुधार हुआ है।
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नगर पालिका (1913) नगर निगम (2023)
वार्ड 6 60
भवनों की संख्या 1200 1.33 लाख
राजस्व वसूली 3 हजार 22 करोड़
चुंगी से होती थी नगर पालिका को सबसे अधिक आमदनी
नगर पालिका को हाउस टैक्स के मुकाबले चुंगी से सबसे अधिक आमदनी होती थी। जब तक पालिका के पास चुंगी वसूलने का अधिकार था पालिका कभी भी वित्तीय घाटे में नहीं आई लेकिन, वर्ष 1988 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने चुंगी को खत्म कर दिया। इसके बाद पालिका की वित्तीय सेहत बिगड़ गई। उसे उबारने के लिए सरकार ने राज्य वित्त आयोग का गठन किया। इसके जरिए सरकार चुंगी से होने वाले नुकसान की प्रतिपूर्ति करने लगी। यही व्यवस्था आज भी चली आ रही है। सरकार राज्य वित्त आयोग के जरिए नगर निगम और नगर पालिका को वित्तीय मदद मुहैया कराती है।
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नगर निगम के पुराने दस्तावेजों के मुताबिक वर्ष 1913 में नगर पालिका के गठन के साथ ही प्रथम प्रशासक पीएम वायस ने हाउस टैक्स वसूली का नियम बनाया था। उस समय नगर सीमा के भीतर सिर्फ छह वार्ड थे। शुरूआत में 1200 भवनों पर हाउस टैक्स लगाया गया, लेकिन इसका कोई निश्चित नियम नहीं था। तीन वर्ष बाद वर्ष 1916 में नगर पालिका अधिनियम बनने के बाद हाउस टैक्स वसूलने की विधिवत शुरूआत हुई। उस दौरान सभी भवनों से संपत्ति मूल्य का करीब चार फीसदी टैक्स के तौर पर वसूला जाता था।
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ब्रिटिश सरकार ने इस पैसे के इस्तेमाल की इजाजत नगर पालिका को दे रखी थी। इन पैसों को नगर पालिका प्याऊ, पड़ाव घर, आश्रय स्थल समेत अन्य जन उपयोगी कार्य में खर्च करती थी। शाम को सड़कों को रोशन करने का प्रबंध भी इन पैसों से किया जाता था। पुराने दस्तावेज के मुताबिक शुरुआती दौर में नगर पालिका को हाउस टैक्स के तौर पर दो हजार रुपये की वसूली होती थी जबकि यह रकम अब बढ़कर 25 करोड़ तक पहुंच गई है। मुख्य कर निर्धारण अधिकारी धीरेंद्र मोहन कटियार का कहना है कि टैक्स वसूली की शुरुआत हुए करीब एक सौ दस साल बीत चुके। इस बीच में टैक्स वसूली में काफी सुधार हुआ है।
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नगर पालिका (1913) नगर निगम (2023)
वार्ड 6 60
भवनों की संख्या 1200 1.33 लाख
राजस्व वसूली 3 हजार 22 करोड़
चुंगी से होती थी नगर पालिका को सबसे अधिक आमदनी
नगर पालिका को हाउस टैक्स के मुकाबले चुंगी से सबसे अधिक आमदनी होती थी। जब तक पालिका के पास चुंगी वसूलने का अधिकार था पालिका कभी भी वित्तीय घाटे में नहीं आई लेकिन, वर्ष 1988 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने चुंगी को खत्म कर दिया। इसके बाद पालिका की वित्तीय सेहत बिगड़ गई। उसे उबारने के लिए सरकार ने राज्य वित्त आयोग का गठन किया। इसके जरिए सरकार चुंगी से होने वाले नुकसान की प्रतिपूर्ति करने लगी। यही व्यवस्था आज भी चली आ रही है। सरकार राज्य वित्त आयोग के जरिए नगर निगम और नगर पालिका को वित्तीय मदद मुहैया कराती है।