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संवरेंगे शहर के ऐतिहासिक दरवाजे
ब्यूरो
Updated Mon, 15 Feb 2016 12:48 AM IST
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झांसी। शहर को चारों ओर से घेरे परकोटे व आवागमन के लिए उसमें बने गेटों व खिड़कियों की दशा संवारने की योजना बनाई गई है। नगर निगम ने केंद्रीय पुरातत्व से इसके लिए स्वीकृति मांगी है।
पुराना शहर चारों ओर से विशालकाय परकोटे से घिरा हुआ है। यह परकोटा झांसी के प्राचीन दुर्ग से शुरू होकर वहीं पर खत्म होता है। इसमें शहर से बाहर आवागमन के लिए द्वार व खिड़कियां (छोटे आकार के दरवाजे) बने हुए हैं। किसी जमाने में परकोटा झांसी की सुरक्षा दीवार हुआ करता था, लेकिन अनदेखी के चलते यह शनै:शनै: जमींदोज होता जा रहा है।
लेकिन, नगर निगम द्वारा इसकी तस्वीर संवारने की तैयारी शुरू कर दी गई है। इसकी योजना तैयार कर ली गई है, जिसके तहत नगर निगम द्वारा गेटों व खिड़कियों को उनके पुराने भव्य स्वरूप में लौटाया जाएगा। जबकि, परकोटे का रखरखाव कर उसका संरक्षण होगा। निगम ने इसके लिए केंद्रीय पुरातत्व विभाग से स्वीकृति मांगी है।
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‘नगर का परकोटा अपने आप में अद्भुत है। इसके संरक्षण के लिए निगम ने योजना बनाई है। पुरातत्व विभाग की स्वीकृति मिलते ही काम शुरू कर दिया जाएगा। यह क्षेत्र के पर्यटन विकास में अहम साबित होगा।’
- किरण राजू बुक सेलर, मेयर
परकोटे का यह है इतिहास
झांसी। झांसी के किले का निर्माण सन: 1613 में ओरछा नरेश वीर सिंह जूदेव द्वारा किया गया था। सन 1720 - 30 में यह दुर्ग मराठों के संरक्षण में चला गया। मराठों ने नगर की सुरक्षा की दृष्टि से परकोटे का निर्माण कराया था। सन 1857 में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई द्वारा स्वतंत्रता की खातिर फिरंगियों से लड़े गए युद्ध में उक्त परकोटे व दरवाजों ने ढाल का काम किया था।
यह हैं गेट व खिड़कियां
झांसी। शहर को चारों ओर से घेरे परकोटे में बाहर आवागमन के लिए दस मुख्य द्वार हैं। इनमें झरना गेट, सैंयर गेट, ओरछा गेट, सागर गेट, बड़ागांव गेट, लक्ष्मी गेट, उन्नाव गेट, भांडेरी गेट, दतिया गेट व खंडेराव गेट शामिल हैं। इसके अलावा गनपत खिड़की, सूजे खां खिड़की, भैरव खिड़की, अलीगोल खिड़की, बिलैया खिड़की, सागर खिड़की व पंचकुइयां खिड़की हैं। आकार में द्वार से छोटी होने की वजह से इन्हें खिड़कियां कहा जाता है।
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पुराना शहर चारों ओर से विशालकाय परकोटे से घिरा हुआ है। यह परकोटा झांसी के प्राचीन दुर्ग से शुरू होकर वहीं पर खत्म होता है। इसमें शहर से बाहर आवागमन के लिए द्वार व खिड़कियां (छोटे आकार के दरवाजे) बने हुए हैं। किसी जमाने में परकोटा झांसी की सुरक्षा दीवार हुआ करता था, लेकिन अनदेखी के चलते यह शनै:शनै: जमींदोज होता जा रहा है।
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लेकिन, नगर निगम द्वारा इसकी तस्वीर संवारने की तैयारी शुरू कर दी गई है। इसकी योजना तैयार कर ली गई है, जिसके तहत नगर निगम द्वारा गेटों व खिड़कियों को उनके पुराने भव्य स्वरूप में लौटाया जाएगा। जबकि, परकोटे का रखरखाव कर उसका संरक्षण होगा। निगम ने इसके लिए केंद्रीय पुरातत्व विभाग से स्वीकृति मांगी है।
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‘नगर का परकोटा अपने आप में अद्भुत है। इसके संरक्षण के लिए निगम ने योजना बनाई है। पुरातत्व विभाग की स्वीकृति मिलते ही काम शुरू कर दिया जाएगा। यह क्षेत्र के पर्यटन विकास में अहम साबित होगा।’
- किरण राजू बुक सेलर, मेयर
परकोटे का यह है इतिहास
झांसी। झांसी के किले का निर्माण सन: 1613 में ओरछा नरेश वीर सिंह जूदेव द्वारा किया गया था। सन 1720 - 30 में यह दुर्ग मराठों के संरक्षण में चला गया। मराठों ने नगर की सुरक्षा की दृष्टि से परकोटे का निर्माण कराया था। सन 1857 में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई द्वारा स्वतंत्रता की खातिर फिरंगियों से लड़े गए युद्ध में उक्त परकोटे व दरवाजों ने ढाल का काम किया था।
यह हैं गेट व खिड़कियां
झांसी। शहर को चारों ओर से घेरे परकोटे में बाहर आवागमन के लिए दस मुख्य द्वार हैं। इनमें झरना गेट, सैंयर गेट, ओरछा गेट, सागर गेट, बड़ागांव गेट, लक्ष्मी गेट, उन्नाव गेट, भांडेरी गेट, दतिया गेट व खंडेराव गेट शामिल हैं। इसके अलावा गनपत खिड़की, सूजे खां खिड़की, भैरव खिड़की, अलीगोल खिड़की, बिलैया खिड़की, सागर खिड़की व पंचकुइयां खिड़की हैं। आकार में द्वार से छोटी होने की वजह से इन्हें खिड़कियां कहा जाता है।